जज की भतीजी वकील के तौर पर हुई पेश, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट बेंच ने सुनवाई से खुद को अलग किया
Shahadat
22 April 2026 9:32 AM IST

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच ने पिछले हफ़्ते रजिस्ट्रार (ज्यूडिशियल) द्वारा चीफ़ जस्टिस के निर्देश पर जारी किए गए सर्कुलर पर कड़ी आपत्ति जताई। यह सर्कुलर सुनवाई से हटने के नियमों से जुड़ा था। बेंच ने इसे "कोर्ट के कामकाज में दखल" बताया।
यह कड़ी टिप्पणी तब आई जब बेंच [जस्टिस संजय एस अग्रवाल और जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास] ने वैवाहिक अपील की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि बेंच के एक पीठासीन जज [जस्टिस अग्रवाल] की भतीजी इस मामले में वकील के तौर पर पेश हुई थी, हालांकि वह जूनियर वकील थी।
बता दें, नियम 6, भाग VI, अध्याय-II "पेशेवर आचरण और शिष्टाचार के मानक (वकील अधिनियम की धारा 49 (1) (c) के तहत नियम, उसके परंतुक के साथ पठित)" के तहत निर्धारित प्रावधान, किसी वकील को किसी ऐसे कोर्ट के सामने बहस करने या प्रैक्टिस करने से रोकता है, जहां जज उसका कोई करीबी रिश्तेदार हो; और इसमें स्पष्ट रूप से भतीजी भी शामिल है।
इस प्रावधान पर भरोसा करते हुए बेंच ने टिप्पणी की,
"किसी भी तरह के अवांछित विवाद से बचने के लिए इस मामले की सुनवाई इस बेंच के किसी सदस्य द्वारा किया जाना उचित नहीं है।"
नतीजतन, बेंच ने निर्देश दिया कि इस मामले को एक उपयुक्त बेंच के सामने सूचीबद्ध किया जाए, जिसमें जस्टिस अग्रवाल सदस्य न हों।
हालांकि, मामले को निपटाने से पहले बेंच ने चीफ़ जस्टिस के निर्देश पर जारी किए गए हालिया सर्कुलर (दिनांक 16 अप्रैल, 2026) पर भी विचार किया, जिसका मुख्य उद्देश्य बेंच/कोर्ट चुनने की प्रथा को रोकना था।
सर्कुलर में मूल रूप से कहा गया कि किसी बेंच या कोर्ट से सुनवाई से हटने के अपवाद को एक सामान्य नियम के तौर पर नहीं माना जाएगा। इसका सहारा केवल दुर्लभ और वास्तविक परिस्थितियों में ही लिया जाएगा।
महत्वपूर्ण बात यह है कि सर्कुलर में आगे यह भी कहा गया कि यदि कोई वकील, जिसका किसी जज से कोई रिश्ता हो, कोई केस स्वीकार कर लेता है या उसे वापस नहीं करता है, तो भी उस लंबित मामले को संबंधित बेंच द्वारा सुनवाई से हटने के अपवाद का आधार नहीं माना जाएगा।
इसके बजाय सर्कुलर में जजों को ऐसे मामलों के समय और प्रकृति की जांच करने का निर्देश दिया गया, जिसमें यह कहा गया:
"केवल दुर्लभ और असाधारण मामलों में, और इस बात से संतुष्ट होने पर कि स्थिति वास्तविक है। इसका उद्देश्य संबंधित बेंच/कोर्ट से बचना नहीं है, बेंच/कोर्ट लिखित रूप में दर्ज किए जाने वाले कारणों के आधार पर कोई अपवाद बनाने पर विचार कर सकती है।"
इस सर्कुलर के खिलाफ बहुत कड़ा रुख अपनाते हुए डिवीज़न बेंच ने टिप्पणी की कि यह तय करना कि किस मामले को अपवाद माना जाए और कोर्ट को कैसे काम करना है, संबंधित बेंच का विशेषाधिकार है और इसे "इस तरह निर्देशित और प्रतिबंधित" नहीं किया जा सकता।
बेंच ने आगे कहा,
"इस प्रकार, उक्त सर्कुलर कोर्ट के कामकाज में हस्तक्षेप प्रतीत होता है।"
हालांकि, कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस मामले को लिस्टिंग के संबंध में उचित आदेशों के लिए चीफ जस्टिस के समक्ष रखा जाए।

