गिरफ्तारी के सामान्य कारण बताना पर्याप्त नहीं, आरोपी को लिखित गिरफ्तारी के आधार देना जरूरी: दिल्ली हाईकोर्ट

Amir Ahmad

13 May 2026 5:49 PM IST

  • गिरफ्तारी के सामान्य कारण बताना पर्याप्त नहीं, आरोपी को लिखित गिरफ्तारी के आधार देना जरूरी: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने NDPS Act के मामले में आरोपी को जमानत देते हुए कहा कि गिरफ्तारी मेमो में केवल गिरफ्तारी के कारण लिख देना पर्याप्त नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी को उसके खिलाफ व्यक्तिगत और विशिष्ट गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में बताना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है।

    जस्टिस अनुप जयराम भंभानी ने कहा कि निर्धारित समय सीमा के भीतर लिखित आधार उपलब्ध न कराना गिरफ्तारी और बाद की रिमांड प्रक्रिया को अवैध बना देता है।

    अदालत ने कहा,

    “गिरफ्तारी के आधार बताना कोई तकनीकी औपचारिकता नहीं बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता की पवित्र और मूलभूत संवैधानिक सुरक्षा है।”

    मामला दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा दर्ज NDPS मामले से जुड़ा था। आरोपी बृजेश कोठिया ने जमानत याचिका दाखिल कर कहा कि 13 अक्टूबर, 2024 को गुजरात में गिरफ्तारी के समय उसे लिखित रूप में गिरफ्तारी के आधार नहीं दिए गए। यहां तक कि रिमांड के लिए अदालत में पेश किए जाने से दो घंटे पहले भी उसे यह जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।

    हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के मिहिर राजेश शाह फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि पुलिस के पास गिरफ्तारी के आधार से जुड़े दस्तावेज पहले से मौजूद हों तो आरोपी को गिरफ्तारी के समय ही लिखित आधार देना अनिवार्य है। असाधारण परिस्थितियों में भी यह जानकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी से कम से कम दो घंटे पहले दी जानी चाहिए।

    अदालत ने कहा कि लिखित आधार न देना केवल प्रक्रिया संबंधी त्रुटि नहीं बल्कि गंभीर संवैधानिक उल्लंघन है।

    हाईकोर्ट ने पाया कि कोठिया को दिए गए गिरफ्तारी मेमो में केवल सामान्य गिरफ्तारी के कारण दर्ज थे लेकिन उसके खिलाफ विशिष्ट गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए गए।

    अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे साबित हो कि आरोपी को गुजरात में गिरफ्तारी के समय या रिमांड से पहले अलग से लिखित आधार उपलब्ध कराए गए।

    अदालत ने कहा,

    “इस चूक के कारण आरोपी अपने वकील को सही निर्देश देने और ट्रांजिट रिमांड व पुलिस रिमांड का प्रभावी ढंग से विरोध करने से वंचित रह गया।”

    हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) का उद्देश्य यही है कि गिरफ्तार व्यक्ति को इतनी जानकारी दी जाए, जिससे वह अपनी स्वतंत्रता छीने जाने को चुनौती दे सके। इस मामले में वह उद्देश्य पूरी तरह विफल हो गया।

    हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी और रिमांड में अवैधता का मतलब यह नहीं है कि जांच या मुकदमा स्वतः समाप्त हो जाएगा। जांच एजेंसी कानून और संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करते हुए दोबारा कार्रवाई कर सकती है।

    अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि आरोपी एक वर्ष चार महीने से अधिक समय से जेल में है, उसका जेल में आचरण संतोषजनक रहा है और उसके खिलाफ कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। इसके बाद अदालत ने उसे जमानत दी।

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