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पत्नी की चुप्पी को यह नहीं माना जा सकता कि उसने हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम की धारा 7 के तहत गोद लेने को सहमति दे दी है: इलाहाबाद उच्च न्यायालय

LiveLaw News Network
5 March 2021 1:52 PM GMT
पत्नी की चुप्पी को यह नहीं माना जा सकता कि उसने हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम की धारा 7 के तहत गोद लेने को सहमति दे दी है: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना है कि पति द्वारा गोद लेने के समय पत्नी की चुप्पी या विरोध का अभाव, हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 7 के तहत इस तरह के गोद लेने पर सहमति नहीं मानी जा सकती है।

जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की खंडपीठ ने फैसला में कहा, "अदालत पत्नी की सहमति सिर्फ इसलिए नहीं मान सकती क्योंकि वह गोद लेने के समय मौजूद थी।"

यह माना गया कि अधिनियम की धारा 7 के प्रावधान को संतुष्ट करने के लिए, एक हिंदू पुरुष, जिसकी जीवित पत्नी है, द्वारा गोद का प्रस्ताव देने वाली पार्टी को यह साबित करने के लिए सबूत देना होगा कि उसकी पत्नी की सहमति से ऐसा किया गया है।

पीठ ने कहा, "यह या तो लिखित रूप में उसकी सहमति का सबूत देने वाले दस्तावेज को पेश करके या यह दिखाने के लिए महत्वपूर्ण सबूत पेश करके किया जा सकता है कि पत्नी ने गोद लेने की पति की कार्रवाई का समर्थन करने के लिए एक सकारात्मक मानसिकता के साथ गोद लेने के समारोहों में सक्रिय रूप से भाग लिया था।"

[धारा 7 में कहा गया है: कोई भी पुरुष हिंदू, जो पर‌िपक्व बुद्धि का है और नाबालिग नहीं है, पुत्र या पुत्री को गोद लेने की क्षमता रखता है: बशर्ते कि, यदि उसकी जीव‌ित पत्नी है, तो वह उसकी सहमति के बिना उसे नहीं अपनाएगा, जब तक कि उसकी पत्नी पूरी तरह से और अंततः दुनिया को त्याग नहीं चुकी है या वह हिंदू नहीं रह गई है या उसे सक्षम न्यायालय द्वारा अपरिपक्व दिमाग का माना जा चुका है।]

पृष्ठभूमि

इस मामले में, अपीलकर्ता की मृतक (कथित) दत्तक पिता राजेंद्र सिंह के स्थान पर अनुकंपा नियुक्ति के दावा को, अन्य बातों के साथ अस्वीकार कर दिया गया था क्योंकि मृतक की एक जीवित पत्नी थी।

संबंधित प्राधिकारी ने अपीलकर्ता की ओर से पेश दत्तक विलेख को इस आधार पर अस्वीकार कर दिया था कि उसमें दत्तक पिता को अविवाहित बताया गया था, जबकि उसकी जीवित पत्नी थी, जिनका नाम फूलमती था।

उल्लेख किया गया कि फूलमती की सहमति के बिना, अपीलार्थी को गोद लेने को वैध नहीं कहा जा सकता। उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने उक्त आदेश के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दिया था, जिसके बाद मौजूदा अपील दायर की गई।

अपीलार्थी ने खंडपीठ के समक्ष दो प्राथमिक आधार रखे थे: (i) दिनांक 31.08.1997 की एक डिक्री के जर‌िए मृतक (कथित) दत्तक पिता राजेंद्र सिंह के साथ पत्नी फूलमती का विवाह भंग हो गया था; (ii) भले ही यह मान लिया जाए कि कानूनी रूप से तलाक नहीं हुआ था, लेकिन उन्होंने पति से अलग रहकर, दुनिया को त्याग दिया था, इसलिए उनकी सहमति आवश्यक नहीं थी।

इसके अलावा, अपीलकर्ता ने दलील दी कि एचएएमए की धारा 16, विलेख की प्रस्तुति पर गोद लेने की वैधता के रूप में एक पूर्वानुमान उठाता है, और चूंकि मृतक के उत्तराधिकारियों में से किसी की ओर से अपीलकर्ता को गोद लेने पर कोई गंभीर आपत्त‌ि दर्ज नहीं की गई थी, इसलिए उसे पुर्वानुमान को बढ़ाकर गोद लेने का लाभ प्रदान किया जाना चाहिए।

जांच - परिणाम

खंडपीठ ने अपीलार्थी की ओर से पेश सभी तीन दलीलों को खारिज कर दिया-

1. कथित तलाक विलेख के संबंध में, न्यायालय ने कहा, "कथित डिक्री, जिसे रिकॉर्ड पर लाया गया है, तलाक की डिक्री नहीं है। यह केवल समझौते के रूप तलाक की कार्यवाही का निस्तारण करता है।"

उक्त समझौता में दर्ज किया गया है कि राजेंद्र सिंह और फूलमती पति-पत्नी बने रहेंगे और मुकदमेबाजी के खर्च के रूप में राजेंद्र सिंह, फूलमती को 5000 रुपए देंगे।

2. यह दलील कि फूलमती अपने पति के सा‌थ नहीं रहती थी, और इसलिए यह कहा जा सकता है कि उसने दुनिया छोड़ दी थी और इस तरह, उसकी सहमति की आवश्यकता नहीं होगी - न्यायालय ने कहा, सहमति की आवश्यकता को, 1956 अधिनियम की धारा 7 के तहत, जहां शादी का विघटन नहीं हुआ है, यदि पत्नी, पति से अलग भी रह रही हो, तो भी समाप्त नहीं किया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा, "गोद लेने के लिए अलग रह रही पत्नी की सहमति भी आवश्यकता होगी, अगर विवाह को समाप्त नहीं हुआ है।"

पीठ ने मामले में ब्रजेंद्र सिंह बनाम एमपी राज्य, (2008) 13 एससीसी 161 पर भरोसा रखा, जहां सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "तलाकशुदा महिला और तलाकशुदा के रूप में रह रही महिला के बीच वैचारिक और प्रासंगिक अंतर है। दोनों कोएक जैसा नहीं माना जा सकता है।"

3. अपीलकर्ता की विलेख के अनुमान संबंध में दी गई दलील पर न्यायालय ने स्पष्ट किया इस प्रकार का अनुमान खंडनीय है।

यह उल्लेख किया गया कि मौजूदा मामले में, दत्तक विलेख, जिस पर निर्भरता रखी गई है, अपीलकर्ता ने अपने कथित दत्तक पिता को अविवाहित घोषित किया है, जबकि यह रिकॉर्ड पर स्थापित है कि वह विवाहित थे और गोद लेने की तिथि पर उनकी पत्नी जीवित थी।

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