CPF विकल्प चुनने के बाद CCS नियमों के तहत पेंशन का दावा करने के लिए इसे बदला नहीं जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट
Shahadat
5 April 2026 6:04 PM IST

जस्टिस संजीव नरूला की अध्यक्षता वाली दिल्ली हाईकोर्ट की बेंच ने फैसला सुनाया कि कोई भी कर्मचारी जिसने CPF योजना के तहत बने रहने का विकल्प चुना है, वह बाद में CCS पेंशन नियमों के तहत पेंशन लाभों का दावा नहीं कर सकता, क्योंकि 'मानित रूपांतरण' (Deemed Conversion) केवल वहीं लागू होता है जहाँ कोई विकल्प नहीं चुना गया।
पृष्ठभूमि के तथ्य
याचिकाकर्ता एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन काउंसिल (EIC) और एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन एजेंसियों (EIAs) के पूर्व कर्मचारियों का एक समूह हैं। उन्होंने केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 के तहत पेंशन का दावा किया। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन काउंसिल पेंशन और सामान्य भविष्य निधि नियम, 1981 के माध्यम से इसे उनके संस्थान तक बढ़ाया गया।
हालांकि, उन्हें केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 के तहत पेंशन देने से मना किया गया। इससे व्यथित होकर याचिकाकर्ताओं ने दिल्ली हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह तर्क दिया गया कि एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन काउंसिल पेंशन और सामान्य भविष्य निधि नियम, 1981 के बनने के बाद—जिसे 1 मई, 1987 के कार्यालय ज्ञापन के साथ पढ़ा जाना चाहिए—कर्मचारी पेंशन व्यवस्था के दायरे में आ गए, जब तक कि वे CPF योजना के तहत बने रहने का विकल्प न चुन लें।
आगे यह भी तर्क दिया गया कि वैधानिक परिवर्तनों के कारण CPF व्यवस्था को बदल दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने आगे तर्क दिया कि उन्होंने अंशदायी भविष्य निधि (CPF) के तहत बने रहने का कोई विकल्प नहीं चुना था। इसलिए उन्हें पेंशन व्यवस्था द्वारा शासित माना जाना चाहिए।
इसके अलावा, याचिकाकर्ताओं ने 1991 की समकालीन सामग्री पर भी भरोसा किया—जिसमें EIC के आंतरिक नोट्स और 20 अगस्त, 1991 का एक EIC पत्र शामिल था—यह तर्क देने के लिए कि प्रतिवादियों ने स्वयं उन कर्मचारियों के लिए भी पेंशन लाभों को मंजूरी दी थी, जिन्हें उस समय 'अतिरिक्त' (surplus) घोषित किया जा रहा था।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि EIC और EIAs के कर्मचारी सरकारी कर्मचारी नहीं थे। उनकी सेवा शर्तें CPF योजना के तहत एक अलग ढांचे द्वारा शासित थीं। प्रतिवादियों ने उन विकल्प प्रपत्रों (Option Forms) पर भरोसा किया, जिनसे यह संकेत मिलता था कि याचिकाकर्ताओं ने CPF योजना के तहत बने रहने का विकल्प चुना था। यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ताओं ने सेवा से बाहर निकलते समय 'टर्मिनल लाभ' (सेवा-समाप्ति लाभ) स्वीकार कर लिए थे।
अदालत के निष्कर्ष
अदालत ने यह पाया कि प्रतिवादियों ने याचिकाकर्ताओं के विकल्प फॉर्म रिकॉर्ड पर रखे थे, जिनमें 1 मई, 1987 के कार्यालय ज्ञापन के अनुसार CPF योजना के तहत जारी रहने के चुनाव का रिकॉर्ड शामिल था। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ताओं का यह इनकार कि उन्होंने कभी ऐसा कोई विकल्प नहीं चुना था, गलत साबित हो गया।
अदालत ने 20 अगस्त, 1991 के पत्र की जांच की और पाया कि रिकॉर्ड में दोनों व्यवस्थाओं के बीच का अंतर सुरक्षित रखा गया। पत्र में CPF योजना के तहत आने वालों के लिए पूर्ण CPF योगदान और 1981 के नियमों के तहत आने वालों के लिए पेंशन का प्रावधान था।
याचिकाकर्ता नंबर 11 के संबंध में अदालत ने पाया कि उन्होंने एक विशेष स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना के तहत सेवा छोड़ी थी और एकमुश्त पूर्ण और अंतिम निपटान के रूप में लाभ स्वीकार किए थे।
शिव प्रकाश सक्सेना और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य मामले में दिए गए निर्णय पर भरोसा किया गया, जिसमें यह माना गया कि एक बार कर्मचारियों द्वारा विशेष स्वैच्छिक रिटायरमेंट योजना के लाभ स्वीकार कर लिए जाने के बाद उस योजना से उत्पन्न होने वाले दावों को दोबारा खोलने की अनुमति नहीं है।
इसलिए अदालत ने यह माना कि जो कर्मचारी विशेष स्वैच्छिक रिटायरमेंट पैकेज लेकर रिटायर हुआ है, वह उस कर्मचारी के साथ समानता का दावा नहीं कर सकता जो सामान्य प्रक्रिया के तहत रिटायर हुआ हो।
अदालत ने यह माना कि 'मानित रूपांतरण' (deemed conversion) का सिद्धांत केवल उन लोगों पर लागू होता है, जिन्होंने कोई वैध विकल्प नहीं चुना था। इसके अलावा, यह भी माना गया कि जो कर्मचारी CPF योजना के तहत जारी रहा, वह उस कर्मचारी के साथ समानता का दावा नहीं कर सकता जो इस योजना के तहत जारी नहीं रहा।
उपर्युक्त टिप्पणियों के साथ कर्मचारियों द्वारा दायर याचिका अदालत ने खारिज की।
Case Name : Debasis Das Gupta & Ors. v. Union of India & Ors.

