RTI Act के तहत छात्र द्वारा मांगी गई आंसर स्क्रिप्ट के लिए यूनिवर्सिटी कोई इंटरनल फ़ीस नहीं ले सकती: CIC

Shahadat

1 Sept 2026 3:57 PM IST

  • RTI Act के तहत छात्र द्वारा मांगी गई आंसर स्क्रिप्ट के लिए यूनिवर्सिटी कोई इंटरनल फ़ीस नहीं ले सकती: CIC

    सेंट्रल इन्फॉर्मेशन कमीशन (CIC) ने कहा कि जब कोई छात्र सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act), 2005 के तहत जानकारी मांगता है तो यूनिवर्सिटी उसे आंसर स्क्रिप्ट की कॉपी देने के लिए कोई इंटरनल फ़ीस नहीं लगा सकती।

    इन्फॉर्मेशन कमिश्नर सुधा रानी रेलंगी, असम यूनिवर्सिटी से जुड़े पत्थरकांडी कॉलेज के एक छात्र की अपील पर सुनवाई कर रही थीं।

    छात्र ने 21 नवंबर, 2025 को RTI Act के तहत यूनिवर्सिटी से संपर्क किया और फ़िलॉसफ़ी पेपर की अपनी जांची हुई आंसर स्क्रिप्ट की फ़ोटोकॉपी मांगी। उसे 70 में से 35 अंक मिले थे और वह मूल्यांकन की जांच करने के लिए स्क्रिप्ट देखना चाहता था।

    जवाब में यूनिवर्सिटी के CPIO ने अतिरिक्त ₹1,000 की मांग की और कहा कि RTI अनुरोध को प्रोसेस करने के लिए यह पेमेंट ज़रूरी है। बाद में, फ़र्स्ट अपीलेट अथॉरिटी ने इस मांग को सही ठहराया और कहा कि असम यूनिवर्सिटी एक ऑटोनॉमस बॉडी (स्वायत्त संस्था) है और उसने हर आंसर स्क्रिप्ट के लिए ₹1,000 का शुल्क तय किया।

    अपीलकर्ता ने CIC के सामने इस आदेश को चुनौती दी और तर्क दिया कि यूनिवर्सिटी RTI Act के तहत एक पब्लिक अथॉरिटी है, इसलिए वह RTI नियमों के तहत तय फ़ीस स्ट्रक्चर का पालन करने के लिए बाध्य है। यह कहा गया कि लागू नियम एक्ट के तहत दी जाने वाली जानकारी के लिए प्रति पेज ₹2 का शुल्क लेने की अनुमति देते हैं और किसी पब्लिक अथॉरिटी को आंसर स्क्रिप्ट के लिए ₹1,000 की तय इंस्टिट्यूशनल फ़ीस लगाने का अधिकार नहीं देते हैं।

    अपीलकर्ता ने RTI Act की धारा 22 का भी हवाला दिया, जो एक्ट को असंगत कानूनों, नियमों या इंस्ट्रूमेंट्स पर प्राथमिकता देती है।

    RTI Act के फ़्रेमवर्क के तहत जांची हुई आंसर बुक तक पहुंच के संबंध में CBSE बनाम आदित्य बंदोपाध्याय और अन्य [सिविल अपील नंबर 6454/2011] और ICSI बनाम पारस जैन [सिविल अपील नंबर 5665/2014] में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों का भी हवाला दिया गया।

    CPIO ने कहा कि ₹1,000 की फ़ीस असम यूनिवर्सिटी के 18 जून, 2023 के नोटिफ़िकेशन के तहत ली जा रही थी। यह भी कहा गया कि यूनिवर्सिटी एक ऑटोनॉमस बॉडी है, जो अपने नियम खुद बना सकती है। यह भी बताया गया कि अपीलकर्ता ने पहले भी ऐसी ही जानकारी मांगी थी और तय फीस का भुगतान किया।

    CIC अपीलकर्ता की बात से सहमत हुआ और कहा कि जब RTI Act, 2005 के तहत जानकारी मांगी गई हो तो CPIO द्वारा अपीलकर्ता की जांची गई उत्तर पुस्तिकाओं (evaluated answer scripts) के लिए 1,000 रुपये की अतिरिक्त फीस मांगना RTI Act के नियमों के दायरे में नहीं आता।

    आयोग ने कहा,

    "RTI Act, 2005 के तहत जानकारी देने या दस्तावेजों की कॉपी देने के लिए ऐसी किसी अन्य नियम या कानून का सहारा लेना जायज़ नहीं है, जो RTI Act, 2005 और उसके तहत बने नियमों के प्रावधानों के खिलाफ हो।"

    आयोग ने गौर किया कि RTI Act की धारा 22 एक 'नॉन-ऑब्सटेंट' (non-obstante) प्रावधान के तौर पर काम करती है, यानी जब अन्य नियम या उप-नियम एक्ट के प्रावधानों के खिलाफ हों, तो यह धारा प्रभावी होती है।

    CIC ने ICSI बनाम पारस जैन मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कोर्ट ने कहा कि उत्तर पुस्तिकाएं हासिल करने के लिए संस्थागत तरीके और RTI Act का रास्ता एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं और एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। इसलिए जो उम्मीदवार RTI Act के तहत जानकारी लेना चुनता है, उसे RTI नियमों के अनुसार ही शुल्क देना होगा।

    इस प्रकार, CIC ने माना कि CPIO RTI Act, 2012 के नियमों के तहत तय केवल फोटोकॉपी शुल्क लेकर RTI Act के तहत मांगी गई उत्तर पुस्तिका उपलब्ध कराने के लिए बाध्य था।

    CIC ने यूनिवर्सिटी के फैसले को रद्द कर दिया और CPIO को आदेश दिया कि वह आदेश मिलने के दो हफ़्ते के भीतर अपीलकर्ता की जांची गई उत्तर पुस्तिका बिना किसी शुल्क के उपलब्ध कराए और आयोग को इसकी उचित सूचना दे।

    इसी के साथ अपील का निपटारा किया गया।

    Case Title: Ahmed Shakir v The CPIO and Ors.

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