मुफ्त पीने का पानी न देने पर रेस्टोरेंट दोषी: फरीदाबाद जिला उपभोक्ता आयोग

  • मुफ्त पीने का पानी न देने पर रेस्टोरेंट दोषी: फरीदाबाद जिला उपभोक्ता आयोग

    फरीदाबाद जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, जिसकी पीठ में अमित अरोड़ा (अध्यक्ष) और इंदिरा भड़ाना (सदस्य) शामिल थीं, ने एक रेस्टोरेंट के खिलाफ उपभोक्ता शिकायत स्वीकार करते हुए कहा है कि ग्राहक को मुफ्त पीने का पानी न देकर बोतलबंद पानी खरीदने के लिए मजबूर करना सेवा में कमी है।

    यह फैसला आकाश शर्मा बनाम एम/एस गार्डन ग्रिल्स 2.0 मामले में दिया गया।

    पुरा मामला

    शिकायतकर्ता आकाश शर्मा 18 जून 2025 को अपने दोस्तों के साथ फरीदाबाद स्थित एम/एस गार्डन ग्रिल्स 2.0 रेस्टोरेंट में डिनर के लिए गया। भोजन के दौरान जब उसने पीने का पानी मांगा, तो रेस्टोरेंट स्टाफ ने मुफ्त पीने का पानी देने से इनकार कर दिया और कहा कि ग्राहकों के लिए केवल बोतलबंद पानी ही उपलब्ध है, जिसे खरीदना होगा।

    शिकायतकर्ता ने इसका विरोध करते हुए स्टाफ और मैनेजर को बताया कि ग्राहकों को बोतलबंद पानी खरीदने के लिए मजबूर करना अवैध है और नियमों के खिलाफ है, लेकिन रेस्टोरेंट प्रबंधन अपने रुख पर अड़ा रहा। मजबूरी में शिकायतकर्ता को “डसानी” ब्रांड की दो बोतलें ₹40 में खरीदनी पड़ीं।

    इसके बाद शिकायतकर्ता ने सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार का आरोप लगाते हुए जिला उपभोक्ता आयोग का रुख किया और राशि की वापसी, मानसिक उत्पीड़न के लिए मुआवजा तथा इस प्रथा को बंद करने के निर्देश देने की मांग की।

    रेस्टोरेंट की अनुपस्थिति

    नोटिस की विधिवत सेवा के बावजूद रेस्टोरेंट आयोग के समक्ष उपस्थित नहीं हुआ, जिसके चलते उसे एकतरफा (ex parte) कार्यवाही में शामिल किया गया।

    आयोग की टिप्पणियां और फैसला

    आयोग ने कहा कि शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत शपथपत्र, बोतलबंद पानी का बिल और नोटिस की सेवा के प्रमाण बिना किसी प्रतिवाद के रिकॉर्ड पर हैं। चूंकि विपक्षी पक्ष ने न तो उपस्थित होकर आरोपों का खंडन किया और न ही कोई साक्ष्य प्रस्तुत किया, इसलिए शिकायतकर्ता के आरोप अप्रतिवादित रहे।

    आयोग ने यह स्पष्ट रूप से माना कि:

    ग्राहकों को मुफ्त पीने का पानी देने के बजाय बोतलबंद पानी खरीदने के लिए मजबूर करना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत सेवा में कमी है।

    आदेश

    शिकायत स्वीकार करते हुए, जिला उपभोक्ता आयोग ने रेस्टोरेंट को निर्देश दिया कि वह:

    शिकायतकर्ता से वसूले गए ₹40 की राशि वापस करे, और

    मानसिक पीड़ा और उत्पीड़न के लिए ₹3,000 का मुआवजा अदा करे।

    आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि वाद व्यय (litigation cost) नहीं दिया गया, क्योंकि शिकायतकर्ता ने स्वयं मामले की पैरवी की थी।

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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