'चुनाव से ठीक पहले कैश ट्रांसफर स्कीम क्यों?' सुप्रीम कोर्ट ने 'फ्रीबीज़' कल्चर की आलोचना की
Praveen Mishra
19 Feb 2026 10:45 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा चुनावों से ठीक पहले 'फ्रीबी' (मुफ्त योजनाओं) की घोषणा करने की प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता व्यक्त की। अदालत ने कहा कि यह प्रवृत्ति देश के दीर्घकालिक आर्थिक विकास को प्रभावित कर सकती है और बिना किसी भेदभाव के लाभ बांटना “तुष्टीकरण” जैसा है, जो राष्ट्रहित में नहीं है।
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की खंडपीठ तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें बिजली संशोधन नियम, 2024 के नियम 23 को चुनौती दी गई है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राज्य द्वारा बिजली बिल अपने ऊपर लेने की नीति पर सवाल उठाए।
चीफ़ जस्टिस ने कहा कि यह समझा जा सकता है कि एक कल्याणकारी राज्य गरीब और वंचित लोगों को राहत देना चाहता है, लेकिन बिना यह अंतर किए कि कौन भुगतान करने में सक्षम है और कौन नहीं, सभी को मुफ्त सुविधाएँ देना उचित नहीं है। उन्होंने पूछा कि यदि सीधे नकद हस्तांतरण (Direct Cash Transfer) योजनाएँ चलती रहीं तो लोग काम क्यों करेंगे।
अदालत ने यह भी कहा कि हाल के चुनावों में देखा गया है कि चुनाव से ठीक पहले अचानक नई योजनाओं की घोषणा की जाती है। खंडपीठ ने टिप्पणी की कि राज्यों को अपनी आय विकास कार्यों — जैसे सड़क, अस्पताल और स्कूल — पर खर्च करनी चाहिए, न कि केवल मुफ्त वितरण पर।
चीफ़ जस्टिस ने कहा कि जो लोग सक्षम हैं, उनसे सेवाओं की लागत वसूल की जानी चाहिए। अदालत ने यह भी चिंता जताई कि कई राज्य घाटे में होने के बावजूद इस प्रकार की योजनाएँ चला रहे हैं और पूछा कि इसका धन आखिर आता कहाँ से है।
पीठ ने रोजगार सृजन पर जोर देते हुए कहा कि लोगों को काम के अवसर मिलने चाहिए ताकि वे सम्मानपूर्वक जीवनयापन कर सकें। यदि सुबह से मुफ्त भोजन, गैस, बिजली और नकद राशि मिलती रहेगी, तो लोग काम करना क्यों सीखेंगे — यह राष्ट्र निर्माण के लिए उचित नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे पर अन्य याचिकाएँ भी उसके समक्ष लंबित हैं। तमिलनाडु पावर कंपनी की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने मामले की जांच के लिए सहमति जताई और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया।

