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धारा 24 एचएमए | मुकदमे के खर्च के लिए आवेदन तय किए बिना तलाक का फैसला दिया गया, बॉम्बे हाईकोर्ट ने केस को फैमिली कोर्ट को वापस भेजा

Avanish Pathak
22 Sep 2022 11:20 AM GMT
बॉम्बे हाईकोर्ट, मुंबई
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बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने पत्नी की ओर से दायर मुकदमे के खर्च (maintenance pendente lite) के लिए अंतरिम आवेदन पर फैसला किए बिना तलाक दिए जाने के बाद तलाक के मामले को फैमिली कोर्ट में वापस भेज दिया है।

अदालत ने कहा, "हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधान के अनुसार मुकदमे के खर्चके लिए अपीलकर्ता द्वारा दायर अंतरिम आवेदन पर फैसला करने के लिए निचली अदालत को निर्देश जारी करने की आवश्यकता है।"

जस्टिस उर्मिला जोशी फाल्के ने एक पारिवारिक अपील में तलाक की डिक्री को खारिज कर दिया, जिसमें निचली अदालत के फैसले के खिलाफ एक पत्नी द्वारा उसके भरण-पोषण के आवेदन पर फैसला किए बिना तलाक की डिक्री देने का फैसला किया गया था।

अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24 एक ऐसे पति या पत्नी को भरण-पोषण और मुकदमेबाजी खर्च प्रदान करने के लिए एक उदार और लिंग-तटस्थ प्रावधान है, जिसके पास मामले के लंबित रहने के दौरान खुद के भरण-पोषण के लिए स्वतंत्र आय नहीं है।

अपीलकर्ता और प्रतिवादी विवाहित दंपत्ति हैं और उनके दो बच्चे हैं। वैवाहिक विवाद के चलते अपीलकर्ता अपनी मां के साथ नांदेड़ में रहने लगा। पति ने फैमिली कोर्ट, अकोला में तलाक के लिए मुकदमा दायर किया और अपनी पत्नी द्वारा उसके और उसके परिवार के प्रति क्रूरता का आरोप लगाया। पत्नी ने आरोपों से इनकार किया और एचएमए की धारा 24 के तहत मुकदमे के खर्च के लिए एक अंतरिम आवेदन दायर किया।

तीन सुनवाई के दौरान अपीलार्थी अनुपस्थित रहे। फैमिली कोर्ट पति से जिरह किए बिना आगे बढ़ गया और तलाक की डिक्री मंजूर कर ली। पत्नी ने इस आधार पर हाईकोर्ट में अपील की कि ट्रायल कोर्ट ने उसके भरण-पोषण के आवेदन पर निर्णय किए बिना तलाक की याचिका का फैसला किया।

अपीलकर्ता की ओर से एडवोकेट शिल्पा तपड़िया ने प्रस्तुत किया कि निचली अदालत को यह विचार करना चाहिए था कि अपीलकर्ता नांदेड़ का निवासी है और उसे अकोला में मामले में शामिल होना है। उसे दो बच्चों का भरण-पोषण करना है इसलिए वादकाली भरण-पोषण के लिए आवेदन पर फैसला किया जाना चाहिए था। उसे अपना मामला पेश करने का उचित अवसर दिए बिना तलाक की याचिका का निपटारा कर दिया गया था।

पति की ओर से पेश एडवोकेट रविकुमार तिवारी ने प्रस्तुत किया कि पत्नी पर्याप्त अवसर उपलब्ध होने के बावजूद पेश होने और प्रतिवादी से जिरह करने में विफल रही। इसलिए फैमिली कोर्ट ने मामले को आगे बढ़ाया।

अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों की जांच की और पाया कि फैमिली कोर्ट के पीठासीन अधिकारी ने गुजारा भत्ता के लिए अंतरिम आवेदन पर फैसला किए बिना तलाक की याचिका का फैसला इस आधार पर किया कि अपीलकर्ता अदालत के सामने पेश होने का पर्याप्त अवसर होने के बावजूद अनुपस्थित रहा।

अदालत ने कहा कि न केवल अपीलकर्ता कार्यवाही के दौरान अनुपस्थित था, बल्कि कई मौकों पर पति और पत्नी दोनों अनुपस्थित थे। तलाक की याचिका पर फैसला मुकदमे के खर्च के लिए अंतरिम आवेदन पर फैसला किए बिना किया गया था (जो अन्यथा धारा 24 के अनुसार 60 दिनों के भीतर तय किया जाना है)। पत्नी को अपना बचाव करने का कोई अवसर नहीं दिया गया। धारा 24 चूंकि परोपकारी प्रावधान है, इसलिए वादकालीन भरण-पोषण के लिए आवेदन पर फैसला होना चाहिए था।

अदालत ने माना कि अपीलकर्ता को सबूत पेश करके तलाक के आधार का बचाव करने के लिए उचित अवसर देना आवश्यक है। अदालत ने मामले को नए सिरे से विचार के लिए पारिवारिक अदालत में वापस भेज दिया। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट को मुकदमे के खर्च के लिए अंतरिम आवेदन पर फैसला करने का भी निर्देश दिया।

केस नंबर: फैमिली कोर्ट अपील नंबर 04 ऑफ 2022

केस टाइटलः चंदा बनाम प्रकाशसिंह राठौड़

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