गाजियाबाद में 4 वकीलों पर हमले का मामला: सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस से स्टेटस रिपोर्ट मांगी, याचिकाकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश

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    सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद में चार वकीलों, जिनमें एक महिला वकील भी शामिल हैं, पर कथित हमले और इस मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस की निष्क्रियता के आरोपों पर राज्य पुलिस से स्टेटस रिपोर्ट मांगी है।

    चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं की जान-माल को कोई नुकसान न पहुंचे।

    कोर्ट ने यह आदेश कथित घटना का CCTV फुटेज देखने के बाद दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने अदालत को यह फुटेज उपलब्ध कराया था। उन्होंने दावा किया कि पुलिस ने अब तक इस फुटेज को जब्त नहीं किया था।

    महिला वकील के साथ मारपीट और गला दबाने का आरोप

    सुनवाई के दौरान विकास सिंह ने आरोप लगाया कि महिला वकील के साथ पुरुषों के एक समूह ने बेरहमी से मारपीट की और उनका गला दबाने की कोशिश की। उन्होंने दावा किया कि चारों वकीलों ने हमलावरों पर एक भी वार नहीं किया, जबकि हमलावर बाहरी व्यक्ति थे और उन्होंने गैरकानूनी जमावड़ा बनाया था।

    सीनियर एडवोकेट ने यह भी बताया कि एक वकील की आंख के नीचे फ्रैक्चर हुआ है।

    उन्होंने कहा कि घटना के तीन दिन बाद पुलिस ने वकीलों के खिलाफ FIR दर्ज कर दी, लेकिन उनकी शिकायत के आधार पर कथित हमलावरों को गिरफ्तार नहीं किया गया। इस पर उन्होंने पुलिस की कार्रवाई को चौंकाने वाला बताया।

    जांच अधिकारी पर महिला वकील को परेशान करने का आरोप

    याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि मामले के जांच अधिकारी (IO) को बदल दिया गया, जबकि पीड़ितों ने ऐसी कोई मांग नहीं की थी।

    विकास सिंह ने दावा किया कि नए जांच अधिकारी ने महिला वकील के साथ बातचीत के दौरान आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं और उन्हें परेशान किया।

    उन्होंने अदालत को बताया कि जांच अधिकारी ने कथित तौर पर कहा, "तुम्हारे जैसे वकील बहुत देखे हैं।"

    इसके अलावा, महिला वकील के पेशे को लेकर भी कथित टिप्पणी की गई कि "आपका तो उम्र ही नहीं आया, वकील कहां से हो गए?"

    राज्य सरकार ने क्या दलील दी?

    राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने सीमित निर्देशों के आधार पर बताया कि FIR में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 74 जोड़ दी गई है और जांच अधिकारी को भी बदल दिया गया है।

    राज्य की ओर से यह भी बताया गया कि CCTV फुटेज सुरक्षित कर लिया गया है और प्रारंभिक मेडिकल रिपोर्ट प्राप्त हुई है, जिसमें चोटों को सामान्य (Simple) बताया गया है।

    हालांकि, विकास सिंह ने मेडिकल रिपोर्ट पर आपत्ति जताते हुए कहा कि एक वकील को फ्रैक्चर हुआ है। उन्होंने FIR में BNS की धारा 109 जोड़ने और वकीलों के खिलाफ दर्ज क्रॉस-FIR पर रोक लगाने की मांग की।

    इस पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने राज्य को विकास सिंह द्वारा प्रस्तुत मेडिकल रिपोर्ट की जांच करने और उचित कदम उठाने को कहा।

    जस्टिस बागची ने यह भी कहा कि क्रॉस-FIR में आरोपी बनाए गए व्यक्तियों को भी अपनी शिकायत की निष्पक्ष जांच का समान अधिकार है। इसलिए उन्हें सुने बिना क्रॉस-FIR पर रोक नहीं लगाई जा सकती।

    इसके बाद विकास सिंह ने कम से कम जांच अधिकारी को बदलने का अनुरोध किया।

    महिला वकील ने परिवार की सुरक्षा मांगी

    सुनवाई के दौरान चार याचिकाकर्ताओं में से एक महिला वकील ने व्यक्तिगत रूप से अदालत के समक्ष अपनी बात रखी।

    उन्होंने बताया कि आरोपियों ने उनके घर के सामने CCTV कैमरा लगा रखा है और लगातार उनका तथा उनके परिवार का पीछा किया जा रहा है।

    उन्होंने अपनी दो बेटियों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई और कहा कि उनकी बेटियां ट्यूशन सहित अन्य गतिविधियों के लिए घर से बाहर जाती हैं।

    क्या है पूरा मामला?

    यह याचिका चार वकीलों- ए. दीपा, उनके पति देब कुमार, विपिन शर्मा और अनूप गोयल ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की है।

    याचिका के अनुसार, कथित घटना 22 अक्टूबर को एक आवासीय परिसर में हुई थी। आरोप है कि अवैध निर्माण को लेकर चल रहे विवाद के संबंध में अमित वर्मा और उनके बेटे राहुल वर्मा कुछ अज्ञात लोगों के साथ वहां पहुंचे और चारों वकीलों तथा बीच-बचाव करने आए अन्य लोगों के साथ मारपीट की।

    याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि गंभीर चोटों के बावजूद पुलिस ने शुरुआत में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की अपेक्षाकृत हल्की धाराओं के तहत FIR दर्ज की।

    इसके बाद 25 अक्टूबर को वकीलों के खिलाफ क्रॉस-FIR भी दर्ज की गई और जांच अधिकारी को बदल दिया गया।

    याचिकाकर्ताओं ने निष्पक्ष जांच, CCTV फुटेज को सुरक्षित रखने और उसकी जांच कराने, उचित आपराधिक धाराएं जोड़ने तथा अपने और परिवार के सदस्यों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। उन्होंने जांच दिल्ली पुलिस को स्थानांतरित करने और अपने खिलाफ दर्ज क्रॉस-FIR रद्द करने की भी मांग की है।

    सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

    सभी पक्षों की दलीलें सुनने और CCTV फुटेज देखने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से मामले में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा।

    पीठ ने अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं की जान और संपत्ति को कोई नुकसान न पहुंचे।

    मामले में अब उत्तर प्रदेश पुलिस की स्टेटस रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्यवाही होगी।

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    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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