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अपरिहार्य मजबूरी के सामने 'आत्मसमर्पण करना' सहमति नहींः केरल हाईकोर्ट ने बलात्कार की सजा बरकरार रखी

LiveLaw News Network
20 Nov 2021 5:30 AM GMT
अपरिहार्य मजबूरी के सामने आत्मसमर्पण करना सहमति नहींः केरल हाईकोर्ट ने बलात्कार की सजा बरकरार रखी
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केरल हाईकोर्ट ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि संभोग के लिए 'सहमति' और 'सबमिशन(आत्मसमर्पण करनेे)' के बीच काफी अंतर है।

न्यायमूर्ति आर नारायण पिशारदी की पीठ ने आंशिक रूप से एक अपील को स्वीकार करते हुए कहा कि,

''केवल इस कारण से कि पीड़िता आरोपी से प्यार करती थी, यह नहीं माना जा सकता कि उसने संभोग के लिए सहमति दी थी।''

हाईकोर्ट निचली अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की तरफ से दायर अपील पर विचार कर रही थी। इस व्यक्ति को भारतीय दंड संहिता की धारा 366ए (नाबालिग लड़की की खरीद), 376 (बलात्कार) और पॉक्सो अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत शिकायतकर्ता का यौन उत्पीड़न करने के लिए दोषी ठहराया गया था।

पीड़िता ने मामले में गवाही दी और इंगित किया कि आरोपी ने उसकी सहमति के बिना पहली बार उसके साथ यौन संबंध बनाए थे। उसने कहा कि जब उसने उसकी मांग पर कपड़े उतारने से इनकार कर दिया तो आरोपी ने उसे जबरन उसके कपड़े उतार दिए और रोने पर उसका मुंह दबा लिया।

इस पर कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि,

''सहमति और सबमिशन के बीच काफी बड़ा अंतर है। प्रत्येक सहमति में एक सबमिशन शामिल होता है लेकिन हर सबमिशन में सहमति शामिल नहीं होती है। अपरिहार्य मजबूरी के सामने आत्समर्पण करने को सहमति नहीं माना जा सकता है जैसा कि कानून में समझा जाता है। सहमति के लिए कृत्य के महत्व और नैतिक प्रभाव के ज्ञान के आधार पर बुद्धि का प्रयोग आवश्यक है।''

तथ्यात्मक पृष्ठभूमिः

अभियोजन पक्ष का मामला यह है कि पीड़िता की उम्र 17 साल बताई जा रही है और वह उस समय आरोपी से प्यार करती थी। आरोपी उस बस में क्लीनर का काम करता था, जिससे वह अक्सर आती-जाती रहती थी।

वर्ष 2013 में, आरोपी ने उससे शादी करने का वादा करके उसे अपने साथ मैसूर ले जाने के लिए प्रेरित किया। उसने धमकी भी दी कि अगर वह उसके साथ नहीं गई तो वह उसके घर के सामने आत्महत्या कर लेगा।

तदनुसार, वे मैसूर के लिए रवाना हो गए और एक साथ एक लॉज में रहने लगे, जहां आरोपी ने लड़की के साथ बलात्कार किया। एक सप्ताह के बाद वे घर लौट आए।

पीड़िता की ओर से यह भी गवाही दी गई कि इस घटना के बाद वह आरोपी से संपर्क नहीं कर पाई।

इसी दौरान उसके पिता ने थाने में गुमशुदगी का मामला दर्ज कराया था। वापस लौटने पर, उसे पुलिस स्टेशन के सामने पेश किया गया जहां उसने खुलासा किया कि उसका यौन उत्पीड़न किया गया है।

जांच के बाद, तुरंत प्राथमिकी दर्ज की गई और आरोपी के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया गया। निचली अदालत ने उसे दोषी पाया और दस साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई।

इसलिए आरोपी ने अपील के साथ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अपीलकर्ता ने नाबालिग होने का दावा किया और कहा कि वह अपराध करने के समय नाबालिग था।

प्रासंगिक निष्कर्षः

किशोर होने की दलीलः

आरोपी द्वारा पेश किए गए स्कूल प्रवेश रजिस्टर को देखने पर, अदालत को यकीन हो गया कि घटना की तारीख को उसकी उम्र 17 साल थी और वह एक किशोर था।

जेजे अधिनियम की धारा 7ए(2) के अनुसार, यदि न्यायालय द्वारा अपराध करने की तिथि पर किसी व्यक्ति को किशोर पाया जाता है, तो वह किशोर न्याय बोर्ड को उचित आदेश पारित करने के लिए किशोर के मामले को अग्रेषित करेगा और अदालत द्वारा पारित सजा का कोई प्रभाव नहीं माना जाएगा।

हालांकि, कोर्ट ने कहा कि आरोपी को जेजे बोर्ड के पास भेजना या अग्रेषित करना जरूरी नहीं है क्योंकि जेजे एक्ट की धारा 15 के अनुसार, एक किशोर को अधिकतम सजा, तीन वर्षों के लिए विशेष होम में भेजने की दी जा सकती है और इस मामले में आरोपी पहले ही छह साल से ज्यादा की सजा काट चुका है।

