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पहचान छुपाकर शादी का वादा करके यौन संबंधः पक्षों के बीच पति-पत्नी के रूप में रहने के समझौते के बावजूद दिल्ली हाईकोर्ट ने एफआईआर रद्द करने से इनकार किया

LiveLaw News Network
2 Feb 2021 5:51 AM GMT
पहचान छुपाकर शादी का वादा करके यौन संबंधः पक्षों के बीच पति-पत्नी के रूप में रहने के समझौते के बावजूद दिल्ली हाईकोर्ट ने एफआईआर रद्द करने से इनकार किया
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दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार (01 फरवरी) को बलात्कार के एक मामले को इस आधार पर खारिज़ करने से इनकार कर दिया कि दोनों पक्षों में समझौता हो गया है। मामले में दोनों पक्षों, याचिकाकर्ता/अभियुक्त और प्रतिवादी नंबर 2 / शिकायतकर्ता ने पति और पत्नी के रूप में रहने का फैसला किया था।

जस्टिस सुब्रमणियम प्रसाद की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता-अभियुक्त पर बलात्कार और जालसाजी जैसे गंभीर अपराधों के आरोप हैं, यह सामाजिक हित पर गंभी असर डालता हैं।

उन्होंने कहा, "... इन अपराधों को निजी या दीवानी विवाद नहीं माना जा सकता है, बल्कि इनसे समाज पर बड़े पैमाने पर प्रभाव पड़ेगा। उन अपराधों में, जो समाज की भलाई को गंभीरता से खतरे में डालते हैं, अपराधी को इस आधार छोड़ना सुरक्षित नहीं है कि, अपराधी और पीड़ित ने विवाद को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझा लिया है।"

[नोट: जस्टिस सुब्रमणियम प्रसाद की खंडपीठ ने पिछले हफ्ते कहा था कि अदालत केवल इस आधार पर एफआईआर को रद्द करने की अनुमति नहीं दे सकती है कि पक्षों ने आपस में समझौता कर ‌लिया है, जबकि एफआईआर भारतीय दंड संहिता की धारा 377 और POCSO अधिनियम के तहत छोटे बच्चे के खिलाफ जघन्य अपराधों से संबंधित है।

बेंच ने धारा 482 सीआरपीसी के तहत दायर याचिका, जिसमें पटेल नगर थाने में धारा 377 आईपीसी और पोक्सो अधिनियम की धारा 4 के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द करने की प्रार्थना की गई थी, को खारिज़ कर दिया था।]

मामला

धारा 482 सीआरपीसी के तहत याचिका के माध्यम से, याचिकाकर्ता-अभियुक्त ने धारा 419, 467, 471, 474, 376 354, 506 , धारा 34 आईपीसी के साथ पढ़ें, के तहत अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की प्रार्थना की ‌थी। याचिका में कहा गया था कि पक्षों ने अपना विवाद सुलझा लिया है।

धारा 482 आवेदन के साथ एक कॉम्प्रोमाइज डीड भी दायर किया गया था, जिसमें कहा गया था कि प्रतिवादी नंबर 2 / शिकायतकर्ता ने याचिकाकर्ता / अभियुक्त को क्षमा कर दिया है और वे अपने शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन में रहने के लिए तैयार हैं।

मामले के संक्षिप्त तथ्य

प्रतिवादी नंबर 2 / शिकायतकर्ता ने 10 दिसंबर 2020 को पुलिस स्टेशन प्रेम नगर में शिकायत दर्ज कराई, जिसमें कहा गया कि याचिकाकर्ता / आरोपी ने उससे मुलाकात की और खुलासा किया कि उसका नाम शिवा है और उसने उससे वादा किया कि वह उससे शादी करेगा।

इसके बाद याचिकाकर्ता उसके साथ अंतरंग हो गया और विवाह के बहाने उसके साथ शारीरिक संबंध स्थापित किया। बाद में, उसे पता चला कि याचिकाकर्ता ने अपनी पहचान छुपाई है और उसका असली नाम अख्तर है।

