मानहानि मामले में पुणे कोर्ट में पोते की दलील: भगवान के 'खिलाफ' थे सावरकर, लिखी थी धार्मिक मान्यताओं पर सवाल उठाने वाली किताब

Shahadat

31 July 2026 11:09 AM IST

  • मानहानि मामले में पुणे कोर्ट में पोते की दलील: भगवान के खिलाफ थे सावरकर, लिखी थी धार्मिक मान्यताओं पर सवाल उठाने वाली किताब

    कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ चल रहे आपराधिक मानहानि के मामले में, गुरुवार (30 जुलाई) को पुणे की स्पेशल कोर्ट में सत्याकी सावरकर ने माना कि उनके दादा और दक्षिणपंथी विचारक विनायक सावरकर ने 'विवादित' किताब 'सावरकरांचे विज्ञाननिष्ठ निबंध' (सावरकर के विज्ञान-आधारित निबंध) लिखी थी। इस किताब में धार्मिक मान्यताओं और भगवान के अस्तित्व की आलोचना की गई थी और सनातन धर्म को 'प्रकृति के नियमों' पर आधारित 'शाश्वत सत्य' के रूप में 'फिर से परिभाषित' किया गया था, जो बदलते समय के साथ विकसित होता रहना चाहिए।

    बता दें, सत्याकी ने लंदन में भाषण देकर सावरकर की कथित तौर पर बदनामी करने के लिए गांधी के खिलाफ आपराधिक मानहानि का मामला दर्ज कराया। स्पेशल जज अमोल शिंदे के सामने गांधी के वकील मिलिंद पवार उनसे जिरह (cross-examination) कर रहे हैं।

    जब गुरुवार को जिरह शुरू हुई तो पवार ने कोर्ट के सामने 'सावरकरांचे विज्ञाननिष्ठ निबंध' किताब की एक कॉपी पेश की और सत्याकी से पूछा कि क्या उन्हें सावरकर की लिखी इस किताब के बारे में पता है। इसके बाद वकील ने किताब के कुछ हिस्से पढ़कर सुनाए, जिनमें मुख्य रूप से भगवान के अस्तित्व पर सवाल उठाए गए।

    किताब में लिखा है,

    "इंसान को ब्रह्मांड के भगवान के साथ व्यक्तिगत संबंध बनाने की बचकानी इच्छा पूरी तरह छोड़ देनी चाहिए—जैसे सड़क किनारे बैठा कोई भिखारी किसी सम्राट से रिश्तेदारी का दावा करने की कोशिश करे। यही सही रास्ता है, क्योंकि यही सच है। यह विश्वास कि 'भगवान मेरा भला करेंगे, और अगर वे ऐसा करते हैं, तो मैं आभार जताने के लिए सत्यनारायण पूजा करूंगा,' पूरी तरह बेवकूफी है। क्योंकि अगर यह सच होता तो वह कौन है जो हमें पहले उन मुसीबतों में डालता है जिनसे बाद में हम कहते हैं कि भगवान ने हमें बचाया है? वह वही सत्यनारायण, वही भगवान है! अगर कोई आदमी पहले आपका गला काट दे और फिर घाव पर मरहम लगाए, तो क्या आपको सिर्फ इसलिए उसकी पूजा करनी चाहिए क्योंकि उसने मरहम लगाया? क्या आपको पहले यह नहीं पूछना चाहिए कि उसने आपका गला क्यों काटा और इसके लिए उसे डांटना नहीं चाहिए? ब्रह्मांड के संदर्भ में, ये दोनों ही नजरिए समान रूप से बेबुनियाद और अतार्किक हैं।"

    इसके अलावा, पवार ने सावरकर की किताब का एक हिस्सा पढ़कर सुनाया, जिसमें उन्होंने हिंदू देवी-देवताओं के अस्तित्व पर सवाल उठाए हैं। यह बात खास तौर पर उस समय के संदर्भ में कही गई, जब अलाउद्दीन खिलजी जैसे शासकों ने महाराष्ट्र और पूरे देश में हिंदू राजाओं को गद्दी से हटाया और हिंदू मंदिरों को भी तोड़ा।

