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"युवा वकीलों को ऐसे मामले उठाने चाहिए": इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 11 साल से अधिक समय तक जेल में बंद विचाराधीन कैदी को जमानत दी

Sharafat
12 May 2022 3:51 PM GMT
युवा वकीलों को ऐसे मामले उठाने चाहिए: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 11 साल से अधिक समय तक जेल में बंद विचाराधीन कैदी को जमानत दी
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के प्रयास के एक मामले में 11 साल से अधिक समय से जेल में बंद एक विचाराधीन कैदी को गुरुवार को ज़मानत दे दी। अदालत ने युवा वकीलों को ऐसे कैदियों के मामलों को उठाने की सलाह भी दी, जो अपनी खराब आर्थिक स्थिति के कारण अदालत नहीं पहुंच सकते।

जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी की खंडपीठ ने सौदान सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (Crl. अपील नंबर 308/2022) मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में की गई टिप्पणियों को भी ध्यान में रखा, जिसमें शीर्ष अदालत ने दोहराया था कि विचाराधीन कैदियों की लंबी कैद भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदान किए गए उनके अधिकारों का उल्लंघन है।

उल्लेखनीय है कि सौदान सिंह केस (सुप्रा) में, इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष आपराधिक अपीलों के लंबे समय तक लंबित रहने के बारे में चिंता व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 25 फरवरी को कुछ व्यापक मानदंड निर्धारित किए जिन्हें हाईकोर्ट द्वारा ज़मानत देते समय अपनाया जा सकता है।

वर्तमान मामले में हाईकोर्ट ने कहा कि अखिलेश (अंडर-ट्रायल कैदी) को निचली अदालत ने लगभग 10 साल पहले जमानत देने से इनकार कर दिया था, हालांकि, चूंकि उसे कोई कानूनी सहायता प्रदान नहीं की गई थी, इसलिए वह वर्ष 2021 में ही अपनी जमानत अर्जी दाखिल कर सकता था।

पीठ ने कहा,

"इस तरह का मामला भी एक ज्वलंत उदाहरण है जहां वकील बिरादरी की भूमिका समाज के मशाल वाहक के रूप में सामने आती है। युवा वकीलों को सलाह दी जाती है कि वे आगे आएं और ऐसे व्यक्तियों के मामलों को उठाएं जो कानूनी प्रावधानों के ज्ञान की कमी के साथ-साथ उनकी प्रतिकूल आर्थिक स्थिति के कारण इस न्यायालय के समक्ष नहीं आ पाए हैं।

राज्य के अधिकारियों को इस मामले को देखने और जेल अधिकारियों को न केवल विचाराधीन कैदियों या दोषी व्यक्तियों को उनके कानूनी अधिकारों के बारे में बताने के लिए सकारात्मक निर्देश पारित करने का निर्देश दिया जाता है, बल्कि वे वर्तमान मामले में आवेदक जैसे आरोपी व्यक्तियों की मदद करने के लिए भी आगे आएं।

न्याय में देरी करना , न्याय से वंचित करना है और साथ ही मुफ्त कानूनी सहायता का अधिकार और स्पीड ट्रायल संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदान किए गए अधिकार हैं। जेल में अधिक भीड़ होना भी चिंता का विषय है।"

कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि जेल अधिकारियों का भी कर्तव्य है कि अगर अंडर ट्रायल कैदियों की उनकी पैरवी के लिए कोई नहीं है या उनके पास रुपयों का आभाव है तो वे विचाराधीन कैदियों को उनके कानूनी अधिकारों और उपायों के बारे में बताएं।

केस टाइटल - अखिलेश बनाम यूपी राज्य [आपराधिक MISC। जमानत आवेदन नंबर - 37317/2021 ]

साइटेशन : 2022 लाइव लॉ (एबी) 238

आदेश पढ़ने/डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



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