अवैध बर्खास्तगी पर सफाई कर्मी को 1 लाख रुपये मुआवजा बरकरार, लेकिन पुनर्बहाली से इनकार: दिल्ली हाइकोर्ट
Amir Ahmad
22 Jan 2026 1:19 PM IST

दिल्ली हाइकोर्ट ने उत्तर दिल्ली नगर निगम (MCD) और एक सफाई कर्मी द्वारा दायर क्रॉस याचिकाओं को खारिज करते हुए औद्योगिक न्यायाधिकरण का आदेश बरकरार रखा है, जिसमें अवैध रूप से सेवा समाप्त करने के लिए सफाई कर्मी को 1 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया।
हालांकि, हाइकोर्ट ने कर्मचारी की पुनर्बहाली और पिछला वेतन देने की मांग को स्वीकार नहीं किया।
जस्टिस मनोज कुमार ओहरी ने अपने फैसले में कहा कि सफाई कर्मी की सेवाएं औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 25एफ के अनिवार्य प्रावधानों का पालन किए बिना समाप्त की गई थीं, जिससे बर्खास्तगी अवैध हो जाती है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि औद्योगिक न्यायाधिकरण ने जानबूझकर पुनर्बहाली के बजाय केवल मौद्रिक मुआवजे तक राहत सीमित रखी थी, क्योंकि दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी की सेवाएं, पुनर्बहाली के बाद भी, प्रबंधन द्वारा कानून के अनुसार दोबारा समाप्त की जा सकती हैं।
मामले के अनुसार, सफाई कर्मी की नियुक्ति वर्ष 2005 में अनुकंपा आधार पर हुई। वह जुलाई, 2008 तक सेवा में रहा, इसके बाद लगभग तीन वर्षों तक अनुपस्थित रहा। जनवरी, 2012 में बिना कोई नोटिस दिए और बिना सुनवाई का अवसर प्रदान किए उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं।
हाइकोर्ट ने यह दर्ज किया कि MCD ने स्वयं स्वीकार किया कि सेवा समाप्ति से पहले धारा 25एफ के तहत कोई नोटिस नहीं दिया गया, जिससे यह कार्रवाई कानूनन अवैध ठहरती है।
MCD की इस दलील को भी कोर्ट ने खारिज कर दिया कि लंबे समय तक अनधिकृत अनुपस्थिति के कारण बिना वैधानिक प्रक्रिया अपनाए सेवा समाप्त की जा सकती थी।
कोर्ट ने कहा कि यदि इसे दंडात्मक कार्रवाई भी माना जाए, तो भी बिना किसी विभागीय जांच के की गई बर्खास्तगी दोषपूर्ण है।
राहत के प्रश्न पर हाइकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के बीएसएनएल बनाम भूरूमल मामले का हवाला देते हुए दोहराया कि अवैध बर्खास्तगी के हर मामले में पुनर्बहाली स्वतः नहीं होती, विशेष रूप से तब जब मामला दैनिक वेतन या निम्न श्रेणी के कर्मचारियों का हो और अवैधता केवल प्रक्रियात्मक चूक के कारण हुई हो। ऐसे मामलों में एकमुश्त मुआवजा देना न्याय के हित में उपयुक्त होता है।
कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि मामले को लंबा समय बीत चुका है, कर्मचारी का पद अस्थायी प्रकृति का था और पुनर्बहाली के बाद भी नियोक्ता विधि अनुसार उसकी सेवाएं समाप्त कर सकता है। इन परिस्थितियों में कोर्ट ने कहा कि पुनर्बहाली का आदेश देना किसी सार्थक उद्देश्य की पूर्ति नहीं करेगा।
इन्हीं कारणों से दिल्ली हाइकोर्ट ने औद्योगिक न्यायाधिकरण का मुआवजे से संबंधित आदेश बरकरार रखा और दोनों पक्षों की याचिकाएं खारिज कर दीं।

