चिकित्सकीय लापरवाही से महिला हुई स्थायी रूप से बांझ, दिल्ली उपभोक्ता आयोग ने डॉक्टर और नर्सिंग होम पर ₹20 लाख का जुर्माना लगाया

Praveen Mishra

9 Jan 2026 4:58 PM IST

  • चिकित्सकीय लापरवाही से महिला हुई स्थायी रूप से बांझ, दिल्ली उपभोक्ता आयोग ने डॉक्टर और नर्सिंग होम पर ₹20 लाख का जुर्माना लगाया

    दिल्ली जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (सेंट्रल) ने एक चिकित्सक और नर्सिंग होम को चिकित्सकीय लापरवाही और सेवा में कमी का दोषी ठहराते हुए कहा है कि उनकी लापरवाही के कारण एक गर्भवती महिला को स्थायी बांझपन (Permanent Infertility) का सामना करना पड़ा। आयोग ने माना कि गलत व देरी से इलाज और चिकित्सकीय योग्यता को गलत तरीके से प्रस्तुत करने के कारण महिला की प्रजनन क्षमता हमेशा के लिए समाप्त हो गई।

    यह आदेश आयोग की अध्यक्ष दिव्या ज्योति जैपुरीयर और सदस्य डॉ. रश्मि बंसल की पीठ ने पारित किया।

    पुरा मामला:

    शिकायतकर्ता समरीन ने गर्भवती होने के बाद 24 जुलाई 2020 को फैमिली हेल्थ केयर सेंटर में इलाज शुरू किया, जहां उसका इलाज डॉ. कुलजीत कौर गिल ने किया। 11 अगस्त से 2 सितंबर 2020 के बीच वह कई बार पेट दर्द और लगातार ब्लीडिंग की शिकायत लेकर डॉक्टर के पास गई, लेकिन इसके बावजूद न तो अल्ट्रासाउंड कराया गया और न ही कोई जरूरी जांच कराई गई। डॉक्टर ने इसे सामान्य बताकर केवल एसिडिटी और उल्टी की दवाइयाँ दीं।

    7 सितंबर 2020 को हालत बिगड़ने पर वह दूसरे डॉक्टर के पास गई, जहां जांच में गर्भ में मृत भ्रूण (Dead Embryo) पाया गया। उसे तुरंत कस्तूरबा अस्पताल ले जाया गया, जहां आपातकालीन सर्जरी करनी पड़ी और उसकी एक फैलोपियन ट्यूब निकालनी पड़ी। डॉक्टरों ने उसे बताया कि अत्यधिक आंतरिक क्षति के कारण अब वह भविष्य में गर्भधारण नहीं कर सकेगी।

    आयोग की टिप्पणियाँ

    आयोग ने पाया कि डॉ. कुलजीत कौर गिल केवल MBBS डॉक्टर थीं और उन्हें M.S./M.D. लिखने का अधिकार नहीं था, क्योंकि उनकी विदेशी डिग्री भारत में मान्यता प्राप्त नहीं थी। इसके बावजूद उन्होंने खुद को विशेषज्ञ स्त्री रोग विशेषज्ञ के रूप में पेश किया, जिसे आयोग ने पेशेवर गलत प्रस्तुति (misrepresentation) माना।

    आयोग ने यह भी कहा कि डॉक्टर ने उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था में जरूरी जांच नहीं कराई, चेतावनी संकेतों को नजरअंदाज किया और बेहद लापरवाही से इलाज किया, जिससे महिला की हालत गंभीर हो गई और उसे जीवनरक्षक सर्जरी करानी पड़ी।

    नर्सिंग होम को भी वाइकेरियस लायबिलिटी (परोक्स दायित्व) के तहत जिम्मेदार ठहराया गया, क्योंकि उसने डॉक्टर की योग्यता की जांच नहीं की और उचित निगरानी नहीं रखी।

    आयोग का फैसला:

    आयोग ने शिकायत स्वीकार करते हुए डॉक्टर और नर्सिंग होम को ₹20 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया, जो चिकित्सा खर्च, मानसिक पीड़ा और मुकदमे के खर्च के लिए होगा। साथ ही नर्सिंग होम को यह अधिकार दिया गया कि वह यह राशि कानून के अनुसार डॉक्टर से वसूल कर सकता है।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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