बलात्कार जैसे मामलों में बरी होने पर पहचान की सुरक्षा जरूरी, नाम आधारित खोज परिणाम हटाए जाएं: दिल्ली हाईकोर्ट

Amir Ahmad

2 Jun 2026 12:41 PM IST

  • बलात्कार जैसे मामलों में बरी होने पर पहचान की सुरक्षा जरूरी, नाम आधारित खोज परिणाम हटाए जाएं: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यौन अपराधों के मामलों में यदि किसी व्यक्ति को अदालत से बरी कर दिया जाता है तो उसकी प्रतिष्ठा और निजता की रक्षा के लिए इंटरनेट पर उपलब्ध नाम आधारित खोज परिणामों को हटाया जाना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में बरी हुए व्यक्ति की पहचान को सार्वजनिक रूप से लगातार उपलब्ध रखना उसके सम्मान और गरिमा पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

    जस्टिस सचिन दत्ता ने कहा कि यौन अपराधों के आरोपों से मुक्त हो चुके निजी व्यक्तियों के मामलों में यदि उनकी पहचान सार्वजनिक बनाए रखने का कोई स्पष्ट और निरंतर जनहित नहीं है तो उनकी पहचान छिपाने और नाम आधारित खोज परिणामों को हटाने का आधार स्वयं बरी होने के तथ्य से ही स्थापित हो जाता है।

    अदालत ने कहा कि कानून पहले से ही यौन अपराधों के पीड़ितों की पहचान की रक्षा करता है, लेकिन ऐसे मामलों में आरोपी व्यक्ति पर लगने वाला सामाजिक कलंक भी अत्यंत गंभीर और स्थायी होता है। कई बार अदालत से बरी हो जाने के बाद भी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को हुई क्षति पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाती।

    फैसले में कहा गया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ बलात्कार का आरोप लगना और उसका नाम इंटरनेट पर उपलब्ध न्यायिक अभिलेखों या समाचारों से जुड़ जाना, उसके बरी हो जाने के बाद भी लंबे समय तक उसका पीछा करता रहता है। ऐसे व्यक्ति का नाम इंटरनेट पर खोजने पर आरोपों से जुड़ी सामग्री सामने आती रहती है जबकि अदालत उसे दोषमुक्त घोषित कर चुकी होती है।

    यह टिप्पणी उस मामले में की गई, जिसमें बलात्कार के आरोप से बरी हो चुके एक व्यक्ति ने विभिन्न खोज मंचों और वेबसाइटों से अपने संबंध में प्रकाशित सामग्री हटाने की मांग की थी। याचिकाकर्ता ने अदालत से यह भी आग्रह किया था कि यौन अपराधों के मामलों में बरी होने वाले व्यक्तियों की पहचान की सुरक्षा को लेकर व्यापक सिद्धांत निर्धारित किए जाएं।

    हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को राहत देते हुए खोज मंचों और कानूनी अभिलेख उपलब्ध कराने वाले मंचों को निर्देश दिया कि वे संबंधित निर्णयों, आदेशों और समाचार सामग्री को नाम आधारित खोज परिणामों से हटाएं तथा ऐसी सामग्री को नाम के आधार पर खोजे जाने की सुविधा भी बंद करें।

    इसी फैसले में अदालत ने 'भुला दिए जाने के अधिकार' को भी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त निजता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा माना। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को ऐसी व्यक्तिगत जानकारी को सार्वजनिक डिजिटल पहुंच से हटाने का अधिकार है, जो अब प्रासंगिक नहीं रह गई है और जिसका कोई वैध सार्वजनिक उद्देश्य नहीं है।

    दिल्ली हाईकोर्ट का यह निर्णय डिजिटल युग में निजता, गरिमा और प्रतिष्ठा की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण न्यायिक कदम माना जा रहा है, जो बरी हो चुके व्यक्तियों को आरोपों की स्थायी छाया से बाहर निकलने का अवसर प्रदान करता है।

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