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[सीआरपीसी की धारा 372] पीड़ित को 31 दिसंबर, 2009 से पहले पारित बरी करने के आदेश के खिलाफ अपील करने का अधिकार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
19 Feb 2022 1:29 PM GMT
[सीआरपीसी की धारा 372] पीड़ित को 31 दिसंबर, 2009 से पहले पारित बरी करने के आदेश के खिलाफ अपील करने का अधिकार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 372 के तहत एक पीड़ित/शिकायतकर्ता 31 दिसंबर, 2009 (जिस दिन सीआरपीसी की धारा 372 में एक प्रावधान जोड़ा गया) से पहले पारित बरी करने /अपराध की कम सजा/अपर्याप्त मुआवजे के आदेश के खिलाफ अपील नहीं कर सकता।

उल्लेखनीय है कि सीआरपीसी की धारा 372 के प्रावधान में कहा गया कि पीड़ित/शिकायतकर्ता को अदालत द्वारा दिए गए किसी आरोपी को बरी करने, अपराध के लिए कम सज़ा देने या अपर्याप्त मुआवजा लगाने के आदेश के खिलाफ अपील करने का अधिकार है।

जस्टिस विवेक कुमार बिड़ला और जस्टिस मो. असलम ने स्पष्ट किया कि इस तरह की अपील केवल तभी दायर की जा सकती है जब सीआरपीसी की धारा 372 के प्रावधान को लागू करने के बाद विचाराधीन आदेश पारित किया गया हो।

संक्षेप में मामला

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, देवरिया द्वारा भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 147, 148, 302 और धारा 302/149 के तहत पारित 11 जनवरी, 2002 को बरी करने के आदेश के खिलाफ 5173 दिनों की देरी के बाद अदालत शिकायतकर्ता द्वारा दायर एक अपील पर विचार कर रही थी। अपील सीमा अधिनियम की धारा पांच के तहत दायर विलंब क्षमा आवेदन के साथ दायर की गई।

देरी को सही ठहराते हुए आवेदक के वकील ने प्रस्तुत किया कि देरी इस कारण से हुई कि वर्ष 2002 में अपीलकर्ता खराब स्वास्थ्य से पीड़ित था। वह अपने वकील से संपर्क नहीं कर सकता था, और जब उसने अपने वकील से संपर्क किया तो उसे जानकारी मिली कि राज्य द्वारा एक राज्य अपील दायर की जाएगी।

इसके बाद अपीलकर्ता रोजी-रोटी कमाने के लिए घर से बाहर चला गया और मार्च, 2016 में जब वह अपने निजी काम से इलाहाबाद आया तो उसे सूचना मिली कि राज्य की अपील दायर नहीं हुई, इसलिए प्रार्थना की गई कि देरी से अपील दायर करने में माफ किया जा सकता है।

न्यायालय की टिप्पणियां

शुरुआत में कोर्ट ने कहा कि आक्षेपित निर्णय वर्ष 2002 का है, इसलिए एक प्रश्न पर निर्णय लिया जाना है कि क्या बरी करने के आदेश के खिलाफ अपील दायर की जा सकती है, जो 31 दिसंबर, 2009 से पहले पारित किया गया था, जब सीआरपीसी की धारा 372 में उक्त प्रावधान लागू हुआ।

सीआरपीसी की धारा 372 के प्रावधान को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने कहा:

"पीड़ित के पक्ष में 31.12.2009 से सीआरपीसी की धारा 372 के तहत संशोधन के माध्यम से वैधानिक अधिकार प्रदान किया गया। उस संशोधन से पहले राज्य के मामले में केवल राज्य सरकार ही अपील दायर कर सकती थी। अपीलकर्ता ने आक्षेपित निर्णय के पारित होने के समय आपराधिक पुनर्विचार याचिका दायर करके आदेश को सबसे अधिक चुनौती दी, जिसका अधिकार अपीलकर्ता द्वारा स्वीकार्य रूप से प्रयोग नहीं किया गया। "

इस पृष्ठभूमि के खिलाफ कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई विशेष प्रावधान नहीं है कि सीआरपीसी की धारा 372 का प्रावधान पूर्वव्यापी प्रकृति का है, इसलिए कोर्ट ने कहा कि वर्तमान अपील सुनवाई योग्य नहीं है। तदनुसार, अपील को खारिज कर दिया गया।

अदालत ने यह भी कहा कि चूंकि बरी करने के आदेश के पारित होने के बाद शिकायतकर्ता के पास उसके खिलाफ अपील करने का कोई अधिकार नहीं है, इसलिए परिसीमा अधिनियम की धारा पांच के तहत विलंब माफी आवेदन के समर्थन में दायर हलफनामे में दिए गए आधार पर गौर करने की जरूरत नहीं।

केस का शीर्षक - तूफानी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 13 अन्य

केस उद्धरण: 2022 लाइव लॉ (एबी) 52

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