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मृत्युदंड के मामले में क्षमा/दया-रिट याचिकाओं के समयबद्ध निस्तारण की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस

LiveLaw News Network
16 July 2020 2:24 PM GMT
मृत्युदंड के मामले में क्षमा/दया-रिट याचिकाओं के समयबद्ध निस्तारण की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस
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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें क्षमा/दया-रिट याचिकाओं के निस्तारण और फलस्वरूप मृत्युदंड के समयबद्ध कृयान्वयन के विषय में निर्देश जारी करने की मांग की गई थी।

नोटिस चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एसए बोबडे, आर सुभाष रेड्डी और एएस बोपन्ना की पीठ की ओर से जारी किया गया, याचिका एडवोकेट डॉ सुभाष विजयरण ने दायर की थी। याचिका में हाईकोर्ट द्वारा रिट याचिकाओं पर फैसला करने में में हुई अनियमितताओं को उजागर किया गया था, विशेष रूप से 5 बच्चों की हत्या की दोषी दो बहनों "रेणुका और सीमा" पर ध्यान केंद्र‌ित किया गया था ।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि दिल्ली गैंगरेप और हत्या के मामले का निस्तारण तेजी से किया गया था क्योंकि पीड़ित माता-पिता ने न्यायिक प्रणाली तक पहुंचने के लिए समर्थन और संसाधन जुटाए, जबकि बच्‍चों की हत्या के मामले में पीड़ित झुग्गियों में रहने वाले हैं और उनके पास न संसाधन हैं और न सहायता। दोषियों की मौत की सजा की पुष्टि हो चुक है, हालांकि यह 2014 से लंबित है।

याचिका में कहा गया है, "मैं विशेष रूप से बच्‍चों की हत्या की दोषी दो बहनों रेणुका और सीमा के मामले पर ध्यान केंद्रित कर रहा हूं। वे अपहरण और हत्या का दोषी हैं, जिन्होंने घिनौने तरीके से 5 असहाय बच्‍चों की हत्या की थी। उनकी मौत की सजा पुष्टि माननीय न्यायालय, राष्ट्रपति और राज्‍यपाल द्वारा हो चुकी है - फिर भी यह 2014 से लंबित है, क्योंकि बॉम्बे हाईकोर्ट उनकी पोस्ट-रिजेक्शन रिट पिटीशन पर बहुत धीमी गति से सुनवाई कर रहा है, जिसमें दो सुनवाई की तारीखों के बीच 5 साल 7 महीने से अधिक का आश्चर्यजनक अंतराल रहा है। करण यह है कि पीड़ित-बच्चों के माता-पिता गरीब हैं और झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोग हैं, जिनके पास न तो संसाधन हैं और न ही सार्वजनिक समर्थन हासिल करने और हमारी न्यायिक प्रणाली को जागृत करने की पहुंच है।"

इस दृष्टिकोण के साथ, याचिका शत्रुघ्न चौहान बनाम यून‌ियन ऑफ इंडिया [(2014) 3 एससीसी 1] और शबनम बनाम यून‌ियन ऑफ इंडिया [(2015) 6 एससीसी 702] में सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिए गए फैसलों की रोशनी में क्षमा/ दया याचिकाओं के निस्तारण, मृत्युदंड के दोषियों को दिए गए "कानूनी उपायों" के प्रयोग की समय-सीमा और मृत्युदंड के निष्पक्ष, न्यायसंगत और समयबद्ध कृयान्वयन के लिए दिशा-निर्देश जारी करने की मांग करती है।

याचिका में कहा गया है कि हाल ही में दिल्ली गैंगरेप और हत्या के मामले में कई प्रणालीगत कमियां उजागर हुईं। याचिकाकर्ता ने कहा कि मृत्युदंड के निष्पादन के मामले में आगे बढ़ने में चयनात्मकता है और खामियों का बहुत दुरुपयोग किया जाता है जैसे कि वे दिल्ली मामले में अंत‌िम समय में किया गया। यह, या‌चिका में दलील दी गई कि यह सामाजिक असंतोष पैदा करता है।

बच्‍चों की हत्या के मामले में यचिका में कहा गया है कि हाइकोर्ट ने बहुत ही धीमी गति से रिट याचिका को सुना है।

याचिका में कहा गया, "सिर्फ इसलिए कि 42 मृतक बच्चों के माता-पिता गरीब झुग्गी-झोपड़ी के निवासी हैं और उनके पास बच्चों की निर्मम हत्या के मामले को आगे बढ़ाने के लिए साधन नहीं है, इस तरह से बॉम्बे हाईकोर्ट इस मामले की सुनवाई कर रहा है।"

याचिकाकर्ता ने कहा कि संविधान राज्य को सभी को समान उपचार देने का आदेश देता है, और कुछ विशिष्ट मृत्यु दंड दोषियों का मनमाना चयन और कुछ को दशकों तक लंबित रखना, अनुच्छेद 14 का विरोधाभासी है।

याचिकाकर्ता ने उन मृत्युदंड के उन दोषियों को मौत की सजा देने के लिए समयबद्ध तरीके से आवश्यक कदम उठाने के लिए केंद्र और राज्यों को निर्देश देने की मांग की, जिन्होंने अपने कानूनी उपायों का उपयोग कर लिया है, साथ ही उन लोगों को नोटिस जारी करने की मांग की जिन दोषियों ने अभी तक अपने कानूनी उपायों को का उपयोग नहीं किया। उन्हें निर्धा‌रित समयसीमा में अपने कानूनी उपायों का उपयोग करने का निर्देश दिया जाए।

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