दिल्ली हाईकोर्ट का सवाल- पेपर लीक रोकने के लिए Telegram पर बैन लगाना सही है? फ़ैसला सुरक्षित रखा

Shahadat

18 Jun 2026 8:31 PM IST

  • दिल्ली हाईकोर्ट का सवाल- पेपर लीक रोकने के लिए Telegram पर बैन लगाना सही है? फ़ैसला सुरक्षित रखा

    दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार (18 जून) को Telegram की उस याचिका पर अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया, जिसमें केंद्र सरकार के उस फ़ैसले को चुनौती दी गई, जिसके तहत भारत में इस मैसेजिंग प्लेटफ़ॉर्म के इस्तेमाल पर 22 जून तक अस्थायी रोक लगाई गई। यह रोक 21 जून को होने वाली NEET 2026 की दोबारा परीक्षा से पहले पेपर लीक को रोकने के लिए लगाई गई।

    सुनवाई के दौरान, जस्टिस तेजस करिया ने मौखिक रूप से केंद्र से पूछा कि क्या सिर्फ़ इसलिए 15 करोड़ यूज़र्स के अधिकार रोके जा सकते हैं, क्योंकि नागरिकों का समूह (NEET उम्मीदवार) परीक्षा दे रहा है?

    जज ने Telegram से भी मौखिक रूप से पूछा कि क्या उसने कथित पेपर लीक को रोकने के लिए रियल-टाइम मॉनिटरिंग जैसे पर्याप्त कदम उठाए।

    जज ने प्लेटफ़ॉर्म से पूछा,

    "क्या आपका आर्किटेक्चर ऐसा है कि कम सख़्त उपायों से भी ज़रूरत पूरी हो सकती है?"

    Telegram की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट ध्रुव मेहता ने तर्क दिया कि प्लेटफ़ॉर्म के ख़िलाफ़ इमरजेंसी प्रावधान (IT (जानकारी तक पहुँच को ब्लॉक करने की प्रक्रिया और सुरक्षा उपाय) नियम का नियम 9) लागू करने के लिए सेक्रेटरी का संतुष्ट होना बहुत ज़रूरी था। हालांकि, उनका दावा है कि उपलब्ध जानकारी पर कोई सोच-विचार नहीं किया गया, कोई स्वतंत्र संतुष्टि दर्ज नहीं की गई और नियुक्त अधिकारी ने केवल आरोपों को 'दोहराया' (तोते की तरह रटा-रटाया बोला)।

    उन्होंने कहा,

    "आप सेक्शन के शब्दों को दोहरा नहीं सकते। सुप्रीम कोर्ट ने इस नज़रिए की आलोचना की... आपको जानकारी देखनी होगी और फिर यह कहना होगा कि संतुष्टि उस जानकारी के आधार पर हुई।"

    उन्होंने आगे कहा कि ज़्यादा-से-ज़्यादा केंद्र आपत्तिजनक पोस्ट हटाने की मांग कर सकता है, न कि प्लेटफ़ॉर्म पर 'अत्यधिक' या पूरी तरह से बैन लगा सकता है।

    इस मोड़ पर कोर्ट ने वकील से पूछा कि क्या Telegram स्थिति से निपटने के लिए उठाए गए कदमों के बारे में सरकार को संतुष्ट कर पाया।

    जज ने टेलीग्राम से पूछा,

    "आपको IT Act की धारा 79 के तहत ज़रूरी सावधानी बरतनी होगी क्योंकि आप एक इंटरमीडियरी (मध्यस्थ) हैं। धारा 79 एक स्वतंत्र ज़िम्मेदारी है, इसका IT Act की धारा 69A (ब्लॉक करने की शक्ति) से कोई लेना-देना नहीं है... मान लीजिए एक बार पेपर लीक हो जाता है और वह वायरल हो जाता है तो आप रियल-टाइम में क्या कर सकते हैं? एक बार शिकायत मिलने पर... कार्रवाई होने तक नुकसान हो चुका होता है। आपके प्लेटफ़ॉर्म पर किस तरह की रियल-टाइम निगरानी होती है?"

