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"चाहते हैं कि बेटियां सुरक्षित रहें, एसिड फेंकने का विचार कहां से आता है?": गुजरात हाईकोर्ट ने सजा पर रोक लगाने से इनकार किया

LiveLaw News Network
28 July 2021 5:28 AM GMT
चाहते हैं कि बेटियां सुरक्षित रहें, एसिड फेंकने का विचार कहां से आता है?: गुजरात हाईकोर्ट ने सजा पर रोक लगाने से इनकार किया
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गुजरात हाईकोर्ट ने सोमवार को भारतीय दंड संहिता की धारा 326ए के तहत दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की सजा को निलंबित करने से इनकार करते हुए कहा कि अदालत चाहती है कि बेटियां सुरक्षित रहें। इसके साथ ही अदालत ने सवाल किया कि तेजाब फेंकने का विचार कहां से आता है?

न्यायमूर्ति परेश उपाध्याय की खंडपीठ 19 वर्षीय लड़की पर तेजाब फेंकने के दोषी व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसने दोषी के शादी के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था।

आवेदक को विशेष न्यायाधीश, सिटी सिविल एंड सेशन कोर्ट, अहमदाबाद ने भारतीय दंड संहिता की धारा 326 (ए) के तहत दोषी ठहराते हुए दस साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई है।

2015 से जेल में बंद दोषी की सजा को निलंबित करने से इनकार करते हुए बेंच ने मौखिक रूप से कहा:

"हम चाहते हैं कि हमारी बेटियां सुरक्षित रहें...बेटियां सड़क पर सुरक्षित नहीं हैं.. एसिड फेंकने का विचार कहां से आता है?"

आईपीसी की धारा 326ए में कहा गया है:

"जो कोई व्यक्ति के शरीर के किसी अंग को स्थायी या आंशिक क्षति या विकृति करता है, या जला देता है या अपंग या विकृत या अक्षम कर देता है या उस व्यक्ति पर तेजाब फेंक कर या उस पर तेजाब डालकर या किसी का उपयोग करके गंभीर चोट पहुंचाता है, इस जानकारी के साथ कि उसे ऐसी चोट या चोट लगने की संभावना है, को कम से कम दस वर्ष की अवधि के कारावास से दंडित किया जाएगा। इस सजा को आजीवन कारावास तक भी बढ़ाया जा सकता है।"

हाल ही में कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा था कि,

"एसिड अटैक बुनियादी मानवाधिकारों के खिलाफ अपराध है और भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत सबसे मौलिक अधिकारों का भी उल्लंघन है।"

न्यायमूर्ति बी वीरप्पा और न्यायमूर्ति वी श्रीशानंद की खंडपीठ ने भारतीय दंड संहिता की धारा 326 (ए) के तहत लगाए गए आजीवन कारावास की सजा की पुष्टि करते हुए महेशा (32) को एकतरफा प्रेमी कहते हुए कहा:

"पीडब्ल्यू.8 (पीड़ित) पर आरोपी द्वारा कथित तेजाब हमला केवल इस आधार पर किया गया कि उसने उससे शादी करने से इनकार कर दिया क्योंकि उसके माता-पिता ने सहमति नहीं दे रहे थे। आरोपी पीड़िता को गुलाम नहीं मान सकता और उसके चेहरे और शरीर पर तेजाब नहीं डाल सकता है। आरोपी की क्रूरता ने इस न्यायालय की चेतना को झकझोर कर रख दिया है।"

केस का शीर्षक - जयेशकुमार बुधभाई जाला बनाम गुजरात राज्य

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