यात्री बस संचालक को सड़क पर चलने लायक वाहन देना और सावधानी से सेवा देना ज़रूरी : ज़िला उपभोक्ता आयोग

Praveen Mishra

9 Feb 2026 4:39 PM IST

  • यात्री बस संचालक को सड़क पर चलने लायक वाहन देना और सावधानी से सेवा देना ज़रूरी : ज़िला उपभोक्ता आयोग

    ज़िला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, एर्नाकुलम ने हाल ही में दो उपभोक्ताओं को मुआवज़ा प्रदान किया, जिन्हें बार-बार बस खराब होने और कथित कर बकाया के कारण चेक-पोस्ट पर रोके जाने से हुई देरी के चलते परीक्षा केंद्र समय पर पहुंचने के लिए टैक्सी किराए पर लेने के लिए मजबूर होना पड़ा।

    आयोग की पीठ—डी.बी. बीनू (अध्यक्ष), वी. रामचंद्रन और श्रीविद्या टी.एन.—ने कहा कि यात्री परिवहन संचालक का यह स्पष्ट दायित्व है कि वह सड़क-योग्य वाहन उपलब्ध कराए और उचित सावधानी व परिश्रम के साथ सेवा दे। पीठ ने टिप्पणी की:

    “सड़क-योग्यता और परिचालन तत्परता बनाए रखने में विफलता, जिसके परिणामस्वरूप अत्यधिक देरी होती है और यात्रियों को अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता है, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 2(11) के तहत सेवा में कमी है और सेवा प्रदान करने में लापरवाही को दर्शाती है।”

    मामले के तथ्य

    एर्नाकुलम के एक विवाहित दंपति ने National Institute of Electronics and Information Technology (NIELIT) में वैज्ञानिक पद के लिए आवेदन किया था, जो Ministry of Electronics & Information Technology के अधीन है। उन्हें सुबह 8:45 बजे बेंगलुरु में लिखित परीक्षा में उपस्थित होना था।

    उन्होंने परीक्षा वाले दिन सुबह जल्दी बेंगलुरु पहुंचने के लिए प्रतिवादी बस सेवा से ₹3,174 में दो टिकट बुक किए। हालांकि यात्रा के दौरान टायर फटना, कथित वाहन कर बकाया के कारण चेक-पोस्ट पर रोका जाना और कोयंबटूर पहुंचने से पहले बार-बार बस खराब होने जैसी घटनाओं से यात्रा बाधित होती रही।

    समय पर पहुंचने की आशंका को देखते हुए, शिकायतकर्ताओं ने कोयंबटूर से बेंगलुरु तक टैक्सी किराए पर ली, जिस पर उन्हें ₹14,000 खर्च करने पड़े। बस ऑपरेटर से रिफंड की मांग करने पर भी कोई राहत नहीं मिली, जिसके बाद उन्होंने सेवा में कमी का आरोप लगाते हुए उपभोक्ता आयोग का दरवाज़ा खटखटाया।

    आयोग का निर्णय

    नोटिस जारी होने के बावजूद प्रतिवादी की ओर से उपस्थिति न होने पर मामला एकतरफा सुना गया। आयोग ने माना कि शिकायतकर्ता उपभोक्ता हैं, क्योंकि उन्होंने प्रतिवादी की परिवहन सेवा के लिए भुगतान किया था।

    आयोग ने यह भी पाया कि बार-बार होने वाली खराबियां, टायर बदलने के लिए आवश्यक औज़ारों की कमी और कथित कर बकाया के कारण चेक-पोस्ट पर रुकना—ये सभी तथ्य दर्शाते हैं कि सेवा उचित सावधानी और परिश्रम के साथ नहीं दी गई।

    सेवा में कमी पाए जाने पर आयोग ने प्रतिवादी को:

    ₹3,174 (टिकट किराया) की वापसी,

    ₹14,000 (टैक्सी खर्च) की प्रतिपूर्ति,

    ₹25,000 मुआवज़ा (मानसिक पीड़ा, कठिनाई और असुविधा के लिए), तथा

    ₹5,000 वाद व्यय

    अदा करने का आदेश दिया।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

    Next Story