जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को हटाने का मामला: CBI का तर्क- अरविंद केजरीवाल की खुद को सुनवाई से हटाने की अर्जी मानना गलत मिसाल कायम करेगा
Shahadat
13 April 2026 7:51 PM IST

सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI) ने सोमवार (13 अप्रैल) को दिल्ली हाईकोर्ट से कहा कि AAP प्रमुख अरविंद केजरीवाल और अन्य लोगों द्वारा दायर उन अर्जियों को स्वीकार करना, जिनमें शराब नीति मामले की सुनवाई से जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को हटाने की मांग की गई, एक गलत मिसाल कायम करेगा।
इससे पहले दिन में केजरीवाल ने खुद बहस करते हुए दावा किया कि उनके मन में यह वाजिब आशंका है कि उन्हें निष्पक्ष सुनवाई नहीं मिलेगी। वह CBI की उस पुनर्विचार याचिका की सुनवाई से जस्टिस शर्मा को हटाने की मांग कर रहे हैं, जिसमें ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके तहत विवादित शराब नीति मामले में केजरीवाल और अन्य सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया।
खुद को सुनवाई से हटाने के लिए तय पैमाना सबसे ऊंचा होता है
CBI की ओर से पेश होते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के सामने दलील दी कि यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है "क्योंकि यह एक ऐसी मिसाल कायम कर सकता है", जिसके आधार पर "सिर्फ़ अंदाज़ों, अटकलों और बेवजह की आशंकाओं के आधार पर, और बेंच पर लगभग लांछन लगाते हुए, कोई भी मुक़दमेबाज़ अपनी पसंद की बेंच चुन सकता है"।
मेहता ने पूछा,
"अगर जज खुद को सुनवाई से हटाना शुरू कर देंगे तो क्या इस देश में कोई भी जज निष्पक्ष होकर फ़ैसला कर पाएगा?"
मेहता ने दलील दी कि खुद को सुनवाई से हटाने की मांग करने वाले आवेदकों की मांग गलत थी, जहां एक ओर CBI को ऐसी अर्जियों का विरोध करने का अधिकार है, वहीं दूसरी ओर बेंच का यह फ़र्ज़ भी है कि वह किसी भी ऐसे कदम को रोके, जिसके परिणामस्वरूप बिना किसी ठोस वजह के कोर्ट पर लांछन लगाए जाएं और ऐसा माहौल बने कि कोर्ट ने किसी तरह के दबाव में आकर फ़ैसला किया हो।
आगे कहा गया,
"आपकी अदालत दो तरह के रोस्टर देख रही हैं - MP/MLA से जुड़े मामले और अन्य मामले भी। मैं कोर्ट को यह समझाने में मदद करूंगा कि यह मांग किस तरह से गलत है। इसमें एक खास पैटर्न नज़र आता है। सिर्फ़ CBI का ही यह अधिकार नहीं है कि वह ऐसी अर्जियों का विरोध करे, बल्कि बेंच का भी यह फ़र्ज़ है कि वह किसी भी ऐसे कदम को रोके, जिसके परिणामस्वरूप बिना किसी ठोस वजह के कोर्ट पर लांछन लगाए जाएं और ऐसा माहौल बने कि अंततः कोर्ट को किसी तरह के दबाव के आगे झुकना पड़ा हो। यह बात बेहद अहम है कि खुद को सुनवाई से हटाने की अर्जी पर फ़ैसला करने के लिए तय पैमाना हमेशा सबसे ऊंचा होता है।"
केजरीवाल की इस दलील के संबंध में कि जस्टिस शर्मा ने ED द्वारा उनकी गिरफ़्तारी को चुनौती देने वाली उनकी अर्जी खारिज करते समय कुछ पिछली टिप्पणियां की थीं, मेहता ने दलील दी कि 'मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम' (PMLA) की धारा 19 के अनुसार, कोर्ट के लिए यह अनिवार्य था कि वह गिरफ़्तारी की ज़रूरत के संबंध में इस तरह की शुरुआती टिप्पणियां करे।
