बच्चे की सुरक्षा और भावनात्मक स्थिरता सर्वोपरि, विवादित आरोप तय किए बिना भी माता-पिता की मुलाकात सीमित की जा सकती है: दिल्ली हाईकोर्ट
Praveen Mishra
11 Jan 2026 11:46 AM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि हालांकि किसी माता-पिता को अपने बच्चे से नियमित और सार्थक मिलने-जुलने का अधिकार होता है, लेकिन अंतरिम (अस्थायी) चरण में यदि परिस्थितियाँ यह संकेत दें कि इससे बच्चे की सुरक्षा की भावना, भावनात्मक भलाई या मानसिक स्थिरता पर खतरा हो सकता है, तो ऐसे अधिकारों को नियंत्रित या सीमित किया जा सकता है, भले ही माता-पिता के बीच लगे आरोपों पर अंतिम निर्णय न हुआ हो।
जस्टिस अनिल क्षेतरपाल और जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की खंडपीठ ने कहा:
“अंतरिम मुलाकात तय करते समय अदालत को विवादित तथ्यों पर अंतिम निष्कर्ष देने की आवश्यकता नहीं होती। अदालत को यह देखना होता है कि लगाए गए आरोप और आसपास की परिस्थितियाँ मिलकर बच्चे के कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव डालने की आशंका पैदा करती हैं या नहीं।”
इसी आधार पर अदालत ने पिता द्वारा दायर उस अपील को खारिज कर दिया जिसमें उसने फैमिली कोर्ट द्वारा उसके नाबालिग बच्चे से मिलने के अंतरिम अधिकारों को सीमित किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी।
अपीलकर्ता पिता ने दलील दी थी कि उसकी भौतिक मुलाकातों को कम किया जाना “पैरेंटल एलियनेशन” (माता-पिता से बच्चे को दूर करना) के समान है और यह उसके खिलाफ लगाए गए अप्रमाणित आरोपों, जैसे कि बिजली काटने और घर के सीसीटीवी से छेड़छाड़ करने, के आधार पर किया गया है।
वहीं, प्रतिवादी पत्नी ने कहा कि उनकी नाबालिग बेटी स्कूल जाने की उम्र में है और उसके लिए स्थिरता, नियमित दिनचर्या, पढ़ाई और सह-पाठ्य गतिविधियों के लिए पर्याप्त समय जरूरी है। उन्होंने बताया कि पहले की मुलाकात व्यवस्था के तहत बच्चे को सप्ताह में कई बार थोड़े-थोड़े समय के लिए पिता से मिलने जाना पड़ता था, जिससे बार-बार यात्रा करनी पड़ती थी और उसकी दिनचर्या बाधित होती थी। इसलिए मुलाकातों की आवृत्ति कम करना, लेकिन संपर्क बनाए रखना, बच्चे के हित में है।
इससे सहमत होते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“पिता की 'पैरेंटल एलियनेशन' की आशंका को ध्यान में रखते हुए भी, इस मामले में मुलाकातों में किया गया संशोधन बच्चे की भलाई की रक्षा करने वाला कदम है, जिसमें उसके साथ सार्थक संपर्क के रास्ते खुले रहते हैं। यह उस सिद्धांत के अनुरूप है कि हिरासत और मुलाकात से जुड़े मामलों में बच्चे का कल्याण सर्वोपरि होता है।”
अदालत ने यह भी नोट किया कि 29 जनवरी 2025 की एफआईआर और माता-पिता के बीच जारी विवाद बच्चे की भावनात्मक और मानसिक स्थिति को प्रभावित कर सकते हैं।
फैमिली कोर्ट के दृष्टिकोण को सही ठहराते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यह आदेश पिता-बच्चे के संपर्क को समाप्त नहीं करता, बल्कि केवल उसे पुनर्गठित करता है।
इसलिए अदालत ने हस्तक्षेप से इनकार करते हुए अपील खारिज कर दी।

