पहले से बीमारी छिपाने के आरोप में बीमा दावा खारिज करना गलत, इंडिया फर्स्ट लाइफ इंश्योरेंस को ₹20 लाख चुकाने का आदेश: दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग
Praveen Mishra
11 May 2026 1:08 PM IST

राज्य उपभोक्ता आयोग, दिल्ली ने India First Life Insurance Company Ltd. को बीमा दावा गलत तरीके से खारिज करने के मामले में सेवा में कमी (Deficiency in Service) का दोषी ठहराया है। आयोग ने कहा कि बीमा कंपनी कथित पूर्व-विद्यमान बीमारी (Pre-existing Disease) को साबित करने के लिए कोई ठोस चिकित्सीय साक्ष्य पेश नहीं कर सकी और केवल विरोधाभासी व सुनी-सुनाई बातों पर आधारित जांच रिपोर्ट के आधार पर दावा खारिज किया गया।
जस्टिस संगीता ढींगरा सहगल (अध्यक्ष) और बिमला कुमारी (सदस्य) की पीठ ने बीमा कंपनी को बीमित राशि ₹20 लाख, 6% वार्षिक ब्याज सहित अदा करने का निर्देश दिया। साथ ही मानसिक पीड़ा के लिए ₹1 लाख और मुकदमेबाजी खर्च के रूप में ₹50,000 देने का आदेश भी दिया।
मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता के पति ने “India First Group Credit Life Plan” के तहत ₹20 लाख का जीवन बीमा लिया था, जिसके लिए एकमुश्त प्रीमियम जमा किया गया था। यह पॉलिसी 20 जून 2012 से प्रभावी हुई थी।
24 फरवरी 2014 को बीमाधारक की मृत्यु के बाद शिकायतकर्ता ने बीमा दावा प्रस्तुत किया। हालांकि, बीमा कंपनी ने 10 नवंबर 2014 को दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया कि बीमाधारक ने मधुमेह और क्रॉनिक किडनी डिजीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों की जानकारी छिपाई थी।
इसके बाद शिकायतकर्ता ने जिला उपभोक्ता आयोग का रुख किया और कहा कि बीमा कंपनी ने वास्तविक दावे को गलत तरीके से अस्वीकार किया। शिकायतकर्ता ने यह भी दलील दी कि पॉलिसी की कथित अपवर्जन शर्तों (Exclusion Clauses) की जानकारी कभी ठीक से नहीं दी गई।
हालांकि, जिला आयोग ने शिकायत खारिज कर दी थी। इसके खिलाफ शिकायतकर्ता ने राज्य आयोग में अपील दायर की।
राज्य आयोग ने कहा कि बीमा कंपनी यह साबित नहीं कर सकी कि पॉलिसी लेते समय मृतक किसी गंभीर पूर्व-विद्यमान बीमारी से पीड़ित था। आयोग ने कहा कि मधुमेह जैसी सामान्य जीवनशैली संबंधी बीमारियों को केवल अपने आप में दावा खारिज करने का आधार नहीं बनाया जा सकता, खासकर तब जब बीमारी और मृत्यु के कारण के बीच कोई सीधा संबंध स्थापित न हो।
आयोग ने यह भी पाया कि बीमा कंपनी की जांच रिपोर्ट विरोधाभासी थी और विश्वसनीय दस्तावेजी साक्ष्यों के बिना केवल सुनी-सुनाई बातों पर आधारित थी। साथ ही, कंपनी यह साबित नहीं कर सकी कि पॉलिसी की शर्तें बीमाधारक को कभी उपलब्ध कराई गई थीं।
आयोग ने यह भी नोट किया कि बीमा दावा खारिज करने में 213 दिनों की देरी हुई, जो IRDA दिशानिर्देशों का उल्लंघन है।
इन परिस्थितियों में आयोग ने माना कि बीमा दावा खारिज करना सेवा में कमी है। आयोग ने अपील स्वीकार करते हुए बीमा कंपनी को ₹20 लाख की बीमित राशि, दावा खारिज करने की तारीख से भुगतान तक 6% वार्षिक ब्याज सहित देने का आदेश दिया। साथ ही मानसिक उत्पीड़न के लिए ₹1 लाख और मुकदमेबाजी खर्च के रूप में ₹50,000 देने का निर्देश भी जारी किया।