एसजी ने यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द नहीं किया, जिसमें उनकी गिरफ़्तारी को मंज़ूरी दी गई (यह मामला सिर्फ़ बड़ी बेंच को भेजा गया, जबकि केजरीवाल को अंतरिम ज़मानत दी गई)। उन्होंने दलील दी कि केजरीवाल ने इस बात को छिपाया और कोर्ट को गुमराह किया।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक और अर्ज़ी देने वाले मनीष सिसोदिया को ज़मानत दिए जाने के मामले में मेहता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें लंबे समय तक जेल में रहने की वजह से ज़मानत दी थी।
अर्जी देने वालों को नोटिस भेजा गया, लेकिन वे पेश नहीं हुए
केजरीवाल की इस आपत्ति पर कि हाईकोर्ट ने CBI की पुनर्विचार याचिका की सुनवाई के पहले ही दिन एकतरफ़ा अंतरिम आदेश कैसे दे दिया, एसजी ने कहा कि आरोपियों को पहले से ही आदेश की कॉपी दी गई, लेकिन उन्होंने खुद ही सुनवाई से गैर-हाज़िर रहना चुना।
"ज़रा उनके रवैये को देखिए, यह अर्ज़ी नेकनीयती से नहीं दी गई। डिस्चार्ज अर्ज़ी पर फ़ैसला 22 फ़रवरी को सुरक्षित रख लिया गया और 27 फ़रवरी को सुनाया गया। यह मामला 9 मार्च को सुनवाई के लिए लिस्ट किया गया। मैं आपको हाईकोर्ट के नियम दिखाऊंगा, जिनके मुताबिक किसी भी पक्ष के वकीलों को नोटिस भेजा जा सकता है, और उन्हें नोटिस भेजा भी गया। जिन वकीलों को नोटिस भेजा गया, वही वकील अब यहाँ पेश हो रहे हैं।"
उन्होंने आगे कहा,
"कोर्ट डिस्चार्ज के आदेश पर रोक लगा सकता था, लेकिन न तो इसके लिए कोई गुज़ारिश की गई और न ही कोर्ट ने इस पर कोई विचार किया। यह अंतरिम आदेश इस तरह का है कि इससे उन्हें किसी भी तरह का कोई नुकसान नहीं पहुंचता है।"
उन्होंने बताया कि 9 मार्च के आदेश के तुरंत बाद केजरीवाल और सिसोदिया ने हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस के सामने अर्ज़ी देकर इस मामले को मौजूदा बेंच से हटाकर किसी दूसरी बेंच को सौंपने की गुज़ारिश की।
मेहता ने कहा,
"चीफ़ जस्टिस ने 13 मार्च को इस पर आदेश दिया। अगली तारीख़ पर सुप्रीम कोर्ट में दो याचिकाएँ दायर की गईं। 9 मार्च के आदेश को इस आधार पर चुनौती दी गई कि उसमें कुछ शुरुआती टिप्पणियां (Prima Facie Observations) की गईं। जब भी कोई कोर्ट किसी भी मामले में कोई अंतरिम आदेश देता है तो उसे कुछ शुरुआती टिप्पणियां करनी ही पड़ती हैं। हालांकि, वे सुप्रीम कोर्ट चले गए और वहां SLP और एक रिट याचिका दायर करके चीफ़ जस्टिस के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें उन्होंने बेंच बदलने की उनकी अर्ज़ी ख़ारिज कर दी थी। जब अगली बार 16 मार्च को इस मामले की सुनवाई हुई तो प्रतिवादियों (Respondents) की तरफ़ से कोर्ट से और समय मांगा गया।"
उन्होंने आगे कहा कि अब तक SLP पर कुछ आपत्तियां लगी हुईं, जिन्हें अभी तक हटाया नहीं गया।
CBI ने केजरीवाल की उस दलील पर सवाल उठाया, जिसमें उन्होंने जस्टिस शर्मा के 'अधिवक्ता परिषद' के कार्यक्रमों में शामिल होने पर आपत्ति जताई थी।
केजरीवाल ने आरोप लगाया था कि जस्टिस शर्मा का अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रमों में शामिल होना पक्षपात की आशंका पैदा करता है।
इस आरोप पर सवाल उठाते हुए SG ने कहा:
"इस मामले पर मेरा नज़रिया बहुत गंभीर है। पार्टियों के राजनीतिक विचार कुछ भी हो सकते हैं। हालांकि, यह एक बार एसोसिएशन है। इसमें विचारधारा से जुड़ा होने जैसी कोई बात नहीं है। मुख्य सवाल यह है कि अगर कोई बार एसोसिएशन किसी जज को कानून के किसी विषय पर बोलने के लिए आमंत्रित करता है - न कि किसी विचारधारा पर - तो क्या जज का मना करना सही होगा?
