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मध्यस्थता और सुलह अधिनियम की धारा 11 | कोर्ट को मध्यस्थ की नियुक्ति के दावे/प्रति-दावे के गुण-दोष में जाने की आवश्यकता नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
2 May 2022 7:42 AM GMT
दिल्ली हाईकोर्ट, दिल्ली
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दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि हाईकोर्ट को मध्यस्‍थ की नियुक्त‌ि के लिए मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11 के तहत दायर एक याचिका में पक्षों के दावे या प्रति-दावे, यदि कोई हो, के गुण-दोषों का विश्लेषण नहीं करना है।

जस्टिस संजीव सचदेवा ने कहा कि जब तक कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट न हो कि विवाद की कोई उपयोगिता नहीं है, हाईकोर्ट को इस बात की जांच करनी है कि क्या पक्षों के बीच कोई मध्यस्थता समझौता है और कोई विवाद है।

मौजूदा मामले में कोर्ट ओयो होटल्स एंड होम्स प्राइवेट लिमिटेड की याचिका पर विचार कर रहा था, जिसमें 23.10.2019 की लीज डीड के तहत एकमात्र मध्यस्थ को विवादों को संदर्भ‌ित करने की मांग की गई थी।

ओयो की ओर से पेश वकील ने कहा कि लीज डीड, विशेष रूप से क्लॉज 12.9 में एक अतिरिक्त दस्तावेज का उल्लेख किया गया है, जो 23.10.2019 का एसेट परचेज एग्रीमेंट है, जिसे पार्टियों के बीच निष्पादित भी किया गया था। यह प्रस्तुत किया गया कि दोनों दस्तावेजों में एक जैसे मध्यस्थता क्‍लॉज शामिल थे। मामले में विवाद पैदा हुए और वे एकमात्र मध्यस्थ को संदर्भित करने के लिए उत्तरदायी हैं।

दूसरी ओर, प्रतिवादी की ओर से पेश वकील ने तर्कों का खंडन किया और प्रस्तुत किया कि लीज डीड में ही निर्धारित किया गया था कि संपत्ति को 'जहां है जैसा है' के आधार पर सौंप दिया गया था और आगे संपत्ति खरीद समझौते के तहत संबंधित दायित्वों का विधिवत क्रियान्वयन किया गया था और इस तरह कोई विवाद नहीं बचा था, जो मध्यस्थता के लिए संदर्भित हो।

कोर्ट ने कहा,

"मैं प्रतिवादी की ओर से पेश विद्वान वरिष्ठ वकील की दलीलों को इस कारण से स्वीकार करने में असमर्थ हूं कि याचिका में उठाया गया दावा संपत्ति खरीद समझौते के ऊपर है और कुछ दायित्वों को भी संदर्भित करता है, जिन्हें कथित रूप से प्रतिवादी को निष्पादित करने की आवश्यकता थी, जिन्हें निष्पादित नहीं किया गया। प्रतिवादी की कथित चूक के कारण समझौते को समाप्त होने की स्थिति बनी।"

कोर्ट ने कहा कि इसमें कोई विवाद नहीं था कि लीज डीड और साथ ही संपत्ति खरीद समझौता दिनांक 23.10.2019 को पार्टियों द्वारा निष्पादित किया गया था। कोर्ट ने आगे कहा, दोनों समझौतों में एक मध्यस्थता खंड शामिल है, जिसमें विवादों को मध्यस्थता के लिए संदर्भित करने की आवश्यकता होती है।

कोर्ट ने कहा कि यह सवाल कि क्या याचिकाकर्ता का दावा बचा है या विधिवत संतुष्ट है, यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर मध्यस्थता न्यायाधिकरण द्वारा निर्णय लिया जाना आवश्यक होगा।

कोर्ट ने कहा,

"मौजूदा मामले में, लीज डीड और एसेट परचेज एग्रीमेंट दोनों में समान आर्बिट्रेशन क्लॉज हैं। इसके अलावा लीज डीड विशेष रूप से यह निर्धारित करती है कि पार्टियों ने एसेट परचेज एग्रीमेंट किया है, जो लीज डीड की अनुसूची-एच के रूप में संलग्न था।"

कोर्ट ने आगे देखा कि यह ऐसा मामला नहीं था जहां याचिकाकर्ता ने किसी मंशर से एक समझौते में एक मध्यस्थता क्लॉज को शामिल करने की मांग की, जिसमें मध्यस्थता क्लॉज शामिल नहीं था।

याचिका की अनुमति देते हुए कोर्ट ने पक्षों के बीच विवादों को मध्यस्थता के लिए संदर्भित किया और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस विक्रमजीत सेन को पार्टियों के दावों और प्रति-दावों, यदि कोई हो, पर निर्णय लेने के लिए एकमात्र मध्यस्थ न्यायाधिकरण के रूप में नियुक्त किया।

केस टाइटल: ओयो होटल्स एंड होम्स प्रा लिमिटेड बनाम परवीन जुनेजा और अन्य।

‌सिटेशन: 2022 लाइव लॉ (दिल्ली) 389

आदेश पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

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