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मंदिर की जमीन मंद‌िरों के पास रहे; सार्वज‌निक उद्देश्य के सिद्धांत को मंदिरों की जमीन के लिए उपयोग न किया जाएः मद्रास हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
9 Jun 2021 9:52 AM GMT
God Does Not Recognize Any Community, Temple Shall Not Be A Place For Perpetuating Communal Separation Leading To Discrimination
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सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए, मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु राज्य को 75 निर्देशों का एक सेट जारी किया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि राज्य में प्राचीन मंदिरों और प्राचीन स्मारकों का रखरखाव उचित ढंग से हो।

224 पन्नों के फैसले में जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस पीडी ऑदिकेसवालु की खंडपीठ ने कहा, "... भव्य और प्राचीन मंदिरों और प्राचीन स्मारकों के संरक्षक कम परेशान हैं और हमारी मूल्यवान विरासत किसी प्राकृतिक आपदा या विपदा के कारण नहीं बल्कि जीर्णोद्धार की आड़ में लापरवाह प्रशासन और रखरखाव के कारण बिगड़ रहा है।"

कोर्ट ने प्राचीन मंदिरों और मूर्तियों के रखरखाव के लिए पर्याप्त कार्य नहीं करने के लिए HR&CE और पुरातत्व विभागों की आलोचना की।

कोर्ट ने कहा, "यह आश्चर्यजनक है कि प्रमुख मंदिरों की आय के बावजूद HR&CE विभाग ऐतिहासिक मंदिरों और मूर्तियों के संरक्षण में सक्षम नहीं है, जिनकी बाजार में उनकी उम्र के कारण एंटीक वैल्यू हैं। राज्य के कुछ मंदिरों को यूनेस्को द्वारा विरासत स्थल के रूप में भी मान्यता प्राप्त है। यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त कई मंदिर म 2000 साल या उससे भी बहुत पहले निर्मित है और वे खंडहर हो चुके हैं। न तो पुरातत्व विभाग और न ही HR&CE विभाग ने उनकी पहचान करने और उनकी रक्षा करने में रुचि दिखाई है..।"

न्यायालय ने इस संबंधमें विस्तृत निर्देश पारित किए, जिससे हिंदू र‌ीलिजियर एंड कल्चरल एंडाउमेंट एक्ट (HR&CE एक्ट) के तहत मंदिरों के प्रशासन में व्यापक सुधार हो सके।

मंदिर की जमीन हमेशा मंदिरों के पास ही रहे

न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि मंदिर की भूमि हमेशा मंदिरों के पास ही रहनी चाहिए और राज्य सरकार या HR&CE विभाग को दानदाताओं की इच्छा के विपरीत ऐसी भूमि को अलग नहीं करना चाहिए या देना नहीं चाहिए।

न्यायालय ने यह भी कहा कि अधिग्रहण के लिए मंदिर की भूमि पर 'सार्वजनिक उद्देश्य सिद्धांत' को लागू नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि समुदाय के हित आम तौर पर ऐसी भूमि के सा‌थ शामिल होते हैं।

"राज्य सरकार या HR&CE विभाग के आयुक्त, जो मंदिर की भूमि के ट्रस्टी/प्रशासक हैं, दानकर्ता की इच्छा के विपरीत भूमि को अलग नहीं करेंगे या नहीं देंगे। भूमि हमेशा मंदिरों के पास रहेगी। सार्वजनिक उद्देश्य के सिद्धांत को मंदिर की भूमि के मामलों में लागू नहीं किया जाएगा, जिस पर आमतौर पर धार्मिक संप्रदाय के समुदाय के लोगों का हित होता है।"

अदालत ने अधिकारियों को मंदिर की जमीन पर लीजहोल्ड और अतिक्रमण का जायजा लेने और बकाया किराया वसूली, बकाएदारों और अतिक्रमणकारियों को बेदखल करने के लिए तत्काल कदम उठाने का भी निर्देश दिया।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि बकाया राशि और बकाएदारों की सूची छह सप्ताह की अवधि के भीतर तैयार की जानी चाहिए और इसे वेबसाइट पर प्रकाशित किया जाना चाहिए।

HR&CEअधिनियम और उसके तहत नियमों के प्रावधानों के अनुसार उन्हें बेदखल करने और बकाया की वसूली के लिए उचित कदम उठाए जाने चाहिए।

संरक्षित क्षेत्र, पुरातात्विक स्थलों, मंदिर की भूमि आदि से अतिक्रमण और अवैध निर्माण को तत्काल हटाया जाए।

संरक्षित एवं विनियमित क्षेत्र से अतिक्रमण नहीं हटाने वाले केंद्रीय व राज्य विभाग के भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों और HR&CE विभाग के अधिकारियों के विरुद्ध आठ सप्ताह की अवधि के भीतर उचित कार्रवाई की जानी चाहिए। .

मंदिर के धन का उपयोग सबसे पहले उन मंदिरों के लिए किया जाना चाहिए। अलग-अलग मंदिरों की निधि का उपयोग सबसे पहले उन मंदिरों के रख-रखाव के लिए किया जाना चाहिए।

"मंदिरों की निधि का उपयोग पहले मंदिरों के रखरखाव, मंदिर उत्सवों के आयोजन, अर्चकों, ओडुवरों, संगीतकारों, लोकगीतों और नाटक कलाकारों सहित कर्मचारियों को भुगतान के लिए किया जाएगा।"

कोर्ट ने HR&CE विभाग को मंदिर की संपत्ति के उचित ऑडिट के लिए भी निर्देश दिए।

HR&CE एक्ट के तहत विशेष न्यायाधिकरण

अदालत ने HR&CE एक्ट के तहत एक विशेष न्यायाधिकरण के गठन का निर्देश दिया, जो विशेष रूप से मंदिर से संबंधित मामलों जैसे कि धार्मिक मामलों, संस्कृति, परंपरा, विरासत, लंबि‌त किराये के इनाम और वसूली, लंबित किराया, पट्टे की वैधता, अवैध अतिक्रमण और अन्य मंदिर और मठ भूमि के मुद्दे से से संबंधित मामलों से निपटता हो।

HR&CE एक्ट की समीक्षा के लिए समिति का गठन

पीठ ने आगे निर्देश दिया कि आवश्यक संशोधन करने के लिए तीन साल में एक बार HR&CE एक्ट की समीक्षा के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया जाना चाहिए।

विरासत आयोग का गठन

पीठ ने निर्देश दिया कि राज्य को दो महीने के भीतर 17 सदस्यीय विरासत आयोग का गठन करना चाहिए, और कहा कि केंद्रीय अधिनियम या राज्य अधिनियम के तहत अधिसूचित किसी भी स्मारक, मंदिर, मूर्ति, मूर्तिकला की कोई संरचनात्मक परिवर्तन या मरम्मत आयोग की मंजूरी के बिना नहीं होनी चाहिए।

8 जनवरी, 2015 को द हिंदू में प्रकाशित एक पाठक के पत्र, जिसका श‌ीर्षक 'द साइलेंट बर‌ियल' था, के आधार पर स्वतः संज्ञान लेकर दायर जनहित याचिका पर आदेश पारित किया गया। स्वत: संज्ञान मामले की शुरुआत तत्कालीन चीफ जस्टिस संजय किशन कौल (अब सुप्रीम कोर्ट के जज) द्वारा की गई थी। पीठ ने अन्य जनहित याचिकाओं पर भी विचार किया, जो स्वत: संज्ञान लेने के बाद दायर की गई थीं।

आदेश पढ़ने/डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



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