व्यभिचार मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को दिल्ली हाईकोर्ट ने किया बरी, कहा- Section 497 IPC अब कानून का हिस्सा नहीं
Praveen Mishra
14 May 2026 4:32 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने व्यभिचार (Adultery) के मामले में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 497 को असंवैधानिक घोषित किए जाने के बाद इस प्रावधान के तहत दी गई सजा कायम नहीं रह सकती।
जस्टिस विमल कुमार यादव की पीठ ने कहा कि एक बार जब सुप्रीम कोर्ट ने Joseph Shine v. Union of India मामले में धारा 497 IPC को संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन मानते हुए रद्द कर दिया, तो यह कानून की किताब से समाप्त हो गई।
कोर्ट ने कहा,
“ऐसी स्थिति में अपीलकर्ता को धारा 497 IPC के तहत दोषी ठहराने वाला आदेश टिक नहीं सकता, क्योंकि यह धारा अब अस्तित्व में नहीं है।”
क्या था मामला?
अभियोजन के अनुसार आरोपी और उसकी पत्नी पीड़िता के घर में किराएदार थे। आरोप था कि आरोपी की पत्नी ने पीड़िता को नशीला पदार्थ दिया, जिसके बाद आरोपी ने उसके साथ दुष्कर्म किया और कथित अश्लील वीडियो के जरिए उसे धमकाया। इस संबंध से एक बच्चे का जन्म भी हुआ।
हालांकि ट्रायल कोर्ट ने आरोपी और उसकी पत्नी को IPC की धारा 376 (बलात्कार) और 384 (जबरन वसूली) के आरोपों से बरी कर दिया था, लेकिन आरोपी को धारा 497 IPC के तहत दोषी ठहराते हुए तीन साल की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि 2019 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा धारा 497 को असंवैधानिक घोषित किए जाने का प्रभाव पूर्वव्यापी (retrospective) भी होगा। इसलिए इस मामले में आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
'नियोग प्रथा' पर कोर्ट की टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि यह मामला महाभारत काल की “नियोग प्रथा” का आधुनिक रूप प्रतीत होता है।
कोर्ट ने कहा,
“महाभारत काल की नियोग प्रथा आधुनिक समय में नए स्वरूप में सामने आई है। उस समय भी संबंध केवल उद्देश्य पूरा होने तक सीमित रहते थे।”
अंततः हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए आरोपी को व्यभिचार के आरोप से बरी कर दिया और उसके जमानती बांड भी समाप्त कर दिए।

