दिल्ली हाईकोर्ट ने SBI को अवैध रूप से नौकरी से निकाले गए कर्मचारी को ₹1 लाख देने का आदेश दिया, रेगुलराइज़ेशन का आदेश रद्द किया

Shahadat

9 July 2026 7:35 PM IST

  • दिल्ली हाईकोर्ट ने SBI को अवैध रूप से नौकरी से निकाले गए कर्मचारी को ₹1 लाख देने का आदेश दिया, रेगुलराइज़ेशन का आदेश रद्द किया

    दिल्ली हाईकोर्ट ने लेबर कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया (SBI) को एक कर्मचारी की नौकरी रेगुलर करने के लिए कहा गया था, जिसे अवैध रूप से नौकरी से निकाला गया था। [2026 LiveLaw (Del) 639]

    जस्टिस शैल जैन ने कहा कि इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट, 1947 का उल्लंघन होने पर सरकारी नौकरी में रेगुलर होने का अधिकार अपने आप नहीं मिल जाता।

    हालांकि, बेंच ने SBI को निर्देश दिया कि वह कर्मचारी को अवैध रूप से नौकरी से निकाले जाने से जुड़े सभी दावों के पूर्ण और अंतिम निपटान के लिए ₹1 लाख का एकमुश्त मुआवज़ा दे।

    यह विवाद तब शुरू हुआ, जब प्रतिवादी ने दावा किया कि उसे SBI ने जुलाई 1994 से मई 1995 तक चपरासी के तौर पर काम पर रखा था, लेकिन उसकी सेवाओं को पानी सप्लाई करने वाले के तौर पर दिखाया गया।

    उसने आरोप लगाया कि 1 जून 1995 को बिना किसी नोटिस या छंटनी मुआवज़े के उसकी सेवाएँ समाप्त कर दी गईं।

    हालांकि, SBI का तर्क था कि नियोक्ता-कर्मचारी का कोई संबंध नहीं था और प्रतिवादी केवल शाखा को पानी सप्लाई कर रहा था और कभी-कभी ज़रूरी दस्तावेज़ पहुँचाने के लिए यात्रा खर्च का भुगतान पाता था।

    रिकॉर्ड की जांच करने पर कोर्ट ने पाया कि बैंक द्वारा ही बनाए गए यात्रा वाउचर से पता चलता है कि प्रतिवादी नियमित रूप से चेक और आधिकारिक पत्र पहुंचाने, रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया और अन्य संस्थानों में जाने और तय काम के घंटों के दौरान शाखा के रिकॉर्ड विभाग में काम करने जैसे कर्तव्य निभाता था।

    कोर्ट ने कहा कि इन रिकॉर्ड्स और हर महीने होने वाले भुगतान से यह साबित होता है कि प्रतिवादी शाखा प्रबंधक की देखरेख और नियंत्रण में काम कर रहा था, जिससे सेवा का एक निहित अनुबंध (implied contract) बनता है।

    कोर्ट ने आगे कहा कि प्रतिवादी ने इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट की धारा 25B के तहत 240 दिनों से अधिक समय तक लगातार सेवा की थी।

    चूंकि SBI ने उसकी सेवाएं बंद करने से पहले न तो कोई नोटिस जारी किया था और न ही छंटनी का मुआवज़ा दिया था, इसलिए कोर्ट ने माना कि नौकरी से निकालना धारा 25F की अनिवार्य आवश्यकताओं का उल्लंघन है और यह अवैध है। हालांकि, 'सेक्रेटरी, स्टेट ऑफ़ कर्नाटक बनाम उमादेवी' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि लेबर कोर्ट ने रेगुलराइज़ेशन (नियमितीकरण) का आदेश देकर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया। ऐसा तब हुआ, जब नियुक्ति किसी मान्यता प्राप्त भर्ती प्रक्रिया या मंज़ूरशुदा पद के तहत नहीं की गई, और कर्मचारी ने औद्योगिक विवाद में ऐसी राहत की मांग भी नहीं की थी।

    कोर्ट ने कहा,

    “ट्रिब्यूनल ने ग़ैर-क़ानूनी तरीके से नौकरी से निकाले जाने के बाद बहाली (Reinstatement) को सेवा में नियमितीकरण के बराबर मानकर ग़लती की। जहां बहाली कर्मचारी को नौकरी से निकाले जाने से पहले वाली स्थिति में वापस लाती है, वहीं नियमितीकरण सेवा में स्थायी दर्जा देता है। इसलिए ऐसी राहत के लिए किसी ठोस दावे के बिना और मामले के दायरे से बाहर जाकर नियमितीकरण का आदेश देना ट्रिब्यूनल के फ़ैसला सुनाने के अधिकार क्षेत्र की सीमाओं से बाहर था।”

    आख़िरकार, यह देखते हुए कि प्रतिवादी ने लगभग ग्यारह महीने काम किया और उसे नौकरी से हटाए हुए तीन दशक से ज़्यादा का समय बीत चुका है, कोर्ट ने आठ हफ़्ते के भीतर एकमुश्त मुआवज़ा देने का आदेश दिया।

    Case title: SBI v. Umed Singh

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