सिर्फ शिकायत के आधार पर पदोन्नति से वंचित नहीं किया जा सकता न्यायिक अधिकारी, विभागीय कार्रवाई न हो तो सेवा लाभ भी मिलेंगे: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

Amir Ahmad

1 July 2026 5:13 PM IST

  • सिर्फ शिकायत के आधार पर पदोन्नति से वंचित नहीं किया जा सकता न्यायिक अधिकारी, विभागीय कार्रवाई न हो तो सेवा लाभ भी मिलेंगे: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

    छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी न्यायिक अधिकारी की पदोन्नति केवल शिकायत के आधार पर स्थायी रूप से नहीं रोकी जा सकती, यदि उस शिकायत पर न तो विभागीय जांच हुई हो, न अनुशासनात्मक कार्रवाई और न ही कोई प्रतिकूल निष्कर्ष निकला हो।

    जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ न्यायिक अधिकारी की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता ने पदोन्नति टाले जाने और मूल वरिष्ठता बहाल नहीं किए जाने के फैसले को चुनौती दी।

    मामले के अनुसार, वर्ष 2014 में याचिकाकर्ता पदोन्नति के लिए पात्र थीं, लेकिन उनकी पदोन्नति पर विचार 'स्थगित' श्रेणी में रख दिया गया, जबकि उनसे कनिष्ठ अधिकारियों को पदोन्नत कर दिया गया।

    यह निर्णय दुर्ग के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक द्वारा की गई शिकायत के आधार पर लिया गया। शिकायत याचिकाकर्ता द्वारा पारित न्यायिक आदेशों से संबंधित थी। हालांकि, इस शिकायत के आधार पर न कभी विभागीय जांच शुरू हुई और न ही कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई।

    बाद में 12 अगस्त 2016 को याचिकाकर्ता को पदोन्नति तो दे दी गई, लेकिन उनकी मूल वरिष्ठता बहाल नहीं की गई। वरिष्ठता बहाल करने का उनका अभ्यावेदन भी 21 फरवरी 2018 के आदेश से खारिज कर दिया गया।

    हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता की पदोन्नति केवल शिकायत के कारण स्थगित की गई, जबकि शिकायत कभी भी किसी दुराचार के निष्कर्ष या प्रतिकूल कार्रवाई तक नहीं पहुंची। अदालत ने यह भी कहा कि विभागीय पदोन्नति समिति ने उन्हें अयोग्य घोषित नहीं किया और बाद में उपलब्ध लगभग उसी सेवा रिकॉर्ड के आधार पर उन्हें पदोन्नत भी कर दिया गया।

    अदालत ने कहा,

    "जब शिकायत का परिणाम न तो विभागीय कार्रवाई, न जांच, न दंड और न ही किसी प्रतिकूल निष्कर्ष के रूप में सामने आया, तब पदोन्नति स्थगित रखने का कोई कानूनी महत्व नहीं रह जाता। ऐसी स्थिति में केवल अस्थायी रूप से पदोन्नति टाले जाने के आधार पर कर्मचारी को सेवा संबंधी नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता।"

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता का अभ्यावेदन खारिज करने वाला आदेश अत्यंत संक्षिप्त था और उसमें कोई कारण नहीं बताया गया। अदालत ने माना कि पदोन्नति और उससे जुड़ी वरिष्ठता का विवाद केवल तकनीकी आधार पर विलंब का मामला नहीं माना जा सकता, क्योंकि इसका प्रभाव कर्मचारी की भविष्य की पदोन्नतियों और अन्य सेवा लाभों पर लगातार पड़ता है।

    अदालत ने कहा कि राज्य का रवैया संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 में निहित समानता और निष्पक्षता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।

    इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए सक्षम प्राधिकारी को वर्ष 2014 से याचिकाकर्ता की पदोन्नति और उससे जुड़ी वरिष्ठता के दावे पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया।

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