निजी शरिया संस्था मुस्लिम महिला का तलाक या वैवाहिक स्थिति तय नहीं कर सकती: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
Amir Ahmad
9 Sept 2026 5:28 PM IST

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि खुद को 'इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट' कहने वाली कोई निजी धार्मिक संस्था किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति या उसके कानूनी अधिकारों और दायित्वों का फैसला नहीं कर सकती।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धार्मिक आस्था किसी निजी संस्था को अदालत की तरह कानूनी स्थिति तय करने का अधिकार नहीं देती।
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने एक मुस्लिम महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।
महिला ने 18 जनवरी 2022 को इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट की ओर से जारी उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें कथित तौर पर उसे तीन तलाक के जरिए तलाकशुदा घोषित किया गया।
याचिका में संस्था के अस्तित्व और उसके अधिकार को भी संविधान तथा मौलिक अधिकारों के खिलाफ बताया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि इदारा-ए-शरिया को संविधान या किसी कानून के तहत गठित अदालत नहीं माना जा सकता।
उसके पास याचिकाकर्ता की वैवाहिक स्थिति तय करने या यह निर्धारित करने का कोई अधिकार नहीं है कि उसका विवाह कानूनी रूप से समाप्त हुआ है या नहीं।
कोर्ट ने कहा, “इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट की ओर से जारी आदेश अधिक से अधिक एक निजी संस्था की धार्मिक राय या सूचना हो सकता है। इसका किसी डिक्री या विवाह-विच्छेद के न्यायिक निर्णय के रूप में कोई कानूनी प्रभाव नहीं है।”
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी संस्था की राय, फैसला या आदेश किसी व्यक्ति के वैवाहिक या नागरिक अधिकारों पर बाध्यकारी नहीं हो सकता और उसे किसी जबरदस्ती वाली कानूनी प्रक्रिया के जरिए लागू नहीं किया जा सकता।
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता के पहले पति की मृत्यु के बाद उसने दूसरे पति से विवाह किया। दूसरे पति ने आरोप लगाया कि महिला की पहली शादी से हुए बच्चे नए परिवार के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रहे थे।
इसी आधार पर महिला को कथित तौर पर तलाक-ए-बिद्दत यानी तीन तलाक दिया गया। इस संबंध में FIR दर्ज होने और सक्षम अधिकारियों के समक्ष कार्यवाही लंबित रहने के बावजूद इदारा-ए-शरिया ने 18 जनवरी 2022 को अपना आदेश जारी किया।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विश्व लोचन मदान बनाम भारत संघ मामले में दिए गए फैसले का भी हवाला दिया।
कोर्ट ने कहा कि किसी संस्था की निर्णय देने की शक्ति वैध कानून से आनी चाहिए। दार-उल-कजा किसी कानून के तहत गठित संस्था नहीं है और उसके द्वारा जारी फतवा या राय कानून द्वारा मान्यता प्राप्त न्यायिक व्यवस्था के तहत दिया गया फैसला नहीं होता।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उस सिद्धांत को भी दोहराया कि फतवा बाध्यकारी नहीं होता और उसे किसी कानूनी दबाव या जबरदस्ती के जरिए लागू नहीं किया जा सकता। धार्मिक संस्थाएं कानून के तहत गठित अदालतों की शक्ति या हैसियत अपने ऊपर नहीं ले सकतीं।
कोर्ट ने कहा कि धर्म किसी व्यक्ति की अंतरात्मा और निजी आस्था का मार्गदर्शन कर सकता है, लेकिन कोई धार्मिक संस्था या निजी निकाय कानून से स्थापित अदालत की शक्ति अपने हाथ में नहीं ले सकता। किसी व्यक्ति की कानूनी स्थिति और उसके अधिकारों का निर्धारण कानून के मुताबिक ही किया जा सकता है। संवैधानिक व्यवस्था और कानून का शासन सर्वोपरि है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता पर कोई फैसला देने से परहेज किया। कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे से जुड़े मामले सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं, इसलिए इस स्तर पर उसकी वैधता पर टिप्पणी करना उचित नहीं होगा।
पीठ ने साफ किया कि सुप्रीम कोर्ट में कार्यवाही लंबित होने से इदारा-ए-शरिया को वह अधिकार नहीं मिल जाता, जो उसके पास कानूनन है ही नहीं। किसी निजी धार्मिक संस्था का कथित फैसला कानून द्वारा स्थापित अदालत के न्यायिक निर्णय का विकल्प नहीं बन सकता।
अदालत ने इस आधार पर याचिका को आंशिक रूप से मंजूर करते हुए 18 जनवरी 2022 के उस आदेश को, जहां तक वह महिला की वैवाहिक स्थिति तय करने या उसके विवाह को समाप्त घोषित करने की कोशिश करता है, कानूनी अधिकार के बिना घोषित कर दिया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस आदेश से महिला के किसी कानूनी अधिकार, वैवाहिक स्थिति या दायित्व में कोई बदलाव नहीं हो सकता।


