पश्चिम बंगाल OBC सर्टिफिकेट विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया
Praveen Mishra
1 Oct 2026 3:14 PM IST

पश्चिम बंगाल में OBC प्रमाणपत्रों को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के 12 अगस्त 2026 के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया है। हाईकोर्ट ने 2025-26 के दौरान जारी किए गए कुछ OBC प्रमाणपत्रों को void ab initio (शुरू से ही अमान्य) घोषित किया था।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की खंडपीठ ने अंतरिम आदेश देते हुए कहा कि संबंधित भर्ती में होने वाली नियुक्तियां इस याचिका के अंतिम परिणाम के अधीन रहेंगी। कोर्ट ने निर्देश दिया कि नवनियुक्त उम्मीदवारों को जारी होने वाले appointment letters में भी यह स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाए।
पुलिस भर्ती में शामिल उम्मीदवारों ने दी चुनौती
याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट शादान फरासत पेश हुए। याचिकाकर्ता 2024 में पश्चिम बंगाल पुलिस कांस्टेबल भर्ती प्रक्रिया में शामिल हुए थे। संबंधित मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने भी दलीलें रखीं, जबकि पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए।
सुनवाई के दौरान फरासत ने अंतरिम अवधि में रिक्त पदों को खाली रखने का अनुरोध किया। हालांकि, खंडपीठ ने ऐसा करने से इनकार किया। जस्टिस बागची ने कहा कि राज्य में भर्ती प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता।
इसके बाद याचिकाकर्ताओं की ओर से आग्रह किया गया कि नियुक्तियां सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका के अंतिम परिणाम के अधीन रखी जाएं। कोर्ट ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए नियुक्ति पत्रों में इसका उल्लेख करने का निर्देश दिया।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि याचिका की सुनवाई इसी मुद्दे से जुड़ी अन्य याचिकाओं के साथ की जाएगी।
कलकत्ता हाईकोर्ट ने क्या कहा था?
याचिका में कलकत्ता हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच द्वारा 12 अगस्त 2026 को Shreyasi Dhang v. State of West Bengal मामले में दिए गए फैसले को चुनौती दी गई है।
हाईकोर्ट ने मई और जून 2025 में राज्य सरकार द्वारा OBC वर्गों की दोबारा की गई अधिसूचना को void ab initio घोषित किया था। कोर्ट ने कहा था कि 8 मई 2025 से 12 जून 2025 के बीच तथा 10 जून 2025 से 18 मई 2026 के बीच जारी किए गए संबंधित OBC प्रमाणपत्रों का कोई कानूनी प्रभाव नहीं होगा।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि 2010 से पहले मौजूद OBC वर्गों में शामिल और फैसले से संरक्षित व्यक्तियों को OBC प्रमाणपत्र के लिए नए सिरे से आवेदन करना होगा।
विवाद की शुरुआत 2024 के फैसले से
इस विवाद की पृष्ठभूमि में कलकत्ता हाईकोर्ट का 22 मई 2024 का फैसला है, जिसमें अदालत ने पश्चिम बंगाल की OBC सूची में कई समुदायों को शामिल किए जाने को चुनौती से जुड़ा फैसला सुनाते हुए नई प्रक्रिया/सर्वे की दिशा में कदम उठाने को कहा था।
इसके बाद राज्य सरकार ने मई-जून 2025 में कई OBC वर्गों को दोबारा सूची में शामिल किया। बाद में राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में लंबित अपनी चुनौती वापस ले ली। LiveLaw की रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य को OBC सूची से संबंधित हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपनी अपील वापस लेने की अनुमति दी थी।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में पश्चिम बंगाल के OBC आरक्षण से जुड़े एक अन्य मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट के उस निर्देश पर रोक लगाई थी, जिसमें WBJEE 2025 की मेरिट लिस्ट को पूर्व-2010 OBC आरक्षण व्यवस्था के अनुरूप दोबारा तैयार करने को कहा गया था। Live Law
याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलील क्या है?
पुलिस भर्ती में शामिल पांच याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने पूरी भर्ती प्रक्रिया में OBC-A या OBC-B उम्मीदवारों के रूप में हिस्सा लिया और उनके प्रमाणपत्र पूरी प्रक्रिया के दौरान स्वीकार किए गए।
उनका मुख्य तर्क है कि भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद आरक्षण की स्थिति को पूर्वव्यापी तरीके से नहीं बदला जा सकता।
याचिका के अनुसार, पुलिस भर्ती में कुल 11,749 पदों में से 1,998 पद OBC उम्मीदवारों के लिए आरक्षित थे, यानी 17% आरक्षण। इनमें 1,175 पद OBC-A और 823 पद OBC-B के लिए निर्धारित थे।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि भर्ती के लिए आवेदन की अंतिम तारीख 5 अप्रैल 2024 थी। उस समय उनके OBC प्रमाणपत्र वैध माने गए थे और इसी आधार पर उन्होंने आवेदन किया तथा भर्ती प्रक्रिया में आगे बढ़े।
उम्र में छूट का भी उठाया मुद्दा
याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि तीन उम्मीदवार ऐसे थे जो 1 जनवरी 2024 को सामान्य वर्ग के लिए निर्धारित अधिकतम आयु सीमा से ऊपर थे। वे OBC-A/OBC-B उम्मीदवारों को मिलने वाली तीन वर्ष की आयु छूट के कारण ही भर्ती के लिए पात्र बने थे।
ऐसे में यदि उन्हें बाद में सामान्य वर्ग का उम्मीदवार माना जाता है, तो उनके मामले में सिर्फ आरक्षण का लाभ कम नहीं होगा, बल्कि उनकी पूरी उम्मीदवारी ही प्रभावित हो सकती है।
भर्ती प्रक्रिया के बीच नियम बदलने का आरोप
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के फैसले Tej Prakash Pathak v. Rajasthan High Court का भी हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद पात्रता की शर्तों में बदलाव सामान्यतः नहीं किया जा सकता, जब तक संबंधित नियम या विज्ञापन इसकी अनुमति न देता हो।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जिस समय उन्होंने आवेदन किया था, उस समय जिस श्रेणी के तहत उनके आवेदन स्वीकार किए गए थे, उसी आधार पर उन्हें भर्ती प्रक्रिया में विचार किए जाने का अधिकार था।
बिना पक्षकार बनाए प्रमाणपत्र रद्द करने पर भी सवाल
याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया है कि वे Shreyasi Dhang मामले में पक्षकार नहीं थे। उनके अनुसार, एक व्यक्तिगत मेडिकल उम्मीदवार के OBC प्रमाणपत्र से जुड़े मामले में ऐसे व्यक्तियों के प्रमाणपत्रों को भी अमान्य नहीं किया जा सकता, जिन्हें उस मामले में सुनवाई का अवसर ही नहीं मिला।
अब सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले का प्रभाव इन याचिकाकर्ताओं और संबंधित भर्ती प्रक्रिया पर किस तरह पड़ेगा। फिलहाल कोर्ट ने नियुक्तियों पर रोक लगाने के बजाय उन्हें लंबित याचिका के अंतिम परिणाम के अधीन रखने का निर्देश दिया है।

