जमानत याचिकाओं पर फैसले में देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट की चिंता, सभी हाईकोर्ट से लंबित मामलों का ब्योरा तलब

Praveen Mishra

4 Feb 2026 4:31 PM IST

  • जमानत याचिकाओं पर फैसले में देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट की चिंता, सभी हाईकोर्ट से लंबित मामलों का ब्योरा तलब

    जमानत याचिकाओं के लंबे समय से लंबित रहने पर गंभीर चिंता जताते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सभी उच्च न्यायालयों से रिपोर्ट तलब की है।

    चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की खंडपीठ ने यह निर्देश उस याचिका की सुनवाई के दौरान दिया, जिसमें पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में एक जमानत याचिका के लगातार स्थगन का मुद्दा उठाया गया था।

    सुप्रीम कोर्ट ने सभी उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया है कि वे 1 जनवरी 2025 के बाद दायर सभी जमानत याचिकाओं—चाहे नियमित जमानत हो या अग्रिम जमानत—का विवरण प्रस्तुत करें। इसमें याचिका दाखिल करने की तारीख, निस्तारण की तारीख (यदि हो चुकी हो) या अगली सुनवाई की तारीख शामिल होगी।

    इसके अलावा, यदि जनवरी 2025 से पहले दायर जमानत याचिकाएँ लंबित हैं, तो उनका विवरण भी दिया जाना है। साथ ही, सजा निलंबन से संबंधित लंबित याचिकाओं का ब्योरा भी रिपोर्ट में शामिल करने का निर्देश दिया गया है।

    खंडपीठ ने कहा कि जमानत याचिकाओं के निस्तारण में देरी कई उच्च न्यायालयों में एक बार-बार सामने आने वाली समस्या बन चुकी है। अदालत ने विशेष रूप से यह टिप्पणी की कि पटना हाईकोर्ट में जमानत मामलों की तत्काल सूचीकरण (अर्जेंट लिस्टिंग) तक नहीं होती, जिसके कारण याचिकाकर्ताओं को जमानत आवेदन की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ता है।

    अदालत ने कहा,

    “हमें यह देखकर अत्यंत निराशा हो रही है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ी प्रार्थनाओं पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। डॉकेट भले ही भारी हों और अन्य मामलों पर विचार आवश्यक हो, लेकिन जमानत से अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं हो सकता।”

    खंडपीठ ने यह भी नोट किया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले दिए गए अनेक निर्देशों के बावजूद स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष अन्ना वामन भालेराव बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालयों से जमानत याचिकाओं का दो माह के भीतर निस्तारण सुनिश्चित करने को कहा था।

    हालाँकि, अदालत ने यह भी स्वीकार किया कि मामलों की सूचीकरण व्यवस्था उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का विशेषाधिकार है, क्योंकि वे मास्टर ऑफ रोस्टर होते हैं। फिर भी, पीठ ने कहा कि मौजूदा गंभीर स्थिति को देखते हुए कुछ अनिवार्य दिशानिर्देश आवश्यक हो गए हैं।

    अदालत ने कहा,

    “हमें यह ज्ञात है कि सूचीकरण मुख्य न्यायाधीशों का विशेषाधिकार है। लेकिन लोग जेलों में पड़े हैं, उनकी जमानत याचिकाओं पर सुनवाई नहीं हो रही और उन्हें यह तक पता नहीं कि उनकी याचिका का भविष्य क्या होगा। ऐसे में इस अदालत का कर्तव्य है कि वह कुछ अनिवार्य दिशानिर्देश जारी करे।”

    हालाँकि, ऐसे निर्देश जारी करने से पहले, सुप्रीम कोर्ट ने सभी उच्च न्यायालयों से जमानत मामलों की लंबित स्थिति पर विस्तृत जानकारी मंगाने का निर्णय लिया।

    इसके साथ ही, पीठ ने सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से आग्रह किया कि वे अपने रोस्टर की पुनर्समीक्षा करें और जहाँ लंबित मामलों और उपलब्ध पीठों के बीच असंतुलन दिखे, वहाँ जमानत मामलों की सुनवाई के लिए अतिरिक्त पीठों का गठन किया जाए।

    अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि राज्य एजेंसियाँ जमानत याचिकाओं के शीघ्र निस्तारण में अदालतों के साथ सहयोग करें। जाँच अधिकारी (IO) भी आवश्यकता पड़ने पर ऑनलाइन माध्यम से अदालत की सहायता कर सकते हैं, ताकि जमानत याचिकाओं का त्वरित निपटारा सुनिश्चित किया जा सके।

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