पति पत्नी को मोबाइल या बैंक पासवर्ड साझा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

Praveen Mishra

16 July 2025 11:09 PM IST

  • पति पत्नी को मोबाइल या बैंक पासवर्ड साझा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

    छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा है कि कोई पति अपनी पत्नी को उसकी निजी जानकारी, संचार, व्यक्तिगत वस्तुएं और यहां तक कि मोबाइल फोन और बैंक खातों के पासवर्ड साझा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।

    जस्टिस राकेश मोहन पांडे की एकल पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पति ऐसा करने के लिए दबाव डालता है, तो यह उसकी पत्नी की गोपनीयता का उल्लंघन होगा और घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम (PWDV) के प्रावधानों को लागू करने का आधार बन सकता है।

    कोर्ट ने कहा, “विवाह का यह अर्थ नहीं कि पति को स्वचालित रूप से पत्नी की निजी जानकारी, संचार और व्यक्तिगत वस्तुओं तक पहुंच मिल जाए। पति पत्नी से मोबाइल या बैंक पासवर्ड साझा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता और ऐसा करना गोपनीयता के अधिकार का उल्लंघन और संभावित रूप से घरेलू हिंसा माना जाएगा। वैवाहिक गोपनीयता, पारदर्शिता और आपसी विश्वास के बीच संतुलन होना चाहिए।”

    पुरा मामला:

    याचिकाकर्ता-पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(i-a) के तहत 'क्रूरता' के आधार पर विवाह विच्छेद की याचिका फैमिली कोर्ट में दाखिल की थी। पत्नी ने याचिका में लगाए गए आरोपों को खारिज करते हुए अपना जवाब दाखिल किया।

    तलाक की प्रक्रिया के दौरान पति ने दुर्ग के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) के समक्ष आवेदन देकर पत्नी के कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) मांगे क्योंकि उसे पत्नी के चरित्र पर शक था। इसी तरह का एक आवेदन फैमिली कोर्ट में भी दिया गया, जिसमें अधिकारियों को पत्नी की कॉल डिटेल देने का निर्देश देने की मांग की गई, जिसे फैमिली कोर्ट ने खारिज कर दिया। इसी खारिज आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तलाक की याचिका 'क्रूरता' के आधार पर दायर की गई थी, 'व्यभिचार' के आधार पर नहीं। पति ने पहली बार CDR मांगते समय पत्नी पर अपने बहनोई के साथ अवैध संबंध का आरोप लगाया था, लेकिन यह नहीं बताया कि कॉल डिटेल्स क्यों जरूरी हैं।

    कोर्ट ने के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत सरकार (2017), PUCL बनाम भारत सरकार (1996) और मिस्टर X बनाम हॉस्पिटल Z (1998) जैसे महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि गोपनीयता का अधिकार व्यक्ति की निजी अंतरंगता, वैवाहिक संबंधों की पवित्रता और यौन पहचान को भी संरक्षण देता है। इसलिए फैमिली कोर्ट द्वारा याचिका खारिज करना उचित था।

    जस्टिस पांडे ने आगे कहा कि विवाह के भीतर भी पति-पत्नी को गोपनीयता का अधिकार है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा संरक्षित है।

    कोर्ट ने कहा, " “घर या ऑफिस में की गई मोबाइल बातचीत जो अक्सर अंतरंग और गोपनीय होती हैं, वे निजी जीवन का अहम हिस्सा हैं और उन पर हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता,”

    कोर्ट ने यह भी कहा कि वैवाहिक संबंधों में साझेदारी जरूर होती है, लेकिन इससे यह अर्थ नहीं निकलता कि कोई एक साथी दूसरे की निजता, स्वतंत्रता और संचार में मनमाने ढंग से हस्तक्षेप करे।

    इस प्रकार, कोर्ट ने पति की कॉल डिटेल्स की मांग वाली याचिका खारिज करने के फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा क्योंकि ऐसा आदेश देना पत्नी के गोपनीयता के अधिकार का उल्लंघन होता।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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