मतगणना के दौरान पुनर्मतगणना की मांग न करना चुनाव याचिका खारिज करने का आधार नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
Amir Ahmad
5 Nov 2026 3:14 PM IST

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि मतगणना के दौरान पुनर्मतगणना की मांग नहीं किए जाने के आधार पर ही चुनाव याचिका खारिज नहीं की जा सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मतों की गिनती और उनके सारणीकरण में गड़बड़ी तथा चुनावी रिकॉर्ड में हेरफेर के विशिष्ट आरोप ऐसे मुद्दे हैं, जिनकी सुनवाई साक्ष्यों के आधार पर होनी जरूरी है।
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद एक निर्वाचित प्रत्याशी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। प्रत्याशी ने चुनाव न्यायाधिकरण के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 7 नियम 11 के तहत दायर उसका आवेदन खारिज कर दिया गया। इस आवेदन में चुनाव याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज करने की मांग की गई।
चुनाव याचिका में मतदान केंद्र संख्या 187 पर मतगणना और मतों के सारणीकरण में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए निर्वाचित प्रत्याशी के निर्वाचन को चुनौती दी गई। निर्वाचित प्रत्याशी की दलील थी कि 23 फरवरी, 2025 को मतगणना के दौरान छत्तीसगढ़ पंचायत निर्वाचन नियम, 1995 के नियम 80(1) और 80(5) के तहत पुनर्मतगणना की मांग नहीं की गई। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए उसने कहा कि उचित समय पर पुनर्मतगणना का अनुरोध नहीं किए जाने के कारण चुनाव याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।
हाईकोर्ट ने कहा कि आदेश 7 नियम 11 के तहत किसी आवेदन पर विचार करते समय अदालत को पूरी चुनाव याचिका और उसमें किए गए दावों की जांच करनी होती है। यह देखना जरूरी है कि याचिका में मुकदमा चलाने का कोई वैध आधार बताया गया या नहीं। इस शुरुआती चरण में निर्वाचित प्रत्याशी की ओर से पेश बचाव और ऐसे विवादित सवालों पर विचार नहीं किया जा सकता, जिनके निर्धारण के लिए साक्ष्यों की जरूरत हो।
कोर्ट ने कहा कि मतगणना के समय पुनर्मतगणना की मांग नहीं किया जाना अपने आप में पूरी चुनाव याचिका की जांच करने की आवश्यकता समाप्त नहीं करता।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“केवल इस तथ्य से कि मतगणना के समय पुनर्मतगणना का कोई अनुरोध नहीं किया गया, यह आवश्यकता समाप्त नहीं हो जाती कि पूरी चुनाव याचिका की जांच की जाए और यह निर्धारित किया जाए कि उसमें मुकदमा चलाने का आधार मौजूद है या नहीं, अथवा याचिका प्रथम दृष्टया कानून के तहत प्रतिबंधित है।”
हाईकोर्ट ने यह भी गौर किया कि चुनाव याचिकाकर्ता ने बताया था कि मतों के सारणीकरण में गड़बड़ी का पता उसे प्रमाणित सारणीकरण चार्ट प्राप्त होने के बाद ही चला। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह इस स्तर पर यह तय नहीं कर रहा है कि याचिकाकर्ता का यह स्पष्टीकरण पर्याप्त है या नहीं और लगाए गए आरोप सही हैं या नहीं। इन सवालों का फैसला साक्ष्यों के आधार पर चुनाव न्यायाधिकरण को करना होगा।
कोर्ट ने आगे कहा कि जिला निर्वाचन अधिकारी ने कथित तौर पर अधिकार नहीं होने के कारण पुनर्मतगणना नहीं कराई थी। इस आधार पर यह स्वतः नहीं माना जा सकता कि चुनाव याचिका कानूनन प्रतिबंधित है।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“यह दलील भी कि जिला निर्वाचन अधिकारी पहले ही पुनर्मतगणना के अनुरोध पर विचार कर उसे खारिज कर चुके थे, अपने आप में यह साबित नहीं करती कि आदेश 7 नियम 11 के तहत चुनाव याचिका खारिज की जानी चाहिए।”
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने निर्वाचित प्रत्याशी की याचिका खारिज की और चुनाव न्यायाधिकरण का आदेश बरकरार रखा। साथ ही न्यायाधिकरण को निर्देश दिया कि वह कानून के अनुसार चुनाव याचिका पर आगे की कार्यवाही जारी रखे।

