पिछड़ा वर्ग आयोग निजी कारोबारी विवाद में वसूली का आदेश नहीं दे सकता, सिफारिश का नाम देने से अधिकार क्षेत्र नहीं बदलता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

Amir Ahmad

7 Sept 2026 3:16 PM IST

  • पिछड़ा वर्ग आयोग निजी कारोबारी विवाद में वसूली का आदेश नहीं दे सकता, सिफारिश का नाम देने से अधिकार क्षेत्र नहीं बदलता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

    छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग दो निजी पक्षकारों के बीच कारोबारी विवाद का फैसला नहीं कर सकता और न ही एक निजी पक्ष से तय रकम की वसूली कर दूसरे निजी पक्ष को भुगतान करने का निर्देश दे सकता है। अदालत ने कहा कि किसी आदेश को महज 'सिफारिश' कह देने से उसका वास्तविक स्वरूप नहीं बदल जाता।

    चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच एक इंट्रा-कोर्ट अपील पर सुनवाई कर रही थी। अपील एकल पीठ के 17 जून 2026 के आदेश के खिलाफ दायर की गई, जिसके जरिए छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की कार्यवाही रद्द कर दी गई।

    मामला प्रीत हार्वेस्टर मशीन की खरीद से जुड़े एक समझौते से शुरू हुआ। अपीलकर्ता ने मशीन की पूरी कीमत चुका दी थी, लेकिन उसे बुक किया गया हार्वेस्टर नहीं दिया गया। समझौते के लिए दबाव बनाने पर उसके साथ मारपीट भी की गई। इसके बाद उसने पिछड़ा वर्ग आयोग का दरवाजा खटखटाया। आयोग ने अपीलकर्ता द्वारा मांगे गए मुआवजे की रकम प्रतिवादी नंबर 3 से वसूल कर उसे देने की सिफारिश की।

    अपीलकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि आयोग ने कोई न्यायिक या सीधे लागू होने वाला आदेश पारित नहीं किया, बल्कि केवल सिफारिश की थी। यह भी कहा गया कि यदि सिफारिश का कोई हिस्सा आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर चला गया तो पूरी कार्यवाही रद्द करने के बजाय उसे संशोधित या वापस भेजा जा सकता था।

    हाईकोर्ट ने छत्तीसगढ़ पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम की धारा 9 का उल्लेख करते हुए कहा कि आयोग को पिछड़े वर्गों के सदस्यों के हितों और अधिकारों की निगरानी व सुरक्षा, कल्याणकारी कार्यक्रमों की निगरानी, राज्य सरकार को सलाह देने और सरकार द्वारा सौंपे गए अन्य कार्य करने का अधिकार है। लेकिन कानून की योजना आयोग को निजी कारोबारी विवाद का फैसला करने और एक निजी पक्ष से तय रकम लेकर दूसरे निजी पक्ष को दिलाने का अधिकार नहीं देती।

    अदालत ने कहा कि जांच के लिए आयोग को मिली कुछ शक्तियों का मतलब यह नहीं है कि उसे सिविल कोर्ट का दर्जा या अधिकार क्षेत्र मिल गया है। मौजूदा मामले में आयोग ने एक निश्चित रकम प्रतिवादी नंबर 3 से वसूल कर कलेक्टर के जरिए अपीलकर्ता को देने का निर्देश दिया। अदालत के मुताबिक यह निर्देश वास्तविक रूप से एक निजी पक्ष पर दूसरे निजी पक्ष की मौद्रिक देनदारी तय करता है और उसकी वसूली का आदेश देता है।

    डिवीजन बेंच ने कहा कि केवल इस निर्देश को 'सिफारिश' बता देने से इसकी वास्तविक प्रकृति नहीं बदलती। किसी आदेश का स्वरूप उसके नाम से नहीं, बल्कि उसके वास्तविक प्रभाव से तय होता है। आयोग का निर्देश न्यायिक निर्णय और लागू किए जा सकने वाले आदेश की प्रकृति का था, जबकि ऐसा करना उसके वैधानिक अधिकार क्षेत्र से बाहर था।

    हाईकोर्ट ने यह दलील भी खारिज की कि सिंगल बेंच को पूरी कार्यवाही रद्द करने के बजाय केवल अधिकार क्षेत्र से बाहर वाले हिस्से को संशोधित करना चाहिए। अदालत ने कहा कि जब आयोग ने कानून के तहत मिले अधिकार क्षेत्र की सीमा पार कर दी थी, तब एकल पीठ द्वारा उसके समक्ष चुनौती दी गई पूरी कार्यवाही को रद्द करना उचित था।

    डिवीजन बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि सिंगल बेंच ने वैधानिक व्यवस्था की सही व्याख्या की और यह सही पाया कि पिछड़ा वर्ग आयोग ने प्रतिवादी नंबर 3 से रकम की वसूली का निर्देश देकर अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा का उल्लंघन किया।

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