उसने प्राथमिकी में कहा कि याचिकाकर्ता उसे आर्य समाज मंदिर ले गया और दोनों ने वहां शादी की और विवाह प्रमाणपत्र में उन्होंने अपना नाम अख्तर बताया। शिकायतकर्ता ने यह भी कहा कि शादी के बाद याचिकाकर्ता ने पैसे की मांग शुरू कर दी और जब वह उसके माता-पिता से मिलने गई, तो उन्होंने उसे भगा दिया।

न्यायालय के अवलोकन

न्यायालय ने शुरू में रेखांकित किया कि सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि हाईकोर्ट को धारा 320 सीआरपीसी के तहत न्यायालय को दिए गए यौगिक अपराधों की शक्ति और आपराधिक कार्यवाही को खत्म करने और धारा 482 सीआरपीसी के तहत प्रदान किए अधिकार क्षेत्र के सूक्ष्म अंतर को समझना चाहिए।

अदालत ने नोट किया कि शिकायतकर्ता के आरोप कि याचिकाकर्ता अख्तर ने खुद को शिवा के रूप में गलत तरीके से पेश किया और प्रतिवादी नंबर 2 / शिकायतकर्ता से शादी का वादा किया और उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।

इसके बाद, कोर्ट ने पाया कि बलात्कार का अपराध बड़े पैमाने पर समाज के खिलाफ अपराध है और धारा 376 के तहत अपराध के अलावा, याचिकाकर्ता पर धारा 419, 467, 468, 471, 474, 506 और 34 आईपीसी के तहत अपराध के आरोप भी हैं।

दोनों पक्षों के बीच दर्ज समझौते के आधार पर प्राथमिकी को रद्द करने से इनकार करते हुए, अदालत ने कहा, "सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह बार-बार कहा गया है कि जब पक्ष समझौते पर पहुंचते हैं और उस आधार पर आपराधिक कार्यवाही को खत्म करने के लिए याचिका दायर की जाती है, तो ऐसे मामलों में शिकायत को खत्क करने से पहले हाईकोर्ट को निम्म मुख्या कारकों पर ध्यान देना होगा a;) न्याय की उद्देश्य, b) किसी भी अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकना। हाईकोर्ट को पूर्वोक्त उद्देश्यों में से किसी एक राय बनानी होगी।"

उल्लेखनीय है कि 2019 में, सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा ‌था कि बलात्कार के आरोपियों और पीड़ित के बीच समझौते की आपराधिक मामलों को तय करने में कोई प्रासंगिकता नहीं है। जस्टिस मोहन एम शांतनगौदर और जस्टिस कृष्ण मुरारी की पीठ ने आपराधिक अपील का निपटारा करते हुए यह अवलोकन किया था।

पीठ के समक्ष, यह प्रस्तुत किया गया कि अपील के लंबित होने के दौरान, दोनों अभियुक्तों ने अभियोजन पक्ष के पक्ष में डेढ़-डेढ़ लाख रुपए का भुगतान किया है और उसने मामले में स्वेच्छा से समझौता करना स्वीकार कर लिया है।

पीठ ने कहा, "हालांकि, इस बात पर जोर देना लाजिमी है कि हम बलात्कार और यौन उत्पीड़न के समान मामलों से संबंधित मामलों में इस तरह के समझौते को स्वीकार नहीं करते हैं। इसलिए इस मामले को तय करने में उपरोक्त समझौता की कोई प्रासंगिकता नहीं है।"

हाल ही में, जब यह दावा किया गया है कि मुकदमें में शामिल पक्षों के के बीच 'समझौता संस्कृति' बड़े पैमाने पर प्रचलित हो रही है, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा था, "मृतक का जीवन इतना सस्ता नहीं है, जिस पर दो व्यक्तियों के बीच समझौता हो सके।"

ज‌स्टिस राहुल चतुर्वेदी की खंडपीठ ने एक आवेदक, जिसके खिलाफ धारा 498 ए, 304 बी, 120 बी आईपीसी और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत एफआईआर दायर की गई थी, की जमानत पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की थी।

केस टाइटिल- अख्तर बनाम दिल्ली सरकार और एक अन्य [CRL.M.C. 59/2021 & CRL.M.A. 278/2021 (Stay)]

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