बच्चे से मन-मुताबिक मुलाकात न होने पर पति पत्नी के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई नहीं मांग सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

  • बच्चे से मन-मुताबिक मुलाकात न होने पर पति पत्नी के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई नहीं मांग सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चे को कोई वस्तु नहीं माना जा सकता, जिसे किसी अभिभावक से प्रभावी मुलाकात के लिए मजबूर किया जाए। बच्चे के साथ भावनात्मक जुड़ाव प्यार, देखभाल और समय देने से विकसित होता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इस वजह से पत्नी के खिलाफ अदालत की अवमानना का मामला नहीं बनता कि पति की बच्चे से मुलाकात उसकी अपेक्षा के मुताबिक नहीं हुई।

    जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने यह टिप्पणी पति की ओर से दायर अवमानना याचिका का निपटारा करते हुए की। पति ने आरोप लगाया था कि पत्नी ने बच्चे के जन्मदिन पर उससे मुलाकात कराने के संबंध में फैमिली कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया।

    फैमिली कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि पत्नी 10 सितंबर को दोपहर 12 बजे बच्चे को अदालत के बाल मुलाकात कक्ष में लेकर आएगी, जहां से पति बच्चे को अपने साथ ले जाएगा। उसी दिन शाम करीब पांच बजे पति को बच्चे को वापस पत्नी के सुपुर्द करना था।

    पति का आरोप था कि पत्नी आदेश के पालन में बच्चे को लेकर तो पहुंची, लेकिन उसने बच्चे को अपने साथ ले जाने में बाधा डाली और जोर दिया कि जन्मदिन का समारोह अदालत परिसर में ही मनाया जाए। पति ने यह भी बताया कि उसने फैमिली कोर्ट जज से संपर्क किया। जज ने बच्चे और पत्नी को समझाने की कोशिश की, लेकिन आदेश का प्रभावी ढंग से पालन नहीं हो सका।

    मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस कृष्णा ने कहा कि पत्नी बच्चे को लेकर अदालत पहुंची। ऐसे में उपलब्ध परिस्थितियों से आदेश की जानबूझकर अवहेलना साबित नहीं होती, जो अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए जरूरी है।

    अदालत ने कहा,

    “बच्चा कोई वस्तु नहीं है, जिसे प्रभावी मुलाकात के लिए मजबूर किया जा सके। वह एक बच्चा है, जिसका पालन-पोषण और देखभाल की जानी चाहिए। याचिकाकर्ता को उसके साथ ऐसा भावनात्मक संबंध विकसित करना होगा, जिससे प्रभावी मुलाकात संभव हो सके।”

    पीठ ने आगे कहा कि केवल मुलाकात पति की संतुष्टि के अनुरूप नहीं होने से वह पत्नी पर अदालत की अवमानना करने का आरोप नहीं लगा सकता।

    हाईकोर्ट ने अवमानना याचिका का निपटारा करते हुए पति को प्रिंसिपल फैमिली जज के समक्ष जाने की छूट दी। अदालत ने कहा कि फैमिली कोर्ट दोनों पक्षों को समझा सकता है और अपने आदेशों के अनुरूप बच्चे से प्रभावी मुलाकात सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठा सकता है।

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