राहुल गांधी के खिलाफ BJP पदाधिकारी की मानहानि की शिकायत राजनीतिक मकसद से प्रेरित हो सकती है: सुल्तानपुर कोर्ट

  • राहुल गांधी के खिलाफ BJP पदाधिकारी की मानहानि की शिकायत राजनीतिक मकसद से प्रेरित हो सकती है: सुल्तानपुर कोर्ट

    साल 2018 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के तत्कालीन अध्यक्ष अमित शाह को "हत्या का आरोपी" बताने से जुड़े मानहानि के आपराधिक मामले में कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को बरी करते हुए सुल्तानपुर जिले की MP/MLA कोर्ट ने कहा कि यह शिकायत प्रथम दृष्टया 'संदिग्ध', 'अवास्तविक' और 'बिना किसी सबूत के' लगती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि हो सकता है कि यह शिकायत राजनीतिक या अन्य उद्देश्यों से दर्ज कराई गई हो।

    एडिशनल चीफ ज्युडिशियल मजिस्ट्रेट शुभम वर्मा ने यह भी पाया कि शिकायतकर्ता विजय मिश्रा BJP पदाधिकारी हैं। वह कानून की नजर में "पीड़ित व्यक्ति" नहीं हैं, जिनके कहने पर राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि की कार्यवाही चलाई जा सके।

    अपने 49 पन्नों के फैसले में कोर्ट ने कहा कि पूरी शिकायत को देखने पर ऐसा लगता है कि इसे केवल किसी तरह कार्यवाही शुरू कराने के मकसद से दायर किया गया, जो कि कानून के मूल उद्देश्य के खिलाफ है।

    कोर्ट ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा:

    "...जिस तरह से शिकायत में तथ्यों/घटनाओं का वर्णन किया गया, वह प्रथम दृष्टया संदिग्ध, अवास्तविक और बिना किसी सबूत के लगता है। इससे संकेत मिलता है कि यह शिकायत राजनीतिक या अन्य उद्देश्यों से किसी भी तरह से कार्यवाही शुरू कराने के लिए दर्ज कराई गई, जो कि पूरी तरह से कानून के उद्देश्य के विपरीत है।"

    कोर्ट ने शिकायतकर्ता के मामले और जिन परिस्थितियों में यह शिकायत दर्ज कराई गई, उनकी जांच करने के बाद ये टिप्पणियां कीं।

    मामले का संक्षिप्त विवरण

    BJP नेता विजय मिश्रा द्वारा 2018 में दायर इस मानहानि के मामले में राहुल गांधी पर बेंगलुरु में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अमित शाह के खिलाफ 'आपत्तिजनक' टिप्पणी करने का आरोप लगाया गया। आरोप के अनुसार, उन्होंने BJP के तत्कालीन अध्यक्ष अमित शाह को "हत्या का आरोपी" कहा था।

    शिकायतकर्ता का आरोप था कि 2018 में कर्नाटक चुनाव से पहले राजनीतिक रैली में राहुल गांधी ने BJP अध्यक्ष अमित शाह पर निशाना साधते हुए उन्हें हत्या का आरोपी बताया था। राहुल गांधी पर निम्नलिखित बयान देने का आरोप था।

    कहा गया,

    "भारत में लोग भूल जाते हैं कि BJP के अध्यक्ष हत्या के आरोपी हैं। यही सच है। जो पार्टी ईमानदारी और शालीनता की बात करती है, उसके अध्यक्ष पद पर एक ऐसा व्यक्ति है, जिस पर हत्या का आरोप है।"

    मिश्रा ने आरोप लगाया कि ये टिप्पणियां मानहानि करने वाली थीं। हालांकि, गांधी ने इन आरोपों को खारिज किया और कहा कि उनके बयान को संदर्भ से हटाकर पेश किया गया।

    गांधी का इशारा उस आरोप की ओर था, जिसके मुताबिक 2005 में सोहराबुद्दीन शेख (एक छोटे-मोटे अपराधी) की गैर-न्यायिक हत्या (एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग) में अमित शाह शामिल थे।

    सुल्तानपुर कोर्ट की टिप्पणी

    कोर्ट ने कहा कि उसके सामने आए तथ्य पहली नज़र में स्वाभाविक नहीं लगते। इसके दो संभावित कारण हो सकते हैं: या तो शिकायतकर्ता (BJP नेता मिश्रा) बहुत ज़्यादा संवेदनशील हैं, या फिर यह शिकायत राजनीतिक या किसी अन्य मकसद से दर्ज कराई गई।

    फैसले में कहा गया:

