एपस्टीन फाइल्स केस: हरदीप पुरी की बेटी के मानहानि केस में रोक के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा एक्टिविस्ट
Shahadat
4 April 2026 8:52 PM IST

रायपुर के सोशल एक्टिविस्ट कुणाल शुक्ला ने दिल्ली हाईकोर्ट में रोक लगाने वाले आदेश को चुनौती दी। इस आदेश में उन्हें और कई अन्य लोगों को उन पोस्ट को हटाने का निर्देश दिया गया, जिनमें केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी की बेटी हिमायनी पुरी को अमेरिकी फाइनेंसर और बच्चों के यौन शोषण के दोषी जेफरी एपस्टीन से जोड़ा गया।
इस मामले की सुनवाई सोमवार को जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर की डिवीज़न बेंच करेगी।
इसे "मुकदमे से पहले का एकतरफ़ा रोक आदेश" बताते हुए शुक्ला ने अपनी अपील में कहा कि उन्होंने जो जानकारी प्रकाशित की थी, वह पूरी तरह से पहले से मौजूद और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध दस्तावेज़ों पर आधारित थी। इन दस्तावेज़ों में SEC की फाइलिंग, अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टें और आधिकारिक तौर पर जारी सामग्री शामिल है।
उनका तर्क है कि सिंगल जज ने यह रोक आदेश बिल्कुल शुरुआती चरण में ही जारी किया। उन्होंने न तो कोई नोटिस दिया और न ही शुक्ला को अपनी बात रखने का कोई मौका दिया। इस तरह उन्होंने असल में मुकदमे के शुरुआती (ad-interim) चरण में ही फैसला सुना दिया।
शुक्ला ने कहा,
"सम्मानित सिंगल जज ने बिना किसी विश्लेषण के ही, बस औपचारिकता निभाते हुए यह मान लिया कि मामला प्रथम दृष्टया सही है, सुविधा का संतुलन (Balance of Convenience) वादी के पक्ष में है। वादी को भरपाई न हो सकने वाला नुकसान होगा। उन्होंने न तो रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का विश्लेषण किया और न ही एकतरफ़ा रोक आदेश जारी करने के तय मानकों का पालन किया, खासकर मानहानि के उन मामलों में जिनमें पत्रकारिता से जुड़ी अभिव्यक्ति शामिल हो।"
उन्होंने दलील दी है कि जिस आदेश को चुनौती दी गई, वह इस तय सिद्धांत की अनदेखी करता है कि मानहानि के मामलों में मुकदमे से पहले रोक आदेश तब जारी नहीं किया जाना चाहिए, जब प्रतिवादी सार्वजनिक रिकॉर्ड के आधार पर सच्चाई, औचित्य और निष्पक्ष टिप्पणी का एक विश्वसनीय बचाव पेश करता हो।
अपील में यह भी कहा गया कि सिंगल जज यह समझने में नाकाम रहे कि शुक्ला द्वारा प्रकाशित सामग्री "सार्वजनिक क्षेत्र में मौजूद निर्विवाद सामग्री" पर आधारित थी। साथ ही इसने सार्वजनिक पदों से जुड़े व्यक्तियों के वित्तीय लेन-देन और संबंधों के बारे में महत्वपूर्ण सार्वजनिक महत्व के सवाल उठाए।
शुक्ला के अनुसार, विवादित सामग्री न तो स्पष्ट रूप से झूठी है और न ही दुर्भावनापूर्ण। यह पूरी तरह से निष्पक्ष टिप्पणी और जनहित में रिपोर्टिंग की सुरक्षा के दायरे में आती है।
अपील में कहा गया,
"जिस आदेश को चुनौती दी गई, वह शुरुआती चरण में ही ऐसी अभिव्यक्ति पर रोक लगाकर असंवैधानिक 'पूर्व-प्रतिबंध' (Prior Restraint) का रूप ले लेता है। इसका स्वतंत्र अभिव्यक्ति और खोजी पत्रकारिता पर एक 'दबाव डालने वाला प्रभाव' (Chilling Effect) पड़ता है, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के विपरीत है।"
इसमें आगे कहा गया,
"यह दी गई राहत के असंतुलित स्वरूप को भी नज़रअंदाज़ करता है, क्योंकि बिना यह जांच किए कि क्या कोई कम प्रतिबंधात्मक उपाय पर्याप्त होता, एक व्यापक रूप से हटाने का आदेश दे दिया गया।"
यह अपील वकीलों मयंक जैन, मधुर जैन और अर्पित गोयल के माध्यम से दायर की गई।
बता दें, 17 मार्च को सिंगल जज ने ट्विटर, गूगल, यूट्यूब, मेटा और लिंक्डइन जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म और अन्य 'जॉन डो' (अज्ञात) संस्थाओं को कैबिनेट मंत्री की बेटी के खिलाफ कथित रूप से मानहानिकारक सामग्री को हटाने का आदेश दिया था।
हालांकि, जज ने स्पष्ट किया कि फिलहाल अदालत केवल भारत के भीतर सामग्री को हटाने पर विचार करेगी, क्योंकि 'वैश्विक रूप से हटाने' (Global Takedown) का पहलू हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष लंबित है।
हिमानी पुरी ने 10 करोड़ रुपये का मानहानि का मुकदमा दायर किया था, जिसमें सामग्री को हटाने के लिए 'जॉन डो' आदेश की मांग की गई।
मुकदमे में प्रतिवादी 1-14 के नाम शामिल हैं, जिनमें पत्रकार और सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म शामिल हैं। प्रतिवादी 15-18 सरकारी अधिकारी हैं। शेष प्रतिवादी 'जॉन डो' (अज्ञात/पहचान से परे) हैं।
मुकदमे के अनुसार, प्रतिवादियों द्वारा एक सुनियोजित और दुर्भावनापूर्ण ऑनलाइन अभियान चलाया गया, जिसका उद्देश्य उन्हें जेफ़री एपस्टीन और उसकी आपराधिक गतिविधियों से जोड़ना है।
उन्होंने कहा कि विवादित प्रकाशन अभी भी ऑनलाइन मौजूद हैं, उन तक पहुंचा जा सकता है और वे सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से प्रसारित हो रहे हैं, जिससे उनकी प्रतिष्ठा को लगातार नुकसान पहुंच रहा है।
Title: Kunal Shukla v. Himayani Puri & Ors

