मेडिकल रिव्यू के कारण हुई देरी BSF उम्मीदवारों की पिछली तारीख से सीनियरिटी को सही नहीं ठहरा सकती: दिल्ली हाईकोर्ट
Shahadat
6 Jan 2026 6:38 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट की फुल बेंच ने फैसला सुनाया कि मेडिकल री-एग्जामिनेशन के कारण हुई देरी के बाद बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (BSF) में नियुक्त उम्मीदवार उन बैचमेट्स से सीनियरिटी का दावा नहीं कर सकते, जिन्होंने पहले सर्विस जॉइन की थी, भले ही देरी उनकी गलती से न हुई हो।
जस्टिस सी. हरि शंकर, जस्टिस ज्योति सिंह और जस्टिस अजय डिगपाल की तीन-जजों की बेंच ने इस तरह उन डायरेक्ट रिक्रूट्स की सीनियरिटी के मुद्दे पर कोर्ट की अलग-अलग डिवीजन बेंचों द्वारा लिए गए विरोधाभासी विचारों को सुलझाया, जिनकी नियुक्तियां मेडिकल रिव्यू के कारण टाल दी गई थीं।
कोर्ट ने कहा,
“इन रिट याचिकाओं में याचिकाकर्ता उन लोगों के साथ सीनियरिटी का दावा नहीं कर सकते, जिन्होंने उनके साथ सिलेक्शन में हिस्सा लिया लेकिन पहले जॉइन किया, क्योंकि याचिकाकर्ताओं की जॉइनिंग RME (रिव्यू मेडिकल एग्जामिनेशन) के कारण देरी से हुई। यह तथ्य कि यह देरी याचिकाकर्ताओं की गलती से नहीं हुई, कानूनी स्थिति को प्रभावित नहीं कर सकता। यह उन लोगों की भी गलती नहीं है, जिन्होंने याचिकाकर्ताओं से पहले जॉइन किया।”
कोर्ट BSF सब-इंस्पेक्टर (GD) उम्मीदवारों द्वारा दायर याचिकाओं के एक बैच पर सुनवाई कर रहा था, जिन्होंने उसी भर्ती प्रक्रिया में हिस्सा लिया लेकिन शुरू में उन्हें मेडिकली अनफिट घोषित कर दिया गया। हालांकि, बाद में रिव्यू मेडिकल बोर्ड द्वारा उन्हें फिट पाया गया और नियुक्त किया गया, लेकिन उनके बैचमेट्स की तुलना में उनकी जॉइनिंग में देरी हुई।
याचिकाकर्ताओं ने इस आधार पर पिछली तारीख से सीनियरिटी की मांग की कि नियुक्ति में देरी प्रक्रियागत खामियों और उनके नियंत्रण से बाहर की मेडिकल रिव्यू प्रक्रियाओं के कारण हुई। उन्होंने तर्क दिया कि सीनियरिटी नियुक्ति की तारीख के बजाय सिलेक्शन प्रक्रिया में मेरिट के आधार पर तय की जानी चाहिए।
उक्त दावा खारिज करते हुए फुल बेंच ने कहा कि BSF जनरल ड्यूटी कैडर (नॉन-गजेटेड) भर्ती नियम, 2002 का नियम 8 स्पष्ट रूप से कहता है कि एक रैंक में सीनियरिटी “लगातार नियमित नियुक्ति” के आधार पर तय की जाएगी, न कि सिलेक्शन की तारीख के आधार पर।
कोर्ट ने कहा,
“अगर एक ही सिलेक्शन प्रक्रिया में चुने गए लोगों में से नियुक्तियां एक ही समय पर नहीं होती हैं तो नियम 8(2) के अनुसार, जो लोग बाद में नियुक्त हुए हैं, वे पहले नियुक्त हुए लोगों से जूनियर होंगे।”
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि नियम 8(3), जो मेरिट के अनुसार सीनियरिटी तय करने की बात करता है, वह स्पष्ट रूप से नियम 8(2) के अधीन है।
इसमें कहा गया,
"यह तभी होगा जब सभी को एक ही समय पर नियुक्त किया गया हो। इसलिए उनकी 'लगातार नियमित नियुक्ति' की तारीखें एक ही हों, तभी नियम 8(3) के तहत उनकी आपसी मेरिट उनकी आपसी सीनियरिटी तय करेगी।"
फुल बेंच ने शूरवीर सिंह नेगी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2015) में अपनाए गए तर्क को मंज़ूरी दी और राम पाल देसवाल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2011) के फैसले को रद्द कर दिया, जिसने नियम 8(2) को सिर्फ़ प्रमोशन तक सीमित कर दिया था।
नतीजतन, कोर्ट ने सभी रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया।
Case title: Jai Mangal Rai v. UoI (and batch)

