Anissia Batra Death Case: दिल्ली हाईकोर्ट ने पति को क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों से बरी किया

  • Anissia Batra Death Case: दिल्ली हाईकोर्ट ने पति को क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों से बरी किया

    दिल्ली हाईकोर्ट ने 2018 के आत्महत्या मामले में दिवंगत फ्लाइट अटेंडेंट अनिसिया बत्रा के पति मयंक सिंघवी को क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों से बरी कर दिया।

    जस्टिस मधु जैन ने कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश की गई सामग्री में इन दोनों अपराधों के लिए जरूरी तत्व मौजूद नहीं है।

    कोर्ट ने IPC की धारा 304B (दहेज मृत्यु) के तहत मयंक सिंघवी को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखा। साथ ही उनके माता-पिता को भी IPC की धारा 304B और 498A के तहत लगे आरोपों से बरी करने का फैसला सही ठहराया।

    अनिसिया (39) की शादी मयंक सिंघवी से दो साल पहले हुई थी और वह एक जर्मन एयरलाइन में काम करती थीं। 13 जुलाई 2018 को वह कथित तौर पर दक्षिण दिल्ली के पंचशील पार्क स्थित अपने घर की छत से कूद गई थीं।

    जस्टिस मधु जैन ने कहा कि वैवाहिक कलह, उत्पीड़न या खराब रिश्ते - जब तक कि इसमें IPC की धारा 107 के तहत कोई ठोस और जानबूझकर किया गया योगदान न हो - तब तक इसे अकेले आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता।

    कोर्ट ने कहा कि अगर कोई महिला आत्महत्या से पहले कोई ऐसा संदेश छोड़ती है, जिसमें वह अपनी मौत के लिए किसी दूसरे व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराती है, तो केवल इस आरोप से ही 'आत्महत्या के लिए उकसाने' का अपराध साबित नहीं हो जाता।

    कोर्ट ने कहा,

    "मृतक द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराना सबूत का एक हिस्सा तो हो सकता है, लेकिन इससे यह तय नहीं होता कि उस व्यक्ति ने IPC की धारा 306 के तहत अपराध किया है या नहीं।"

    यह फैसला उन पुनरीक्षण याचिकाओं (Revision Petitions) पर आया है, जिन्हें अनिसिया की मां, मयंक सिंघवी और राज्य सरकार ने साकेत सेशन कोर्ट के दिसंबर 2019 के आदेश को चुनौती देते हुए दायर किया।

    सेशन कोर्ट ने मयंक सिंघवी को IPC की धारा 304B (दहेज मृत्यु) के आरोप से तो बरी किया, लेकिन उन पर IPC की धारा 498A और 306 के तहत आरोप तय करने का निर्देश दिया। उसके माता-पिता को IPC की धारा 304B और 498A के तहत लगे आरोपों से बरी कर दिया गया।

    अभियोजन पक्ष का आरोप था कि मृतका को शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना दी गई, पैसों की मांग की गई और उस फ्लैट की बिक्री से मिलने वाली रकम को लेकर दबाव डाला गया, जो उसके और उसकी माँ के संयुक्त स्वामित्व में था।

    उसकी माँ ने आरोप लगाया कि पति और उसके माता-पिता बार-बार पैसों की मांग करते थे और उसकी मौत से कुछ समय पहले उनके बीच वैवाहिक कलह काफी बढ़ गई।

    अभियोजन पक्ष ने उन व्हाट्सएप संदेशों का भी हवाला दिया, जो कथित तौर पर अनीसिया ने अपनी मौत से कुछ समय पहले भेजे थे। अपनी एक सहेली को भेजे गए संदेश में उसने कथित तौर पर कहा था कि वह आत्महत्या करने जा रही है क्योंकि मयंक ने उसे इस हद तक मजबूर किया।

    याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि शादी के सात साल के भीतर हुई किसी भी अप्राकृतिक मौत के मामले में भले ही उसमें वैवाहिक क्रूरता के आरोप शामिल हों, अपने आप IPC की धारा 304B लागू नहीं हो जाती।

    कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि शादी के दौरान की गई हर वित्तीय मांग या लेन-देन को 'दहेज' नहीं माना जा सकता, जब तक कि उस मांग की प्रकृति और परिस्थितियों से यह स्पष्ट न हो जाए कि इसका शादी से सीधा संबंध है।

    फैसला सुनाते समय कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि वैवाहिक विवादों में अक्सर पति के रिश्तेदारों को भी क्रूरता के व्यापक आरोपों के जरिए फंसा दिया जाता है।

    कोर्ट ने कहा कि एक खराब वैवाहिक जीवन से उपजे दुख के कारण पूरे परिवार को आपराधिक कार्यवाही में घसीटना सही नहीं है, खासकर तब जब उन लोगों की कोई विशिष्ट भूमिका साबित न हुई हो।

    कोर्ट ने कहा,

    "कानून को क्रूरता का शिकार होने वाली महिला को प्रभावी सुरक्षा देनी चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि पति के रिश्तेदारों को केवल उनके रिश्ते के कारण कानूनी कार्यवाही का सामना न करना पड़े। यहाँ तक कि पतियों को भी बिना किसी ठोस कारण के दंडित नहीं किया जाना चाहिए।"

    कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि अगर कोई बेटी अपनी शादी में हिंसा या लगातार दुर्व्यवहार की शिकायत करती है तो उसके माता-पिता को उसे समय रहते सहयोग देना चाहिए।

    कोर्ट ने कहा,

    "बेटी का अपने माता-पिता के घर वापस आना कभी भी उनके लिए शर्म की बात नहीं होनी चाहिए। किसी शादी को बचाए रखना, बेटी की सुरक्षा और सम्मान से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हो सकता।"

    इसके अनुसार, कोर्ट ने मृतका की माँ और राज्य सरकार द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिकाओं (Revision Petitions) को खारिज कर दिया, जबकि पति की पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए उसे IPC की धारा 498A और 306 के तहत लगे आरोपों से बरी कर दिया।

    Case Title : NILLUM BATRA v. STATE & ORS And other connected matters

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