बार एसोसिएशन की शोकसभा के नाम पर पूरे दिन सभी मामलों की सुनवाई टालना उचित नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

Amir Ahmad

1 Aug 2026 4:07 PM IST

  • बार एसोसिएशन की शोकसभा के नाम पर पूरे दिन सभी मामलों की सुनवाई टालना उचित नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

    छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि बार एसोसिएशन की ओर से शोकसभा आयोजित किए जाने के आधार पर पूरे दिन सभी मामलों की सुनवाई स्थगित नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि दिवंगत अधिवक्ता या न्यायिक अधिकारी को श्रद्धांजलि देना संस्थागत परंपरा का हिस्सा है, लेकिन इसके नाम पर पूरे दिन न्यायिक कार्य रोकना न्याय व्यवस्था को प्रभावित करता है।

    जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल ने यह टिप्पणी एक 72 वर्षीय मकान मालिक की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। याचिकाकर्ता ने रायपुर के किराया नियंत्रक के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें 2 फरवरी 2026 को जिला बार एसोसिएशन की शोकसभा के कारण पूरे दिन न्यायिक कार्य स्थगित कर सभी मामलों की सुनवाई आगे बढ़ा दी गई।

    याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि वह छत्तीसगढ़ किराया नियंत्रण अधिनियम के तहत बेदखली का मुकदमा लड़ रहा है। उसका आरोप था कि शोकसभा, प्रशासनिक कार्य या पीठासीन अधिकारी की अनुपलब्धता जैसे कारणों से बार-बार मामलों को यांत्रिक ढंग से स्थगित किया जाता है, जिससे कानून के तहत मामलों के शीघ्र निस्तारण का उद्देश्य विफल हो रहा है।

    हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों से सहमति जताते हुए कहा कि वकीलों की हड़ताल और न्यायिक कार्य का बहिष्कार पहले ही अवैध घोषित किया जा चुका है। केवल इस आधार पर कि वकील न्यायिक कार्य से दूर हैं अदालतें मामलों की सुनवाई स्थगित नहीं कर सकतीं। कोर्ट ने कहा कि शोकसभा के कारण भी न्यायिक कार्य से विरत रहना उचित नहीं माना जा सकता, क्योंकि न्याय तक निर्बाध पहुंच प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है।

    कोर्ट ने कहा कि हर वादकारी को यह वैध अपेक्षा होती है कि निर्धारित तारीख पर उसके मामले की सुनवाई होगी, जब तक कि न्यायालय के नियंत्रण से बाहर कोई ऐसी परिस्थिति उत्पन्न न हो जाए, जिससे सुनवाई असंभव हो।

    हाईकोर्ट ने कहा,

    "न्याय तक पहुंच संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत प्रदत्त अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। किसी अदालत या अधिकरण के समक्ष सूचीबद्ध सभी मामलों को बिना यह देखे कि कोई मामला अत्यावश्यक है या नहीं और बिना उपस्थित पक्षकारों को सुनवाई का अवसर दिए एक साथ स्थगित करना न्याय प्रशासन पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।"

    कोर्ट ने यह भी कहा कि छत्तीसगढ़ किराया नियंत्रण अधिनियम का उद्देश्य किराया विवादों का शीघ्र निस्तारण करना है। ऐसे में न्यायिक कार्य में बार-बार आने वाली रुकावटें न केवल इस उद्देश्य को विफल करती हैं, बल्कि त्वरित न्याय के संवैधानिक सिद्धांत के भी विपरीत हैं।

    हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामलों को स्थगित करने का अधिकार अदालत के विवेकाधिकार का हिस्सा है, लेकिन इसका इस्तेमाल हमेशा न्याय के हित में होना चाहिए। किसी ऐसे संगठन के अनुरोध पर, जो मुकदमे का पक्षकार ही नहीं है, केवल उसी आधार पर सुनवाई टालना न्यायिक विवेक का उचित प्रयोग नहीं माना जा सकता।

    इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने 2 फरवरी 2026 को पारित किराया नियंत्रक के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत केवल शोकसभा के कारण याचिकाकर्ता के मामले की सुनवाई स्थगित कर दी गई।

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