पीड़िता की गवाहीः

अदालत को पीड़ित लड़की के सबूतों पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं मिला, और कानून में भी ऐसा कोई नियम नहीं है कि उसकी गवाही पर भौतिक विवरणों द्वारा पुष्टि किए बिना कार्रवाई नहीं की जा सकती है।

अदालत ने कहा कि चूंकि घटना के संबंध में मुख्य गवाही में पीड़िता द्वारा दिए गए सबूत व्यावहारिक रूप से जिरह में अपरिवर्तित रहे, इसलिए उसकी गवाही की पुष्टि करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

''पीडब्ल्यू नंबर तीन के साक्ष्य में सत्य की छाप है। इसे बिना पुष्टि के भी स्वीकार किया जा सकता है।''

सहमति का कोई प्रमाण नहींः

पीड़ित लड़की की गवाही ने स्पष्ट रूप से स्थापित किया है कि उसने आरोपी के साथ यौन संबंध बनाने के लिए सहमति नहीं दी थी।

''भले ही यह मान लिया जाए कि बाद के कुछ मौकों पर, उसने आरोपी के कृत्य का विरोध नहीं किया, लेकिन फिर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि आरोपी ने उसकी सहमति से उसके साथ यौन संबंध बनाए थे। केवल यह कहा जा सकता है कि पीड़ित लड़की ने अपरिहार्य परिस्थितियों में निष्क्रिय रूप से अपने आप को प्रस्तुत किया था क्योंकि उसके पास कोई अन्य विकल्प नहीं था।''

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पीड़िता के शरीर पर चोटों की अनुपस्थिति भी उसकी ओर से सहमति का अनुमान या झूठा आरोप लगाना नहीं है। यह नहीं कहा जा सकता है कि जब भी प्रतिरोध किया जाता है तो पीड़ित के शरीर पर कुछ चोट अवश्य होती है।

अदालत ने आगे कहा कि यह साबित करने की जिम्मेदारी आरोपी की थी कि संभोग सहमति से किया गया था और वर्तमान मामले में, अपीलकर्ता ऐसा करने में विफल रहा है।

पीड़िता की उम्र का सबूतः

यह कानूनी रूप से स्वीकृत सिद्धांत है कि पीड़ित बच्चे के जन्म की तारीख को उस स्कूल के प्रमाण पत्र के माध्यम से साबित करना होता है, जिसमें बच्चे ने पहली बार प्रवेश लिया था। हालांकि, अभियोजन पक्ष इस दस्तावेज़ को उसकी उम्र के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करने में विफल रहा है।

अदालत ने कहा, ''भले ही आरोपी ने पीड़िता की उम्र पर कोई आपत्ति न जताई हो, लेकिन अभियोजन पक्ष का कर्तव्य है कि वह उसकी उम्र साबित करे।''

कोर्ट ने कहा कि पीड़ित लड़की की उम्र साबित नहीं करने का नतीजा यह होता है कि आरोपी को पॉक्सो अधिनियम के तहत या आईपीसी की धारा 366ए (नाबालिग लड़की की खरीद) के तहत किसी भी अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।

''पीड़ित की उम्र अधिनियम के तहत अपराधों को आकर्षित करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण और बुनियादी तत्व है और जब तक इसको अभियोजन पक्ष द्वारा सकारात्मक सबूत पेश करके साबित नहीं किया जाता है ,अधिनियम के तहत प्रावधानों को लागू नहीं किया जा सकता है।''

सजाः

इस प्रकार, अदालत ने पॉक्सो अधिनियम की धारा 3 रिड विद धारा 4 के तहत आरोपी को निचली अदालत द्वारा दोषी करार देने के फैसले को रद्द कर दिया।

पीठ ने यह भी कहा कि चूंकि अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि पीड़िता 18 साल से कम उम्र की नाबालिग लड़की थी, इसलिए निचली अदालत द्वारा आईपीसी की धारा 366 ए के तहत आरोपी को दी गई सजा को भी रद्द किया जाता है।

हालांकि, आरोपी को आईपीसी की धारा 366 ( अपहरण या महिला को शादी के लिए मजबूर करने, आदि) के तहत अपराध के लिए दोषी ठहराया गया।

निचली अदालत द्वारा आईपीसी की धारा 376 के तहत दोषी करार देने के फैसले की भी पुष्टि की गई। हालांकि निचली अदालत द्वारा अभियुक्त को दी गई कारावास और जुर्माने की सजा को खारिज कर दिया गया।

कोर्ट ने निर्देश दिया है कि यदि किसी अन्य मामले में आरोपी को हिरासत में रखने की जरूरत नहीं है तो उसे तुरंत रिहा कर दिया जाए। तद्नुसार अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया गया।

इस मामले में अधिवक्ता जॉर्ज रेनॉय ने अपीलकर्ता का प्रतिनिधित्व किया, जबकि विशेष लोक अभियोजक अंबिका देवी एस प्रतिवादियों की ओर से पेश हुईं।

केस का शीर्षक- श्याम सिवन बनाम केरल राज्य व अन्य

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