    हालांकि टेलीग्राम ने कहा कि लीक हुआ पेपर असली नहीं था और पेपर लीक के बारे में गलत जानकारी फैलाई गई, लेकिन कोर्ट इससे सहमत नहीं हुआ और मौखिक रूप से कहा,

    "आपको यह कैसे पता? समस्या यह है कि पेपर मौजूद है।"

    दूसरी ओर, केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि टेलीग्राम ऐप का आर्किटेक्चरल डिज़ाइन अलग है, जिससे कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए जांच करना मुश्किल हो जाता है।

    एसजी ने कहा,

    "टेलीग्राम बॉट इंफ्रास्ट्रक्चर की सुविधा देता है, जो बड़ी संख्या में जानकारी फैला सकता है। यह सुविधा अनोखी है क्योंकि यह कम से कम मानवीय निगरानी के साथ जटिल नेटवर्क बनाने की अनुमति देती है।"

    इस संबंध में केंद्र द्वारा दायर एक हलफनामे में कहा गया,

    "टेलीग्राम में कुछ तकनीकी और आर्किटेक्चरल विशेषताएं हैं, जो इसे अन्य मध्यस्थों से अलग करती हैं और प्लेटफॉर्म पर गैर-कानूनी गतिविधियों को रोकने, उनका पता लगाने और उनकी जांच करने की कानून प्रवर्तन एजेंसियों की क्षमता को काफी हद तक प्रभावित करती हैं... टेलीग्राम एक समर्पित बॉट इंफ्रास्ट्रक्चर प्रदान करता है, जो ऐसे ऑटोमेटेड अकाउंट बनाने और उन्हें तैनात करने में सक्षम बनाता है, जो लगातार मानवीय हस्तक्षेप के बिना काम कर सकते हैं। ये बॉट स्वचालित रूप से कंटेंट फैला सकते हैं, उपयोगकर्ताओं को चैनलों पर रीडायरेक्ट कर सकते हैं, बड़ी संख्या में संदेश भेज सकते हैं, जानकारी एकत्र कर सकते हैं और बड़े पैमाने पर अन्य कार्य कर सकते हैं।"

    सॉलिसिटर जनरल ने आगे कहा कि एक बार जब किसी बॉट को ब्लॉक कर दिया जाता है तो वह चैनल को मिरर कर सकता है, यानी उसे स्वचालित रूप से दूसरे बॉट पर रीडायरेक्ट कर दिया जाता है।

    सॉलिसिटर जनरल ने कहा,

    "इसमें किसी मानवीय हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं होती... नतीजतन, व्यक्तिगत बॉट के खिलाफ किए गए प्रवर्तन उपायों का अक्सर केवल अस्थायी प्रभाव पड़ता है, जिससे गैर-कानूनी गतिविधि फिर से शुरू हो जाती है और काफी हद तक उसी तरह से जारी रहती है।"

    एसजी ने टेलीग्राम की "गुमनामी बढ़ाने वाली" विशेषताओं जैसे कि छिपे हुए फोन नंबर, वर्चुअल फोन नंबर, वीपीएन सेवाएं आदि का भी उल्लेख किया और कहा,

    "यह विशेषता जांच के दौरान साजिश में शामिल लोगों की पहचान करने, संचार श्रृंखलाओं का पता लगाने और जिम्मेदारी तय करने की कानून प्रवर्तन एजेंसियों की क्षमता में काफी बाधा डालती है।"

    केंद्र की कार्रवाई के सही या गलत होने (proportionality) पर एसजी ने कहा कि कमिटी इस बात से संतुष्ट थी कि चैनल-स्पेसिफिक उपाय (ब्लॉकिंग) काफी नहीं थे। उन्होंने कहा कि यह रोक अस्थायी है और किसी खास घटना से जुड़ी है।

    कहा गया,

    "परीक्षा 21 जून को थी। अस्थायी और घटना-आधारित कार्रवाई सिर्फ़ सोमवार (22 जून) तक के लिए है। इससे पता चलता है कि सोच-समझकर कदम उठाया गया। जिस संभावित नुकसान को रोकने की कोशिश की जा रही है, उसी के हिसाब से कार्रवाई की गई।"

    हालांकि, कोर्ट ने एसजी से मौखिक रूप से पूछा कि क्या सिर्फ़ इसलिए दूसरे यूज़र्स के अधिकार रोके जा सकते हैं क्योंकि नागरिकों का एक समूह (NEET उम्मीदवार) परीक्षा दे रहा है।

    जस्टिस करिया ने पूछा,

    "क्या हम 15 करोड़ लोगों के अधिकार सिर्फ़ इसलिए रोक सकते हैं, क्योंकि नागरिकों का एक समूह परीक्षा दे रहा है? क्या आप किसी और की सुरक्षा के लिए किसी दूसरे के अधिकार को रोक सकते हैं? क्या तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर आपके अधिकार का इस्तेमाल सही (proportional) है?"

    सॉलिसिटर जनरल ने अनुराधा भसीन मामले के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि कुछ समय के लिए ब्लॉकिंग पर रोक नहीं है।

    एसजी ने कहा,

    "जब किसी राज्य में इंटरनेट बंद किया जाता है, तो हो सकता है कि सिर्फ़ 10% लोग ही उपद्रवी हों।"

    जज ने जवाब दिया कि अगर मामला कानून-व्यवस्था का हो तो ब्लॉकिंग जनहित में हो सकती है।

    आगे कहा गया,

    "यहीं पर 'proportionality' (कार्रवाई के सही या गलत होने) की जांच आती है। क्या आपने यहां बड़े पैमाने पर जनहित पर विचार किया?"