    "या तो शिकायतकर्ता का स्वभाव बहुत ज़्यादा संवेदनशील है, या फिर यह शिकायत राजनीतिक या किसी अन्य छिपे हुए मकसद से दर्ज कराई गई, जैसा कि दूसरी तरफ के वकील ने तर्क दिया।"

    कोर्ट ने आगे कहा कि यह निष्कर्ष शिकायतकर्ता और गवाहों के बयानों (मौखिक पूछताछ/जिरह) से और भी पुख्ता होता है। इससे पता चला कि शिकायतकर्ता ने इस मामले को लेकर मीडिया और टीवी चैनलों को इंटरव्यू दिए, जो पूरे देश में प्रसारित हुए। साथ ही यह मामला अखबारों में भी छपा था।

    इसके अलावा, कोर्ट ने इस बात पर भी विचार किया कि क्या गांधी की कथित टिप्पणियों से दूसरों की नज़र में मिश्रा की प्रतिष्ठा कम हुई।

    कोर्ट ने पाया कि यह आरोप मुख्य रूप से अमित शाह के खिलाफ था और ज़्यादा-से-ज़्यादा इसका कुछ संबंध BJP से हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि मिश्रा (शिकायतकर्ता) के खिलाफ व्यक्तिगत रूप से कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आरोप नहीं लगाया गया।

    भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 499 के चौथे स्पष्टीकरण का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि कोई आरोप किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को तभी नुकसान पहुंचाता है, जब वह दूसरों की नज़र में उस व्यक्ति के नैतिक या बौद्धिक चरित्र को कम कर दे।

    इस संबंध में अदालत ने गौर किया कि मिश्रा और शिकायत के समर्थन में पेश किए गए सभी गवाह BJP के सदस्य थे। शिकायतकर्ता ने समाज के किसी भी स्वतंत्र व्यक्ति को गवाह के तौर पर पेश नहीं किया, और न ही यह आरोप लगाया कि इन टिप्पणियों की वजह से ऐसे लोगों की नजर में उनकी प्रतिष्ठा कम हुई।

    अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि हालांकि शिकायत में आरोप लगाया गया कि पार्टी के एक सदस्य ने दूसरे सदस्य को गांधी की टिप्पणियों वाला वीडियो दिखाकर उसे अपमानित किया, लेकिन गवाह राम चंद्र दुबे और अनिल मिश्रा - जिन्होंने कथित तौर पर शिकायतकर्ता के साथ वह वीडियो देखा था - उन्होंने खुद के अपमानित महसूस करने का कोई दावा नहीं किया।

    अदालत ने कहा,

    "...इस बात का कोई सबूत नहीं है कि दूसरों की नजर में शिकायतकर्ता के नैतिक और बौद्धिक चरित्र को कोई ठेस पहुंची हो।"

    अदालत ने यह भी गौर किया कि शिकायतकर्ता और गवाह, सभी एक ही संगठन (BJP) के सदस्य हैं, इसलिए वे एक ही श्रेणी में आते हैं।

    अदालत ने इस दलील को भी खारिज किया कि मिश्रा केवल इसलिए शिकायत दर्ज कर सकते हैं, क्योंकि वह BJP के पदाधिकारी हैं। अदालत ने कहा कि BJP ने उन्हें अपनी ओर से शिकायत दर्ज करने के लिए अधिकृत नहीं किया, और न ही उन्होंने ऐसी किसी अधिकृति (Authorization) का दावा किया।

    अदालत ने कहा कि अगर इस दलील को मान लिया जाए तो इसका मतलब यह होगा कि BJP का हर पदाधिकारी और सदस्य इस कथित बयान को लेकर कानूनी कार्यवाही शुरू कर सकता है, जिससे 'अनगिनत' मामले दर्ज हो जाएंगे।

    अदालत ने कहा कि कानून के शासन वाले समाज में ऐसी कोई कानूनी स्थिति स्वीकार नहीं की जा सकती जो कई अलग-अलग कानूनी कार्यवाहियों को जन्म दे या उन्हें बढ़ावा दे।

    अदालत ने आगे कहा कि आपराधिक मानहानि के मामलों में ऐसा दृष्टिकोण बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है, खासकर दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 199 की आवश्यकताओं को देखते हुए।

    इसलिए अदालत ने माना कि मिश्रा केवल भाजपा के सदस्य या पदाधिकारी होने के नाते यह शिकायत नहीं कर सकते, खासकर तब जब कथित टिप्पणियां सीधे तौर पर उन पर नहीं की गई थीं।

    अपने निष्कर्षों के आधार पर अदालत ने गांधी को इस आरोप से बरी किया।

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