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अलग रहने वाली पत्नी ने माता-पिता के घर में आत्महत्या कीः कर्नाटक हाईकोर्ट ने विवादित तथ्यों का हवाला देते हुए पति के खिलाफ दहेज हत्या का मामला रद्द करने से इनकार किया

Manisha Khatri
14 July 2022 11:00 AM GMT
हाईकोर्ट ऑफ कर्नाटक
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कर्नाटक हाईकोर्ट

कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक पति की तरफ से दायर उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 304 बी और 498 ए के तहत दर्ज दहेज हत्या के मामले को रद्द करने की मांग की थी। उसकी पत्नी दो साल से अधिक समय से अलग रह रही थी और उसने अपने पैतृक घर में आत्महत्या कर ली थी।

जस्टिस एम नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने निरंजन हेगड़े की तरफ से दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि मामले में गंभीर रूप से विवादित तथ्य मौजूद होने के कारण ''फुल ब्लोन ट्रायल'' की आवश्यकता है और इसलिए, इस स्तर पर कार्यवाही को रद्द करने का कोई आधार नहीं है।

कोर्ट ने यह भी कहा,

''दलील यह है कि यह 'मृत्यु से ठीक पहले' होना चाहिए और मृत्यु से ठीक पहले की 'मृत्यु से तुरंत पहले' के रूप में व्याख्या की जानी चाहिए और दो साल पहले वैवाहिक घर छोड़ने वाले मृतक का मतलब मृत्यु से ठीक पहले नहीं होगा, यह सभी विकर्षक हैं, क्योंकि इस समय इस पर विचार करना बहुत दूर की असंभव बात है।''

पीठ ने कहा, ''यह एक ऐसा मामला भी है, जहां शिकायतकर्ता ने ऐसी सामग्री को रिकॉर्ड पर रखा है जो याचिकाकर्ता के खिलाफ आगे की कार्यवाही जारी रखने की मांग करेगी और याचिकाकर्ता ने ऐसा कोई दस्तावेज नहीं रखा है जो इतना अभेद्य और स्टर्लिंग गुणवत्ता का हो कि एफआरआई दर्ज करने के चरण में ही पूरी कार्यवाही को रद्द करने की आवश्यकता होगी।''

मृतका के पिता द्वारा दायर शिकायत के अनुसार, कपल ने वर्ष 2017 में शादी की थी। शादी के तुरंत बाद से ही पत्नी और पति के बीच संबंध ठीक नहीं रहे और उनके बीच आपसी तालमेल का गंभीर मुद्दा था। जब उनके बीच की यह असामंजस्यता अपरिहार्य हो गई, तो ऐसा प्रतीत होता है कि शिकायतकर्ता की बेटी ने वैवाहिक घर छोड़ दिया और अपने माता-पिता के साथ बैंगलोर में रहने लग गई। सुलह के सभी प्रयास, जो दो साल से अधिक समय से चल रहे थे, विफल हो गए थे।

अपूरणीय असामंजस्यता के स्कोर पर, याचिकाकर्ता और शिकायतकर्ता की बेटी दोनों ने आपसी सहमति से हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13बी के तहत तलाक के लिए एक आवेदन दायर किया, जिसमें 6 महीने की कूलिंग ऑफ अवधि से छूट देने के लिए दायर एक आवेदन भी शामिल था।

फैमिली कोर्ट के समक्ष उक्त याचिका के लंबित रहने के दौरान, यह स्पष्ट होता है कि याचिकाकर्ता की पत्नी ने अपने पैतृक घर के बेडरूम में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली और उस इलाके की पुलिस के समक्ष आत्महत्या की रिपोर्ट दर्ज की गई। उक्त घटना के बाद याचिकाकर्ता-पति के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 304बी, 313 और 498ए के तहत मामला दर्ज करवाया गया।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश एडवोकेट अरुण गोविंदराज ने दलील दी कि पति और पत्नी के बीच दो साल से अधिक समय तक रहे तनावपूर्ण संबंधों के कारण शिकायतकर्ता की बेटी ने वैवाहिक घर छोड़ दिया था और अपने माता-पिता के घर में रहने लग गई थी। शिकायतकर्ता के परिवार का भी आपस में विवाद है।

शिकायतकर्ता ने तर्क दिया कि जांच अभी जारी है। इस स्तर पर, केवल यह देखा जाना है कि क्या प्रथम दृष्टया शिकायत आईपीसी की धारा 304बी के अवयवों को संतुष्ट करती है? इसके अलावा, आईपीसी की धारा 313 और 498ए के तहत आरोपित अन्य अपराध हैं जो सभी संज्ञेय हैं।

निष्कर्षः

पीठ ने शिकायत को देखा और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भरोसा किया और कहा, ''शिकायत बताती है कि 12-06-2022 की रात को दुर्भाग्यपूर्ण घटना से ठीक पहले वह अपने पति के साथ बातचीत कर रही थी। क्या मृत्यु से पहले पति के साथ बातचीत के कारण आत्महत्या की गई है या यह वर्षों से चल रहा सामूहिक उत्पीड़न था जो आत्महत्या के उक्त आयोग में विस्फोटक साबित हुआ है, यह आवश्यक रूप से ट्रायल का मामला है, क्योंकि प्रथम दृष्टया शिकायत ऐसे उदाहरणों को बताती है जो आईपीसी की धारा 304 बी के घटक बन सकते हैं?''

कोर्ट ने यह भी कहा, ''एफआईआर आईपीसी की धारा 304 बी के तहत अन्य अपराधों के साथ दंडनीय अपराधों के लिए दर्ज की गई है। शिकायत और कथन प्रथम दृष्टया आईपीसी की धारा 304 बी की सामग्री का संकेत देते हैं।''

इसके अलावा पीठ ने ससुर द्वारा आरोपी के बैंक खातों में भेजी गई राशि के हस्तांतरण को ध्यान में रखा और कहा, ''ससुर द्वारा दामाद को धन हस्तांतरित किए जाने का संकेत देने वाले कुछ दस्तावेज पेश किए गए हैं। इसलिए, प्रथम दृष्टया, अपराध के पंजीकरण और जांच को जारी रखने के लिए सभी अपराधों की सामग्री मौजूद है।''

पीठ ने यह भी कहा, ''इस तरह के गंभीर अपराध के मामले में,जैसा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध दस्तावेजों से एकत्र किया जा सकता है, इस समय हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है, क्योंकि निस्संदेह तथ्य के गंभीर रूप से विवादित प्रश्नों की अधिकता है। इस मामले में प्राथमिक घटक, शादी के 7 साल पूरे होने से पहले मृत्यु होना, मौजूद है, क्योंकि इस कपल की शादी वर्ष 2017 में हुई थी और शिकायतकर्ता की बेटी ने 12-06-2022 को आत्महत्या कर ली थी। क्रूरता या दहेज की मांग,किसने उसकी बेटी को आत्महत्या करने के लिए प्रेरित किया,यह एक फुल ब्लोन ट्रायल से ही बाहर निकल कर आएगा।''

इसी के तहत कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

केस टाइटल- निरंजन हेगड़े बनाम कर्नाटक राज्य

केस नंबर- आपराधिक याचिका संख्या 5657/2022

साइटेशन- 2022 लाइव लॉ (केएआर) 261

आदेश की तारीख- 08 जुलाई, 2022

प्रतिनिधित्व- याचिकाकर्ता के लिए एडवोकेट अरुण गोविंदराज; एचसीजीपी के एस अभिजीत, आर-1 के लिए; एडवोकेट एम आर सी मनोहर, आर-2 के लिए

आदेश पढ़ने/डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



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