सुप्रीम कोर्ट से लेकर इस कोर्ट और अन्य हाईकोर्ट के जजों ने भी अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रमों में हिस्सा लिया और कानून पर अपनी बात रखी। मैं किसी का नाम लेकर इस मामले को सनसनीखेज बनाना नहीं चाहता। लेकिन कृपया ज़रा गौर फरमाइए, इसी कोर्ट के एक और जज भी ऐसे कार्यक्रमों में शामिल हुए हैं। क्या उस जज को भी अयोग्य ठहरा दिया जाएगा? सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा जज भी आपकी (जज साहिबा की) बेंच में शामिल थे और उस समय भी विषय यही था। केजरीवाल को जिस सुप्रीम कोर्ट के जज ने ज़मानत दी थी, वह जज भी अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रमों में शामिल हुए। यह बहुत ही निराशाजनक बात है कि कोई इस तरह की दलील भी दे सकता है।"
ED का मामला सिर्फ़ स्थगित किया गया।
इसके बाद मेहता ने केजरीवाल की उस दलील का जवाब दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि जस्टिस शर्मा द्वारा ED के ट्रायल को टालने से पक्षपात की आशंका पैदा हो गई।
उन्होंने कोर्ट को बताया कि CBI ने एक विशेष अर्ज़ी दायर की, जिसमें मांग की गई कि CBI अधिकारियों के खिलाफ की गई टिप्पणियों पर रोक लगाई जाए। उन्होंने कहा कि ED का ट्रायल कभी भी अपने आप में पूरा नहीं होता। इसके लिए एक 'मूल अपराध' (Predicate Offence) का होना ज़रूरी है, जो ED के मामले का आधार बनता है।
उन्होंने अपनी बात पूरी करते हुए कहा,
"जिस पल कोई आदेश पूरी तरह से गलत साबित हो जाता है, उसी पल 'मूल अपराध' का अस्तित्व भी खत्म हो जाता है। इसका एकमात्र नतीजा यह होता कि ED का मामला भी उसी अंजाम तक पहुंच जाता... बेंच इस बात से पूरी तरह अवगत थी। आपकी (जज साहिबा की) बेंच ने ED के मामले पर रोक नहीं लगाई, बल्कि सिर्फ़ यह कहा कि ED के मामले को कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया जाए। कोर्ट ने निष्पक्षता बनाए रखने के लिए एक संतुलित आदेश पारित किया, जिसमें यह निर्देश दिया गया कि ED की कार्यवाही को पूरी तरह से खत्म न किया जाए। अगर ऐसा न किया जाता तो ज़ब्त की गई सारी संपत्तियाँ वापस छोड़नी पड़ जातीं। जबकि उन संपत्तियों को पहले ही ज़ब्त (Attached) किया जा चुका था।"
आवेदक डर पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं
उन्होंने आगे कहा:
"जज जवाब नहीं दे सकते... सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह प्रवृत्ति बढ़ रही है और आज हम जिस हद तक इसे देख रहे हैं, यह उस हद तक पहुंच गई। डर एक ऐसी चीज़ है, जिसे प्रतिवादी पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। इस मामले से हटने की इस अर्जी को सख्ती से खारिज किया जाना चाहिए। इस मामले में मौजूद सामग्री के आधार पर दूसरी बेंचों ने भी इन मामलों को देखा है और उसी नतीजे पर पहुंची हैं। भले ही उनका नज़रिया अलग हो, लेकिन यह मामले से हटने की मांग करने का कोई आधार नहीं है।"
आवेदकों के मन में आशंका होने की दलील पर मेहता ने कहा:
"एक आशंकित व्यक्ति किसी भी चीज़ की आशंका कर सकता है, जैसे कि कल बिजली गिर सकती है। यह एक चाल भी हो सकती है।"
एक फैसले का ज़िक्र करते हुए मेहता ने कहा,
"यहां तक कि ऐसा आवेदन जिस पर कोई वकील दस्तखत करता है और जिसमें अपमानजनक आरोप और अवमाननापूर्ण बयान होते हैं, उसे भी दोषी माना जाता है। मैं इस मामले में इतनी कड़ी बात नहीं कह रहा हूं।"
सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर नहीं चल सकते
इस मामले से जुड़े सोशल मीडिया पोस्ट के बारे में मेहता ने आगे कहा:
"यह संस्थागत सम्मान का मामला है। देश में कई चीज़ें चल रही हैं। सवाल यह है कि सिस्टम को ईमानदारी से कैसे चलाया जाए। अगर यही पैमाना है तो क्या अदालतें इस आधार पर फ़ैसले देंगी कि जनता क्या महसूस करती है? क्या सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर? सोशल मीडिया के लिए आपको कुछ चीज़ों की ज़रूरत होती है - फ़ोन, डेटा और बहुत सारा समय। हम मीडिया पोस्ट के आधार पर नहीं चलते।"
आवेदकों की इस दलील पर कि CBI की रिवीज़न याचिका में सुनवाई के लिए बहुत कम समय दिया गया, मेहता ने कहा:
"एक दलील यह थी कि आपकी लॉर्डशिप ने सुनवाई के लिए बहुत कम समय दिया। हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट आदेश के तहत काम करते हैं... MP-MLA से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने (समय-सीमा के भीतर फ़ैसले देने के लिए) निर्देश दिए। लोग इस बात को नहीं समझते। मामलों का जल्द से जल्द निपटारा करने का निर्देश है।"
इस पर अदालत ने मौखिक रूप से कहा,
"एक स्थायी आदेश है, जिसका पालन करना मेरे लिए अनिवार्य है।"
अपनी बात समाप्त करते हुए मेहता ने अनुरोध किया कि आवेदनों को जुर्माने के साथ खारिज कर दिया जाए और यह भी मांग की कि "अवमानना की कार्रवाई शुरू की जाए।"
दलीलों को सुनने के बाद अदालत ने सोमवार को खुद को मामले से अलग करने (Recusal) के आवेदन पर अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया।
Case Title: CBI v. Kuldeep Singh & Ors