    इसके बाद एसजी ने कहा कि टेलीग्राम पर तारीख और समय में बदलाव (एडिटिंग) किया जा सकता है।

    उन्होंने कहा,

    "वे आज कुछ एडिट करके पोस्ट कर सकते हैं और कह सकते हैं कि यह (पेपर) पहले से ही 19 जून को उपलब्ध था। यहीं पर कानून-व्यवस्था का मामला आता है... जब संभावित नुकसान बहुत बड़ा हो तो सिर्फ़ 'proportionality' के आधार पर विचार नहीं किया जा सकता... 22 लाख छात्र परीक्षा दे रहे हैं... इसमें कानून-व्यवस्था और अपराध के लिए उकसाने जैसे कारक शामिल हैं... छात्र सड़कों पर उतर सकते हैं और कुछ भी कर सकते हैं..."

    एसजी ने आगे कहा कि केंद्र ने "सबसे कम पाबंदी वाला" (least restrictive) उपाय अपनाया है, जबकि टेलीग्राम ने खुद माना है कि "वे इससे ज़्यादा कुछ नहीं कर सकते और वे इस पर विचार कर रहे हैं।"

    अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने भी कहा,

    "जो अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभा सकता, वह 'proportionality' की बात नहीं कर सकता। मैं कहूंगा कि अपने अनोखे आर्किटेक्चर की वजह से यह प्लेटफॉर्म एक 'फ्रेंकस्टीन' (बेकाबू चीज़) जैसा है। अगर हमारा देश एहतियाती कदम नहीं उठा सकता तो हम कहां जाएंगे? पैसे कमाने के लिए बनाया गया प्लेटफॉर्म 'proportionality' का तर्क दे रहा है?"

    टेलीग्राम पर अस्थायी ब्लॉकिंग का आदेश नेशनल टेस्टिंग एजेंसी और शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग की सिफारिशों के बाद जारी किया गया। टेलीग्राम का कहना है कि उसने NEET से जुड़े गैर-कानूनी कंटेंट वाले 900 से ज़्यादा लिंक हटाकर पहले से ही ज़रूरी कदम उठाए । इसमें प्लेटफ़ॉर्म पर गैर-कानूनी जानकारी से निपटने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग टूल्स का इस्तेमाल करना भी शामिल है।

    उसका यह भी कहना है कि विवादित आदेश बहुत ज़्यादा सख़्त है। इससे भारत में 15 करोड़ से ज़्यादा यूज़र्स वाले प्लेटफ़ॉर्म को पूरी तरह बंद करना पड़ रहा है, जिनमें लाखों छात्र और शिक्षक शामिल हैं जो NEET जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए इस प्लेटफ़ॉर्म पर निर्भर हैं।

    टेलीग्राम ने यह भी कहा कि उसे 2009 के नियमों के नियम 8 के तहत अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया – जबकि वह पिछले कुछ हफ़्तों से सभी अधिकृत एजेंसियों के साथ लगातार संपर्क में था।

    इस कार्रवाई पर प्रतिक्रिया देते हुए टेलीग्राम के CEO पावेल डुरोव ने X पर एक पोस्ट में कहा कि इस कार्रवाई से भारत में 15 करोड़ से ज़्यादा आम टेलीग्राम यूज़र्स को सज़ा मिल रही है, न कि उन "अंदरूनी लोगों" को जिन्होंने परीक्षा का मटीरियल लीक किया।

    पोस्ट में आगे कहा गया,

    "और बैन लगाने से कुछ भी नहीं रुका है। लीक का मामला बस दूसरे ऐप्स पर चला गया। पिछले कुछ हफ़्तों में, हमने भारत में परीक्षा का लीक मटीरियल और उससे जुड़े स्कैम शेयर करने वाले सैकड़ों चैनल हटाए हैं। हम 'एडिटेड' (बदलाव किए गए) लेबल को भी ज़्यादा साफ़ तौर पर दिखा रहे हैं ताकि पुरानी तारीख़ डालकर किए जाने वाले स्कैम को रोका जा सके। टेलीग्राम अच्छाई के लिए काम करने वाली ताकत है। इस पर बैन लगाना – भले ही कुछ समय के लिए ही क्यों न हो – एक गलती है।"

    नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने कल जारी एक प्रेस रिलीज़ में टेलीग्राम के संबंध में दिए गए निर्देशों का स्वागत किया।

    Case Title: TELEGRAM FZ LLC & ANR v. UNION OF INDIA & ORS

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