एडवोकेट एक्ट की धारा 37 के तहत अपील सिर्फ़ डिसिप्लिनरी कमिटी के आदेशों के ख़िलाफ़ मान्य, स्टेट बार काउंसिल के प्रस्तावों के ख़िलाफ़ नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
Shahadat
26 May 2026 9:55 AM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया कि एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 37 के तहत अपील सिर्फ़ स्टेट बार काउंसिल की डिसिप्लिनरी कमिटी द्वारा एक्ट की धारा 35 के तहत पारित आदेशों के ख़िलाफ़ ही मान्य है, न कि खुद स्टेट बार काउंसिल द्वारा पारित प्रस्तावों या आदेशों के ख़िलाफ़।
कोर्ट ने साफ़ किया कि जहां कोई वैधानिक अपील नहीं बनती, वहां सही उपाय यह होगा कि एक्ट की धारा 48-A के तहत बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया के रिविजनल अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल किया जाए।
इस तरह जस्टिस पुरुशेंद्र कुमार कौरव ने बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया (BCI) के उस फ़ैसले को चुनौती देने वाली याचिका ख़ारिज की, जिसमें BCI ने एडवोकेट्स एक्ट की धारा 37 के तहत दायर अपील पर सुनवाई करने से मना कर दिया था।
याचिकाकर्ता कोर्ट तब पहुंचा, जब BCI ने उसे धारा 48-A के तहत रिविजन का उपाय अपनाने की सलाह दी थी।
यह विवाद याचिकाकर्ता द्वारा बार काउंसिल ऑफ़ दिल्ली में दायर शिकायत से शुरू हुआ था, जिसमें उसने अपनी बेटी की ओर से रिव्यू पिटीशन दायर करने के लिए रखे गए दो वकीलों पर पेशेवर दुराचार का आरोप लगाया था।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि पेशेवर फ़ीस और दस्तावेज़ मिलने के बावजूद, वकीलों ने तय समय सीमा के भीतर रिव्यू पिटीशन दायर नहीं की।
हालांकि, बार काउंसिल ऑफ़ दिल्ली ने यह देखते हुए शिकायत ख़ारिज की कि फ़ीस और दस्तावेज़ याचिकाकर्ता को लौटा दिए गए।
शिकायत ख़ारिज होने से दुखी होकर याचिकाकर्ता ने धारा 37 के तहत BCI में अपील दायर की।
BCI ने उसे बताया कि स्टेट बार काउंसिल की जनरल काउंसिल द्वारा पारित आदेश के ख़िलाफ़ धारा 37 के तहत कोई अपील नहीं बनती। उसे इसके बजाय धारा 48-A के तहत रिविजन पिटीशन दायर करने की सलाह दी।
BCI के रुख़ को सही ठहराते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि वैधानिक व्यवस्था धारा 37 के तहत अपीलीय अधिकार क्षेत्र और धारा 48-A के तहत रिविजनल अधिकार क्षेत्र के बीच साफ़ अंतर करती है।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 37 विशेष रूप से अपील का कानूनी अधिकार केवल उस आदेश के खिलाफ देती है, जो एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 35 के तहत किसी राज्य बार काउंसिल की अनुशासन समिति द्वारा पारित किया गया हो। दूसरी ओर, धारा 48-A बार काउंसिल ऑफ इंडिया को पुनरीक्षण का अधिकार देती है, जिसके तहत वह उन मामलों में किसी राज्य बार काउंसिल या उसकी किसी समिति द्वारा निपटाए गए मामलों के रिकॉर्ड मंगा सकती है, जिनमें कोई कानूनी अपील नहीं की जा सकती।”
कोर्ट ने माना कि चूंकि विवादित आदेश दिल्ली बार काउंसिल द्वारा पारित किया गया, न कि धारा 35 के तहत गठित उसकी अनुशासन समिति द्वारा, इसलिए BCI का यह मानना सही था कि इस मामले में उपचार धारा 48-A के तहत उपलब्ध है, न कि धारा 37 के तहत।
इस प्रकार, याचिकाकर्ता को एडवोकेट्स एक्ट की धारा 48-A के तहत पुनरीक्षण याचिका दायर करने की स्वतंत्रता देते हुए इस याचिका का निपटारा किया गया।
Case title: Mr. C. Asok Kumar v. Bar Council Of India

