जस्टिस यशवंत वर्मा जांच समिति के गठन में 'कुछ खामी' पाई गई, क्या यह इतनी गंभीर है — सुप्रीम कोर्ट करेगा विचार

Praveen Mishra

7 Jan 2026 4:04 PM IST

  • जस्टिस यशवंत वर्मा जांच समिति के गठन में कुछ खामी पाई गई, क्या यह इतनी गंभीर है — सुप्रीम कोर्ट करेगा विचार

    सुप्रीम कोर्ट ने आज यह मौखिक टिप्पणी की कि लोकसभा अध्यक्ष द्वारा जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ जांच के लिए गठित की गई समिति के गठन में “कुछ खामी” (infirmity) दिखाई देती है, और अदालत इस बात पर विचार करेगी कि क्या यह खामी इतनी गंभीर है कि संपूर्ण कार्यवाही को ही समाप्त करना पड़े। मामला कल तक के लिए स्थगित कर दिया गया।

    जस्टिस दिपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ, इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा द्वारा दायर उस रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने Judges (Inquiry) Act, 1968 के तहत गठित संसदीय जांच समिति की वैधता को चुनौती दी है। यह समिति उनके सरकारी आवास पर अघोषित नकदी की बरामदगी से जुड़े आरोपों की जांच कर रही है। 16 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय से जवाब मांगा था।

    याचिका में मुख्य तर्क

    याचिका में कहा गया है कि महाभियोग प्रस्ताव लोकसभा और राज्यसभा दोनों में एक ही दिन पेश किए गए थे, फिर भी लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने राज्यसभा अध्यक्ष की स्वीकृति का इंतजार किए बिना और कानूनन आवश्यक संयुक्त परामर्श किए बिना समिति का गठन कर दिया, जो कि धारा 3(2) और उसके प्रावधान का उल्लंघन है।

    सुनवाई के दौरान न्यायालय की चर्चा

    खंडपीठ ने इस बात की पड़ताल की कि क्या उस समय के राज्यसभा अध्यक्ष जगदीप धनखड़ ने पहले दिन ही प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया था। यदि ऐसा था, तो बाद में उपसभापति द्वारा प्रस्ताव को खारिज किए जाने का प्रश्न नहीं उठता, और साथ ही लोकसभा अध्यक्ष एकतरफ़ा समिति गठित नहीं कर सकते थे।

    जस्टिस दत्ता ने कहा—

    “यदि राज्यसभा ने भी प्रस्ताव स्वीकार किया होता, तो उन्हें संयुक्त समिति का लाभ मिलता… लेकिन क्या यह इतनी गंभीर पूर्वाग्रह की स्थिति है कि हमें अनुच्छेद 32 के तहत दख़ल देना पड़े?”

    याचिकाकर्ता का पक्ष — सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी

    सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने तर्क दिया कि जब दोनों सदनों में प्रस्ताव एक साथ पेश हों, तो समिति केवल संयुक्त रूप से ही बन सकती है। उन्होंने कहा कि उपसभापति द्वारा बाद में अस्वीकृति के बावजूद समिति गठित नहीं की जा सकती थी।

    उन्होंने यह भी दलील दी कि राज्यसभा के उपसभापति को प्रस्ताव अस्वीकार करने का अधिकार नहीं था, क्योंकि यह चेयरमैन का विवेकाधिकार है।

    खंडपीठ ने इस व्याख्या से असहमति जताते हुए कहा कि चेयरमैन के इस्तीफे के बाद उपसभापति पद के कर्तव्यों का निर्वहन कर सकते हैं।

    रोहतगी ने यह भी कहा कि पूर्व चेयरमैन जगदीप धनखड़ द्वारा प्रस्ताव प्राप्त होने की बात कहना ही “निहित स्वीकृति” (implied admission) है।

    अदालत का अंतरिम दृष्टिकोण

    खंडपीठ ने कहा कि वह फिलहाल—

    धारा 3(2) की व्याख्या, तथा

    उपसभापति की अधिकार-क्षमता—

    से संबंधित तर्कों से सहमत नहीं है,

    लेकिन इस प्रश्न पर विचार करेगी कि क्या राज्यसभा द्वारा प्रस्ताव की स्वीकृति हुई थी, और यदि हाँ, तो क्या संयुक्त समिति से वंचित होना गंभीर पूर्वाग्रह माना जा सकता है।

    मामले की पृष्ठभूमि

    मार्च 14 को जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित आवास परिसर में आग बुझाने के दौरान बड़ी मात्रा में नकदी बरामद हुई थी। इसके बाद तत्कालीन सीजेआई संजय खन्ना ने इन-हाउस जांच समिति गठित की। रिपोर्ट में prima facie संलिप्तता दर्ज होने पर मामला राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजा गया। जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया गया और उनका न्यायिक कार्य वापस ले लिया गया। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने इन-हाउस जांच को चुनौती देने वाली याचिका भी खारिज कर दी थी।

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