दिल्ली पुलिस ने कहा- 10 एक्टिविस्ट रिहा कर दिए गए, हाईकोर्ट ने उनकी हिरासत के कारणों पर मांगा स्पष्टीकरण
Shahadat
15 March 2026 6:19 PM IST

दिल्ली पुलिस ने रविवार को हाईकोर्ट को बताया कि कथित तौर पर गैर-कानूनी हिरासत में रखे गए सभी 10 एक्टिविस्ट को रिहा कर दिया गया।
जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की डिवीज़न बेंच ने रविवार को हुई विशेष सुनवाई में पुलिस से उन परिस्थितियों और कानूनी अधिकार के बारे में स्पष्टीकरण मांगा, जिनके तहत उन्हें हिरासत में लिया गया था।
कोर्ट ने एहसानुल हक, राजबीर और सागरिका राजोरा द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिकाओं पर नोटिस जारी किया।
हक की ओर से सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्वेस, राजबीर की ओर से एडवोकेट शाहरुख आलम और राजोरा की ओर से एडवोकेट जसदीप ढिल्लों पेश हुए।
शुरुआत में गोंसाल्वेस ने कहा कि एक व्यक्ति को छोड़कर बाकी सभी को तभी रिहा किया गया, जब यह मामला मीडिया में आया। उन्होंने कहा कि यह एक बहुत ही चिंताजनक स्थिति है, जहां पुलिस पूरी तरह से बेकाबू हो गई।
दिल्ली पुलिस की ओर से पेश हुए स्टैंडिंग काउंसिल ने कहा कि सभी व्यक्तियों को रिहा कर दिया गया और यह मामला उतना सीधा नहीं है, जितना कि याचिकाकर्ताओं द्वारा पेश किया जा रहा है।
ढिल्लों ने कहा कि रुद्र नामक व्यक्ति अभी भी हिरासत में है। उन्होंने कहा कि रुद्र को किसी दूसरी जगह ले जाया गया है और हिरासत में लिए गए व्यक्तियों को यातना दी गई। उन्हें यह धमकी भी दी गई कि उन्हें खत्म कर दिया जाएगा।
आलम ने कहा कि इन व्यक्तियों को सादे कपड़ों में आए लोगों ने हिरासत में लिया था। उन्होंने कहा कि उन्हें पुलिस स्टेशन नहीं, बल्कि एक बिना निशान वाले 'सेफ हाउस' (सुरक्षित ठिकाने) में ले जाया गया और उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने भी पेश नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि एक्टिविस्ट के साथ ऐसा दूसरी बार हुआ। उन्हें यातना, दुर्व्यवहार और हिंसा का शिकार बनाया गया।
कोर्ट ने पुलिस से रुद्र का पता लगाने और कल तक उसके ठिकाने के बारे में जानकारी देने को कहा।
कोर्ट ने याचिकाओं पर नोटिस जारी किया और पुलिस को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि संबंधित इलाकों की CCTV फुटेज सुरक्षित रखी जाए।
अब इन मामलों की सुनवाई 27 मार्च को होगी।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं में से एडवोकेट दीक्षा द्विवेदी ने सागरिका राजोरा की ओर से दायर की, जिसमें राज्य और पुलिस अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की गई कि वे उनकी बहन लक्षिता राजोरा को तुरंत कोर्ट के सामने पेश करें। इस याचिका में 22 साल की एक महिला को पेश करने की मांग की गई। याचिका में दावा किया गया कि वह 13 मार्च की शाम से दिल्ली यूनिवर्सिटी के पास विजय नगर इलाके से लापता है।
याचिका के मुताबिक, वह महिला 13 मार्च की शाम को दिल्ली यूनिवर्सिटी के नॉर्थ कैंपस के पास विजय नगर में मौजूद एक छात्र संगठन के दफ़्तर गई थी। इसके बाद रात करीब 8 बजे से उसका कोई पता नहीं चला और उसका फ़ोन भी बंद मिला।
आरोप लगाया गया कि उसी दफ़्तर में मौजूद कई और लोग भी उसी समय के आसपास लापता हो गए।
रजोरा ने एक "गंभीर और ठोस आशंका" जताई कि उसकी बहन को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के अधिकारियों ने गैर-कानूनी तरीके से उठा लिया हो सकता है।
उसने कहा कि करीब आठ महीने पहले उस महिला और उसके साथियों को इसी एजेंसी ने कथित तौर पर एक हफ़्ते से ज़्यादा समय तक गैर-कानूनी हिरासत में रखा था और हिरासत में उनके साथ ज़्यादती की थी। यह सब बिना किसी औपचारिक गिरफ़्तारी या मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए बिना किया गया।
Title: SAGRIKA RAJORA v. THE STATE (NCT OF DELHI) & ORS and other connected matters

