छह साल की उम्र में अपराधी का पूरा नाम जानने की उम्मीद नहीं की जा सकती: बॉम्बे हाईकोर्ट ने बलात्कार की सजा बरकरार रखी

Shahadat

18 April 2023 10:14 AM IST

  • छह साल की उम्र में अपराधी का पूरा नाम जानने की उम्मीद नहीं की जा सकती: बॉम्बे हाईकोर्ट ने बलात्कार की सजा बरकरार रखी

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह देखते हुए कि एक 6 साल के बच्चे से बलात्कार करने वाले व्यक्ति का पूरा नाम जानने की उम्मीद नहीं की जा सकती, हाल ही में 38 वर्षीय व्यक्ति की सजा को बरकरार रखा, जिसे पीड़ित बच्चे द्वारा उसका सरनेम लेने के बाद पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया था।।

    औरंगाबाद में बैठी जस्टिस विभा कंकनवाड़ी और जस्टिस वाईजी खोबरागड़े की खंडपीठ ने इस तथ्य को माना कि बच्चे की मां ने बच्चे द्वारा दिए गए सरनेम से पूरा नाम दिया, इसका मतलब यह नहीं है कि आरोपी को अपराध में फंसाया जा रहा है।

    अदालत ने कहा,

    “छह साल की लड़की से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह पास के इलाके में रहने वाले दूसरे व्यक्ति का पूरा नाम बताएगी। वह उस व्यक्ति को पहले या अंतिम नाम/उपनाम से जानती होगी या उस व्यक्ति की पहचान उस व्यक्ति के बच्चे/बच्चों के नाम से कर सकती है यानी किसी विशेष लड़के/लड़की के पिता के रूप में कर सकती है। मां द्वारा उक्त उपनाम से अभियुक्त का पूरा नाम देने को अभियुक्त के निहितार्थ के दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता है।

    अपीलकर्ता को आईपीसी की धारा 376(2)(एफ) और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अनुसूचित जाति या जनजाति की महिला का यौन शोषण की धारा 3(1)(xii) के तहत अपराध का दोषी ठहराया गया।

    अभियोजन पक्ष के मुताबिक घटना 2012 की है जब पीड़िता 6 साल की थी। एक शाम वह रोती हुई अपने घर आई और बेहोश हो गई। उसने खुलासा किया कि जब वह आंगन में खेल रही थी तो एक व्यक्ति उसे नदी किनारे ले गया और डरा धमका कर उसके साथ दुष्कर्म किया।

    उसकी मां ने अगले दिन मामला दर्ज कराया, लेकिन सदमे में होने के कारण बच्ची ने उस समय बयान नहीं दिया। तीन दिनों के बाद पुलिस को दिए अपने बयान में बच्ची ने अपराधी का नाम "सत्या" बताया। इसके बाद उसके माता-पिता ने पूरा नाम वर्तमान अपीलकर्ता सतीश नंद्रे बताया।

    उन्हें दोषी ठहराया गया और पंद्रह साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। इसलिए वर्तमान अपील दायर की गई।

    अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि बच्चे को उसके खिलाफ बयान देने के लिए सिखाया नहीं गया। अभियोजन पक्ष ने दोषसिद्धि का यह तर्क देते हुए समर्थन किया कि साक्ष्य की चिकित्सीय साक्ष्य से पुष्टि होती है।

    अदालत ने कहा कि बच्ची ने अपनी गवाही में घटना का वर्णन किया और वर्तमान आरोपी की पहचान की।

    अपनी क्रॉस एक्साजमिनेशन में बचाव पक्ष के वकील ने उससे पूछा कि क्या पुलिस ने उसे आरोपी का नाम लेने के लिए कहा था। अदालत ने कहा कि ट्रायल जज ने सही तरीके से हस्तक्षेप किया और उसे वकील के सवाल को समझा।

    अदालत ने कहा कि क्रॉस एक्जामिनेशन का उद्देश्य सिर्फ गवाह को भ्रमित करके स्वीकारोक्ति निकालना नहीं है, बल्कि सच्चाई का पता लगाना है।

    अदालत ने कहा,

    "यह अभियोजन पक्ष, बचाव के साथ-साथ न्यायालय का कर्तव्य है कि वह बाल गवाह सहित किसी भी गवाह से सच्चाई का पता लगाए और यह देखना न्यायालय का कर्तव्य है कि गवाह प्रश्न को समझता है। जब इस तरह के भ्रामक सवाल पूछे जाते हैं या कभी-कभी गवाह पर दबाव की रणनीति का भी इस्तेमाल किया जाता है तो मुकदमे के पीठासीन अधिकारी को हस्तक्षेप करना चाहिए।"

    अदालत को बच्ची द्वारा आरोपी के नाम का देर से खुलासा करने में कोई गलती नहीं मिली, यह देखते हुए कि वह घटना के कारण गंभीर दर्द में थी। हालांकि बच्चे को कोई शपथ नहीं दिलाई गई, लेकिन अदालत ने उसकी गवाही को विश्वसनीय पाया।

    मां ने अपनी गवाही में कहा कि उसकी बेटी ने अपराधी का नाम "सत्या" बताया, क्योंकि वह उसे जानती थी कि वह उनका पड़ोसी था। गांव में सत्या नाम के कितने लोग रहते हैं, मां यह नहीं बता सकी। बच्ची ने अपराधी का पूरा नाम उसे नहीं बताया, उसने गवाही दी।

    हालांकि, कोर्ट ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि मां ने निकनेम से पूरा नाम दिया है, इसका मतलब यह नहीं है कि आरोपी को फंसाया जा रहा है।

    अदालत ने कहा कि क्रॉस एक्जामिनेशन में मां से आरोपी को झूठा फंसाने के किसी भी कारण के बारे में पूछताछ नहीं की गई। अदालत ने कहा कि बचाव पक्ष ने यह नहीं बताया कि उसे फंसाने का संभावित कारण क्या है।

    अदालत ने आगे कहा कि बचाव पक्ष ने सबूतों से कोई छेड़छाड़ साबित नहीं की। अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता पाटिल समुदाय से है, जबकि लड़की आदिवासी भील समुदाय से है। इसलिए एचसी ने निष्कर्ष निकाला कि अत्याचार अधिनियम के तहत सजा उचित है।

    अदालत ने कहा कि ट्रायल जज ने अपने फैसले में गलत तरीके से आईपीसी की धारा 376(2)(एफ) का जिक्र किया, क्योंकि कोई भी श्रेणी अपीलकर्ता पर लागू नहीं होती। अदालत ने कहा कि यह अपराध आईपीसी की धारा 376(1) के तहत दंडनीय होगा।

    अदालत ने कहा कि आरोपी को सजा देने में नरमी का कोई सवाल ही नहीं है, क्योंकि उसने जघन्य अपराध किया है।

    केस नंबर- क्रिमिनल अपील नंबर 2015/792

    केस टाइटल- सतीश पुत्र रमेश नंद्रे बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य।

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