जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा, लोकसभा जांच समिति के गठन को दी है चुनौती
Praveen Mishra
8 Jan 2026 2:51 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने 8 जनवरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा द्वारा दायर उस रिट याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया, जिसमें उन्होंने Judges (Inquiry) Act, 1968 के तहत उनके खिलाफ लाए गए महाभियोग प्रस्ताव के संबंध में लोकसभा अध्यक्ष द्वारा जांच समिति के गठन को चुनौती दी।
इस मामले की सुनवाई जस्टिस दिपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने की।
एक दिन पहले, अदालत ने मौखिक रूप से कहा था कि जांच समिति के गठन में “कुछ खामी” प्रतीत होती है और यह विचार किया जाएगा कि क्या यह खामी इतनी गंभीर है कि पूरी कार्यवाही को समाप्त किया जाए। इससे पहले 16 दिसंबर 2025 को कोर्ट ने लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय को नोटिस जारी किया था।
याचिका का मुख्य मुद्दा
याचिका में तर्क दिया गया कि 21 जुलाई को लोकसभा और राज्यसभा—दोनों में एक ही दिन महाभियोग प्रस्ताव पेश किए गए थे, इसके बावजूद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने राज्यसभा अध्यक्ष द्वारा प्रस्ताव की स्वीकृति पर निर्णय का इंतजार किए बिना और कानूनन आवश्यक संयुक्त परामर्श किए बिना, एकतरफा जांच समिति का गठन कर दिया। यह प्रक्रिया Judges (Inquiry) Act, 1968 की धारा 3(2) और उसके प्रावधान के विपरीत बताई गई।
धारा 3(2) के प्रावधान के अनुसार, यदि दोनों सदनों में एक ही दिन प्रस्तावों की सूचना दी जाए, तो समिति तभी गठित की जा सकती है जब दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकार हो; और तब समिति का गठन लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा अध्यक्ष संयुक्त रूप से करेंगे।
उपसभापति की भूमिका पर विवाद
सुनवाई के दौरान बताया गया कि 11 अगस्त को राज्यसभा के उपसभापति ने महाभियोग प्रस्ताव खारिज किया और इसके अगले दिन 12 अगस्त को लोकसभा अध्यक्ष ने जांच समिति का गठन किया। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि उपसभापति को प्रस्ताव खारिज करने का अधिकार नहीं था, इसलिए उस आधार पर लोकसभा अध्यक्ष द्वारा समिति का एकतरफा गठन अवैध है।
एक अन्य प्रश्न यह भी उठा कि क्या तत्कालीन राज्यसभा अध्यक्ष जगदीप धनखड़ ने प्रस्ताव मिलने के पहले ही दिन उसे स्वीकार कर लिया था। यदि ऐसा था, तो बाद में उपसभापति द्वारा प्रस्ताव खारिज नहीं किया जा सकता था; और ऐसी स्थिति में समिति का गठन संयुक्त रूप से होना चाहिए था।
आज की सुनवाई
आज याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने दलील दी कि संविधान का अनुच्छेद 124 महाभियोग कार्यवाही के संदर्भ में पूर्ण कोड है। अनुच्छेद 91 के आधार पर उपसभापति को वह विवेकाधीन अधिकार नहीं मिल सकता, जो Judges (Inquiry) Act के तहत विशेष रूप से अध्यक्ष को दिए गए हैं।
सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने भी यह तर्क दोहराया कि मामला नए अध्यक्ष की नियुक्ति तक प्रतीक्षा कर सकता था। हालांकि, खंडपीठ ने इस तर्क पर अपनी शंका—जो पहले भी व्यक्त की गई थी—दोहराई। न्यायमूर्ति दत्ता ने पूछा कि यदि उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के अभाव में उनके कार्य कर सकते हैं, तो उपसभापति अध्यक्ष के अभाव में उनके कार्य क्यों नहीं कर सकते। रोहतगी ने जवाब दिया कि संविधान में ऐसी स्पष्ट अनुमति है, जबकि Judges (Inquiry) Act में उपसभापति को ऐसा अधिकार नहीं दिया गया है।
रोहतगी ने यह भी वैकल्पिक तर्क रखा कि जब एक सदन ने उसी सामग्री के आधार पर प्रस्ताव खारिज कर दिया, तो दूसरा सदन जांच आगे नहीं बढ़ा सकता। पीठ ने इसे अधिनियम को “अव्यावहारिक” बनाने वाला तर्क बताते हुए कहा कि इससे दुरुपयोग का रास्ता खुल जाएगा।
खंडपीठ ने यह भी पूछा कि समिति के गठन से याचिकाकर्ता को क्या ठोस पूर्वाग्रह हुआ। रोहतगी ने कहा कि प्रक्रिया का स्पष्ट उल्लंघन ही पूर्वाग्रह है, क्योंकि कानून का उद्देश्य न्यायाधीशों को तुच्छ महाभियोग कार्यवाहियों से बचाना है।
लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय का पक्ष
लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि धारा 3(2) का उद्देश्य दो अलग-अलग जांच समितियों के गठन से बचना है। उन्होंने दलील दी कि क़ानून की मंशा यह है कि एक ही प्रस्ताव लंबित रहे और परस्पर विरोधी निष्कर्ष न निकलें। उनके अनुसार, याचिकाकर्ता को कोई प्रदर्शनीय पूर्वाग्रह नहीं हुआ है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 14 मार्च को न्यायमूर्ति वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास के एक हिस्से में आग बुझाने के दौरान बड़ी मात्रा में नकदी मिलने से जुड़ा है। इसके बाद तत्कालीन सीजेआई संजय खन्ना ने तीन न्यायाधीशों की इन-हाउस जांच समिति गठित की। समिति की रिपोर्ट में प्रथमदृष्टया दोष पाए जाने पर मामला आगे की कार्रवाई के लिए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजा गया। न्यायमूर्ति वर्मा को इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया गया और जांच लंबित रहने तक उनका न्यायिक कार्य वापस ले लिया गया।
सुप्रीम कोर्ट पहले ही इन-हाउस जांच और सीजेआई की सिफारिश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर चुका है।
सुप्रीम कोर्ट अब यह तय करेगा कि जांच समिति के गठन में पाई गई कथित खामी इतनी गंभीर है या नहीं कि अनुच्छेद 32 के तहत हस्तक्षेप किया जाए।

