अगर प्रॉस्पेक्टस में कुछ नहीं कहा गया है तो संस्थानों में मिलाकर पीजी रेजिडेंसी मान्य: दिल्ली हाईकोर्ट ने AIIMS द्वारा टॉप रैंक होल्डर का रिजेक्शन रद्द किया
Shahadat
3 Feb 2026 8:13 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) का फैसला रद्द किया, जिसमें डीएम (क्रिटिकल केयर मेडिसिन) कोर्स में एडमिशन के लिए टॉप-रैंक होल्डर की उम्मीदवारी रद्द कर दी गई। कोर्ट ने कहा कि जब प्रॉस्पेक्टस में किसी एक संस्थान से ट्रेनिंग अनिवार्य नहीं है तो 1,095 दिनों की पोस्टग्रेजुएट रेजिडेंसी को संस्थानों में मिलाकर माना जा सकता है।
जस्टिस जसमीत सिंह ने कहा कि AIIMS एडमिशन के आखिरी स्टेज पर कोई अतिरिक्त एलिजिबिलिटी शर्त नहीं लगा सकता, जब सिलेक्शन प्रोसेस को कंट्रोल करने वाला प्रॉस्पेक्टस ऐसी किसी शर्त के बारे में चुप था।
बेंच ने कहा,
“मेरे विचार से, क्लॉज 4.3.2 और रेगुलेशन 2.1 दोनों को एक साथ पढ़ने से पता चलता है कि इसके लिए तय तारीख तक 3 साल की “आवश्यक योग्यता, डिग्री और कार्यकाल” की ज़रूरत है। उपरोक्त क्लॉज इस बात पर पूरी तरह से चुप है कि 3 साल की शर्त किसी एक संस्थान से पूरी होनी चाहिए या इसे अलग-अलग समय में पूरा करने पर भी माना जा सकता है।”
याचिकाकर्ता ने इंस्टीट्यूट ऑफ नेशनल इंपॉर्टेंस सुपर-स्पेशियलिटी एंट्रेंस एग्जाम में अच्छी रैंक हासिल की थी। उसे प्रोविजनली सिलेक्ट किया गया। हालांकि, AIIMS ने बाद में उसकी उम्मीदवारी इस आधार पर रद्द की कि उसकी तीन साल की पोस्टग्रेजुएट रेजिडेंसी एक से ज़्यादा संस्थानों में पूरी हुई।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि प्रॉस्पेक्टस में सिर्फ 1095 दिनों की पीजी ट्रेनिंग पूरी करने की शर्त थी और यह नहीं कहा गया कि रेजिडेंसी किसी एक संस्थान में ही करनी होगी।
दूसरी ओर, AIIMS ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि एक संस्थान में रेजिडेंसी की निरंतरता एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया में निहित थी और एकेडमिक स्टैंडर्ड बनाए रखने के लिए ज़रूरी थी।
इस तर्क को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा,
“प्रतिवादी का यह तर्क कि ऐसी शर्त निहित है और प्रोफेशनल क्षमता सुनिश्चित करने के हित में है, तर्कहीन है। कोई भी एलिजिबिलिटी शर्त स्पष्ट, साफ और सभी पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।”
इसमें आगे कहा गया,
“प्रतिवादी नंबर 1 संस्थान द्वारा जारी प्रॉस्पेक्टस का क्लॉज 4.3.2 सिर्फ 1095 दिनों की रेजिडेंसी की शर्त रखता है। यह नहीं कि यह लगातार और सिर्फ एक मान्यता प्राप्त संस्थान से होनी चाहिए। जब प्रॉस्पेक्टस की भाषा स्पष्ट और साफ है तो प्रतिवादी नंबर 1 संस्थान को इसमें शब्द जोड़ने और इस तरह से व्याख्या करने का अधिकार नहीं है, जो सीधे पढ़ने से पता नहीं चलता।” कोर्ट ने आगे कहा कि हालांकि एकेडमिक मामलों में आम तौर पर न्यायिक संयम बरता जाता है, लेकिन यह छूट उन स्थितियों पर लागू नहीं होती, जहां कोई एकेडमिक अथॉरिटी मनमाने तरीके से या गवर्निंग प्रॉस्पेक्टस के खिलाफ जाकर काम करती है।
इसलिए कोर्ट ने AIIMS के याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी को खारिज करने का फैसला रद्द किया और निर्देश दिया कि उसका एडमिशन कानून के अनुसार प्रोसेस किया जाए।
Case title: Meet Bhadresh Shah v. All India Institute Of Medical Sciences & Ors.

