शिकायतकर्ता से पैसों का समझौता जमानत का आधार नहीं, शर्त पूरी न होने पर भी जमानत रद्द नहीं की जा सकती: दिल्ली हाईकोर्ट
Amir Ahmad
24 Sept 2026 1:32 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि किसी आरोपी की स्वतंत्रता को शिकायतकर्ता के साथ हुए मौद्रिक समझौते की शर्तें पूरी करने से नहीं जोड़ा जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी वित्तीय समझौते के आधार पर हिरासत को पैसे की वसूली का जरिया नहीं बनाया जा सकता।
जस्टिस संजीव नरूला ने बैंक धोखाधड़ी के मामले में यह टिप्पणी करते हुए वह आदेश रद्द किया, जिसके तहत आरोपी को जमानत दी गई थी और बाद में समझौते के तहत बैंक को रकम चुकाने में विफल रहने पर उसकी जमानत भी रद्द कर दी गई।
हाईकोर्ट ने सेशन कोर्ट को आरोपी की जमानत याचिका पर नए सिरे से उसके गुण-दोष के आधार पर फैसला करने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस दौरान शिकायतकर्ता के साथ हुआ समझौता और उसके तहत चुकाई गई 45 लाख रुपये की रकम को बेल देने या खारिज करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
मामला 2018 में आर्थिक अपराध शाखा द्वारा दर्ज FIR से जुड़ा है। आरोपी गुरमीत सिंह पर IPC की धारा 406, 419, 420, 468, 471 और 120B के तहत मामला दर्ज किया गया।
मामला पंजाब नेशनल बैंक द्वारा दशमेश एंटरप्राइजेज को दी गई 50 लाख रुपये की कैश-क्रेडिट सुविधा से संबंधित था। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि यह सुविधा फर्जी दस्तावेजों और ऐसे व्यक्ति के नाम पर कथित तौर पर तैयार की गई गारंटी के आधार पर हासिल की गई, जिसकी 2013 में ही मृत्यु हो चुकी है।
आरोपी को अगस्त 2022 में गिरफ्तार किया गया। नवंबर 2022 में सेशन कोर्ट ने उसे नियमित जमानत दी। जमानत आदेश में दर्ज किया गया कि पक्षकारों के बीच समझौता हुआ, जिसके तहत बैंक को 45 लाख रुपये का भुगतान किया गया और आरोपी ने शेष रकम छह महीने के भीतर चुकाने का वादा किया। जमानत को समझौते की शर्तों के पालन से जोड़ दिया गया।
बाद में आरोपी ने कोई और भुगतान नहीं किया तो बैंक ने उसकी जमानत रद्द करने की मांग की। अक्टूबर 2023 में सेशन कोर्ट ने समझौते की शर्त पूरी नहीं करने के आधार पर जमानत रद्द की।
हाईकोर्ट ने दोनों आदेशों को रद्द करते हुए कहा कि मौद्रिक समझौते का पालन न होना अपने आप में न तो जमानत देने का आधार हो सकता है और न ही जमानत रद्द करने का।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सिद्धांतों का हवाला देते हुए जस्टिस नरूला ने कहा कि आरोपी को जमानत देते समय सेशन कोर्ट ने जमानत से जुड़े सामान्य पहलुओं पर पर्याप्त विचार नहीं किया था। अदालत ने कहा कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों से संबंधित सामग्री, उसकी हिरासत की जरूरत, उसके फरार होने की संभावना, गवाहों को प्रभावित करने या सबूतों से छेड़छाड़ का खतरा और उसके पूर्व रिकॉर्ड जैसे पहलुओं का आकलन नहीं किया गया।
अदालत ने कहा,
“वित्तीय समझौता उस न्यायिक आकलन का स्थान ले बैठा, जिसकी बेल याचिका पर सुनवाई के दौरान आवश्यकता थी।”
जमानत रद्द किए जाने के आदेश पर भी हाईकोर्ट ने सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि आरोपी के जमानत पर बाहर आने के बाद उसके फरार होने, कानूनी कार्रवाई से बचने, गवाहों को धमकाने, सबूतों से छेड़छाड़ करने, मुकदमे में बाधा डालने या अदालत से मिली स्वतंत्रता का किसी अन्य तरीके से दुरुपयोग करने का कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया गया।
अदालत ने कहा,
“जमानत इसलिए रद्द की गई, क्योंकि समझौते का पालन नहीं हुआ।”
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि समझौते की कानूनी स्थिति और किसी विचाराधीन आरोपी की स्वतंत्रता दो अलग-अलग सवाल हैं। अदालत ने कहा कि पक्षकारों के बीच हुआ समझौता लागू किया जा सकता है या नहीं, यह अलग विषय है, जबकि किसी विचाराधीन आरोपी को उसकी स्वतंत्रता से वंचित करना अलग कानूनी प्रश्न है।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि आरोपी की बेल याचिका पर अब नए सिरे से विचार किया जाए और केवल समझौते को लागू कराने के लिए उसे हिरासत में रखने का रास्ता नहीं अपनाया जाए।
अदालत ने कहा कि जमानत पर नए सिरे से विचार करते समय सेशन कोर्ट आरोपों की प्रकृति और गंभीरता, आरोपी के खिलाफ उपलब्ध विशेष सामग्री, मामले की मौजूदा स्थिति, जांच की स्थिति, इस समय हिरासत की आवश्यकता, अदालत के आदेशों के तहत आरोपी के अब तक स्वतंत्र रहने की अवधि और इस दौरान उसके आचरण समेत बेल से संबंधित अन्य सभी पहलुओं पर विचार करे।
हाईकोर्ट ने सेशन कोर्ट को बहाल की गई जमानत याचिका पर जल्द सुनवाई करने और संभव हो तो चार सप्ताह के भीतर फैसला करने का निर्देश दिया।
तब तक जस्टिस नरूला ने आरोपी को पहले से मिली अंतरिम सुरक्षा जारी रखने का आदेश दिया। हालांकि, इसके लिए उसे मुकदमे में सहयोग करना होगा, जब भी अदालत में बुलाया जाए तब पेश होना होगा, बिना अनुमति भारत से बाहर नहीं जाना होगा और गवाहों को प्रभावित करने या सबूतों से छेड़छाड़ से दूर रहना होगा।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि समझौते के तहत बैंक को पहले ही दी जा चुकी 45 लाख रुपये की रकम वापस करने के संबंध में उसने कोई आदेश नहीं दिया। हालांकि, आरोपी को जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान इस रकम की वापसी की मांग करने की स्वतंत्रता दी गई। ऐसी मांग पर सेशन कोर्ट कानून के अनुसार फैसला करेगा।
इस तरह हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को पैसे के लेनदेन या शिकायतकर्ता के साथ हुए समझौते की शर्तों से बांधा नहीं जा सकता और जमानत का फैसला स्थापित कानूनी कसौटियों के आधार पर ही होना चाहिए।