    किताब में लिखा है,

    "महाराष्ट्र में मंत्र-जाप, धार्मिक व्रत-नियम, योग-साधना, सप्ताह भर चलने वाले भजन-कीर्तन (नाम-सप्ताह), पवित्र स्नान और रोज़ाना पूजा-पाठ का माहौल था। इसी बीच, एक के बाद एक, पाँच मुस्लिम सल्तनतों ने हिंदुओं को कुचलना शुरू कर दिया। हिंदू महिलाओं को उनके घरों से अगवा किया जाता था, ज़बरदस्ती धर्म बदला जाता था और उनकी शादियाँ करा दी जाती थीं। फिर भी, हालाँकि हर देवता के दो से ज़्यादा हाथ माने जाते हैं, उनमें से किसी ने भी अलाउद्दीन या मलिक अंबर पर हाथ नहीं उठाया! हिंदू बादशाह को लगान (टैक्स) देते थे, लेकिन किसी देवता ने गरजकर यह नहीं कहा, 'तुम हरि के दुश्मन हो! मेरे भक्तों से लगान माँगने वाले तुम कौन होते हो?' और उसकी दाढ़ी पकड़कर उसे सिंहासन से नीचे नहीं खींचा। जिस दयालु ईश्वर के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने संत जनाबाई की अनाज पीसने जैसे साधारण काम में मदद की थी, वे उस समय हिंदू राष्ट्र की बहुत बड़ी ज़रूरत के समय मदद के लिए आगे नहीं आए। हरि के उन दुश्मनों को अपने क्रोध की चक्की में पीसने, उनके शासन को कुचलने और खत्म करने के बजाय, उन्होंने कुछ नहीं किया।"

    पवार ने किताब के कुछ और हिस्से भी पढ़कर सुनाए, जिनमें सावरकर ने आज भी चली आ रही धार्मिक प्रथाओं पर गंभीर सवाल उठाए और उनकी आलोचना की।

    सावरकर ने लिखा,

    "काशी से रामेश्वरम तक अनगिनत मंदिर तोड़े गए और उनकी मूर्तियों का इस्तेमाल मस्जिदों की सीढ़ियों में किया गया। फिर भी ईश्वर उन मुस्लिम अत्याचारों पर नाराज़ नहीं हुए। लेकिन यहाँ, अगर कोई हिंदू नारियल चढ़ाने की मन्नत पूरी करना भूल जाता है, या कोई हिंदू गाँव एक साल भी बहिरोबा को पारंपरिक बकरे की बलि नहीं दे पाता तो वही ईश्वर नाराज़ हो जाते हैं! तब यह माना जाता है कि वे उस हिंदू परिवार को बर्बाद कर देंगे या गाँव में कोई महामारी फैला देंगे।"

    उसी किताब का एक और हिस्सा पढ़ते हुए, पवार ने बताया कि सावरकर ने मनुस्मृति के कुछ श्लोकों का ज़िक्र किया और सवाल उठाया कि क्या वह भी 'सनातन धर्म' है।

    सावरकर ने अपनी किताब में लिखा है,

    "धर्मग्रंथों (मनु) के अनुसार, ब्राह्मण को चावल के बजाय सूअर या भैंस का मांस खिलाना बेहतर माना जाता है, क्योंकि ऐसा मांस चढ़ाने से पूर्वज (पितर) दस महीने तक संतुष्ट रहते हैं। इसके अलावा, अगर ब्राह्मण बकरी का मांस खाते हैं, तो पूर्वज पूरे बारह साल तक संतुष्ट रहते हैं। यह भी सनातन धर्म है।"

    इसके बाद पवार ने वे हिस्से पढ़कर सुनाए जिनमें सावरकर ने नागरिकों से वैज्ञानिक सोच विकसित करने और प्रकृति माता का सम्मान करने की अपील की, क्योंकि प्रकृति के नियम शाश्वत (सनातन धर्म) हैं और बदलते समय के साथ विकसित होते रहते हैं। सावरकर ने इस हिस्से में यह भी कहा कि केवल राम या किसी अन्य देवता का नाम जपने या पांच बार नमाज़ पढ़ने से कोई सफलता नहीं मिलेगी, बल्कि वैज्ञानिक सोच ही व्यक्ति को सांसारिक सफलता हासिल करने में मदद करेगी।

    दिलचस्प बात यह है कि सत्यकी ने इस बात को स्वीकार किया है कि ऊपर बताई गई किताब सावरकर ने ही लिखी। हालांकि, उनके वकील ने गांधी के वकील द्वारा इस किताब का ज़िक्र किए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई। लेकिन अदालत ने कहा कि अपनी मुख्य गवाही (एग्जामिनेशन-इन-चीफ) के दौरान सत्यकी ने इसी किताब का ज़िक्र किया था और इसलिए, गांधी को इसी किताब के संबंध में उनसे जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) करने का अधिकार था।

    सत्यकी ने अदालत को बताया,

    "यह सच है कि ऊपर बताई गई सभी बातें सावरकर ने अपनी किताब 'सावरकरांचे विज्ञाननिष्ठ निबंध' (वैज्ञानिक निबंध) में लिखी हैं।"

    सत्यकी से क्रॉस एग्जामिनेशन 4 अगस्त को जारी रहेगी।

    Case Title: Satyaki Savarkar vs Rahul Gandhi

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