दिल्ली हाईकोर्ट की रोक: सरकारी अभियोजकों के लिए आधार से बायोमेट्रिक अटेंडेंस अनिवार्य नहीं
Amir Ahmad
9 Oct 2026 2:23 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकारी अभियोजकों के लिए आधार आधारित बायोमेट्रिक हाजिरी अनिवार्य करने के दिल्ली सरकार के अभियोजन निदेशालय के आदेश पर रोक लगाई। जस्टिस अमित महाजन ने दिल्ली प्रॉसिक्यूटर्स वेलफेयर एसोसिएशन की याचिका पर यह आदेश पारित किया।
केंद्र ने दलील दी थी कि अभियोजन अधिकारियों की जिम्मेदारियां केवल कार्यालय तक सीमित नहीं होतीं। उन्हें अदालतों में पेश होने के साथ-साथ जेलों, पुलिस थानों और फॉरेंसिक साइंस लैब में भी जाना पड़ता है। ऐसे में तय कार्यालयी समय के अनुसार हाजिरी दर्ज करने की अनिवार्यता उनके कामकाज में बाधा डाल सकती है।
अभियोजन निदेशालय ने 5 अक्टूबर को जारी आदेश में मुख्य लोक अभियोजकों, अतिरिक्त लोक अभियोजकों और सहायक लोक अभियोजकों को आधार सक्षम बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली पर पंजीकरण कराने और रोजाना अपनी हाजिरी दर्ज करने का निर्देश दिया। इसके लिए बायोमेट्रिक मशीन या चेहरे की पहचान करने वाली मोबाइल ऐप का इस्तेमाल किया जाना था। आदेश में यह भी कहा गया कि निर्देशों का पालन नहीं करने पर संबंधित नियमों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
दिल्ली प्रॉसिक्यूटर्स वेलफेयर एसोसिएशन ने इस आदेश के साथ अनिवार्य बायोमेट्रिक हाजिरी से जुड़े पहले के परिपत्रों को भी चुनौती दी।
केंद्र का कहना है कि अभियोजन अधिकारी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 18 और 19 के तहत नियुक्त किए जाते हैं और उनका प्रमुख कार्य अदालतों में अभियोजन पक्ष का प्रतिनिधित्व करना है। अदालत में उनकी उपस्थिति रोजाना न्यायिक आदेश-पत्रों में दर्ज होती है, इसलिए केवल कार्यालय आधारित हाजिरी प्रणाली उनकी ड्यूटी की वास्तविक प्रकृति को नहीं दर्शाती।
याचिका में अनिवार्य आधार प्रमाणीकरण को निजता के अधिकार से जुड़ा मुद्दा भी बताया गया। संघ ने आधार अधिनियम, 2016 की धाराओं 4(3) और 8 तथा सुप्रीम कोर्ट के निजता संबंधी फैसले का हवाला देते हुए कहा कि बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के आधार प्रमाणीकरण अनिवार्य करना कानून के अनुरूप नहीं है। याचिका में इस व्यवस्था को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार का अतिक्रमण और अनुच्छेद 14 के तहत मनमाना कदम बताया गया।
केंद्र ने अदालत को बताया कि आदेश के अनुसार अभियोजकों को अपने निर्धारित अदालत परिसर में आने और ड्यूटी के समय के मुताबिक वहां से जाने की हाजिरी दर्ज करनी होगी। लेकिन कई बार उन्हें दूसरे अदालत परिसरों में पेश होना पड़ता है या जेल, पुलिस थाने और फॉरेंसिक साइंस लैब में जाना पड़ता है। इसके अलावा जांच और मुकदमों से संबंधित अन्य कार्य भी करने होते हैं। याचिका के मुताबिक, इस तरह की आवाजाही को दिन के बीच कार्यालय से बाहर जाने के रूप में दर्ज कर बाद में साप्ताहिक आधार पर नियमित करने की व्यवस्था अनावश्यक प्रशासनिक बोझ पैदा करती है।
केंद्र ने आशंका जताई कि इस व्यवस्था के कारण मुख्य लोक अभियोजकों को अधिकारियों की नियमित न्यायिक गतिविधियों और आवाजाही का हिसाब रखने में अतिरिक्त समय लगाना पड़ेगा। इससे अभियोजन अधिकारियों का ध्यान उनके मूल काम से हट सकता है और रिमांड, जमानत तथा मुकदमों की सुनवाई में देरी हो सकती है। याचिका में कहा गया कि ऐसी स्थिति आपराधिक न्याय व्यवस्था के प्रभावी संचालन और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित सुनवाई के अधिकार को भी प्रभावित कर सकती है।
यह मामला पहले भी हाईकोर्ट पहुंचा था। अदालत ने दिल्ली सरकार को संघ का पक्ष सुनने के बाद अनिवार्य बायोमेट्रिक हाजिरी के खिलाफ उसके प्रतिवेदन पर निर्णय लेने का निर्देश दिया। संघ ने आरोप लगाया कि उसकी आपत्तियों को खारिज करते समय अधिकारियों ने पर्याप्त कारण दर्ज नहीं किए और उसकी चिंताओं पर उचित विचार नहीं किया।
हाईकोर्ट ने अब आधार आधारित बायोमेट्रिक हाजिरी अनिवार्य करने वाले आदेश पर रोक लगाई। याचिका में उठाए गए प्रमुख सवाल अभियोजन अधिकारियों की कार्यप्रणाली, आधार प्रमाणीकरण की अनिवार्यता और निजता के अधिकार से जुड़े हैं।

